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गुरुवार, 12 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – अनुपम एवं विशिष्ट – 8


8. जीवन, साहित्य, कला, और सभ्यताओं पर प्रभाव में अनुपम

            बाइबल के द्वारा जिस प्रकार से लोगों के जीवन परिवर्तित हुए और हो रहे हैं, वह विलक्षण है। संसार भर में अनगिनत लोग हैं, जिन्होंने बाइबल को पढ़ा, परमेश्वर को पहचाना, और उसे अपना जीवन समर्पित कर दिया। यह परिवर्तन संसार के हर स्थान, हर धर्म, हर विचारधारा के लोगों में देखा जाता है, नास्तिकों में भी। बाइबल के वचन लोगों को उनके पापों के लिए कायल करते हैं, बेचैन करते हैं। जो संवेदनशील होकर अपने विवेक की आवाज़ को सुनते हैं, अपने कायल होने के अनुसार, विचार-विमर्श करते हैं, सच्चाई को पहचानने का प्रयास करते हैं, परमेश्वर का वचन उनसे बात करता है, उन्हें सही मार्ग दिखाता है, और उन्हें उनके पापों के लिए पश्चाताप में लेकर आता है। यह सिलसिला लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व, प्रभु यीशु के शिष्य पतरस द्वारा यरूशलेम में धार्मिक पर्व मनाने के लिए एकत्रित हुए धर्मी यहूदियों के मध्य किए गए प्रचार से आरंभ हुआ था; जिसके विषय लिखा है: "तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयों, हम क्या करें? पतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे" (प्रेरितों 2:37-38), और परमेश्वर के वचन के उस एक प्रचार परिणामस्वरूप "सो जिन्होंने उसका वचन ग्रहण किया उन्होंने बपतिस्मा लिया; और उसी दिन तीन हजार मनुष्यों के लगभग उन में मिल गए" (प्रेरितों 2:41)। और तब से लेकर आज दिन तक, तब यरूशलेम से लेकर आज संसार के हर स्थान में, यह सिलसिला अविरल, नियमित चलता चला आ रहा है,

            प्रतिदिन, प्रतिपल, संसार भर में लोगों के जीवन बदले जा रहे हैं। जिन्होंने परमेश्वर के वचन के सत्य को पहचाना, वो फिर उसके लिए अपने घर-बार, जमीन-जायदाद तथा नौकरी-व्यवसाय छोड़ने, यहाँ तक कि प्राणों की भी आहुति देने के लिए तैयार हो गए, किन्तु बाइबल द्वारा उनके जीवनों में आए परिवर्तन से फिर मुंह नहीं मोड़ा। जो बाइबल के आज्ञाकारी हो गए, उनके जीवन की दिशा और प्राथमिकताएं  बदल गईं; जिन बुरी आदतों और व्यवहारों को वो छोड़ नहीं पा रहे थे, या जो बातें पहले उन्हें बुरी लगती भी नहीं थीं, वे बाइबल की आज्ञाकारिता में आ जाने के बाद स्वतः ही उनके जीवनों से जाती रहीं। उन्हें बहुधा अपने इस विश्वास और निर्णय की एक बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, समाज और परिवार का बहुत विरोध सहन करना पड़ा, किन्तु सत्य की पहचान हो जाने के बाद, फिर वे उस सत्य पर बने ही रहे, सहते रहे, निभाते रहे, और परमेश्वर की शांति तथा आशीषों का अनुभव करने वाले, तथा औरों को उसके बारे में बताने वाले बन गए।

            संसार भर के साहित्य और कला पर बाइबल की बातों, घटनाओं, शिक्षाओं, और पात्रों ने बहुत गहरी छाप छोड़ी है। बाइबल से संबंधित बातों को लेकर जितनी पुस्तकें, लेख, कहानियाँ, उपन्यास, गीत, कविताएं, नाटक आदि लिखे गए हैं उतने किसी भी अन्य पुस्तक के द्वारा कभी भी प्रेरित होकर नहीं रचे या लिखे गए हैं। साहित्य में अनेकों मुहावरे बाइबल की शिक्षाओं और बातों से निकले हैं। कला के क्षेत्र में भी जितनी कलाकृतियाँ बाइबल की बातों के आधार पर बनाई गई हैं, उतनी संसार की किसे भी अन्य पुस्तक की बातों के आधार पर नहीं बनी हैं - वे चाहे शिल्प कला और मूर्तियाँ हों, विभिन्न प्रकार के चित्र हों, या संगीत कला में स्तुति गीत और भजन आदि हों। इस प्रकार की प्रेरणा पाई हुई कृतियाँ अन्य हर धर्म और विश्वास और स्थान में भी पाई जाती हैं, किन्तु वे अधिकांशतः किसी एक विशेष स्थान या क्षेत्र, और भाषा, संस्कृति आदि तक ही सीमित रहती हैं। किन्तु जितनी संख्या और विविधता में बाइबल की प्रेरणा से संसार भर में हर प्रकार के साहित्य और कला पर प्रभाव निरंतर चलता चला आ रहा है, वह अभूतपूर्व है, अनुपम है, विलक्षण है; उसका कोई सानी नहीं है।

            बाइबल में दी गई परमेश्वर की दस आज्ञाएँ अपने आप में अनुपम और अनूठी हैं। पुराने नियम में निर्गमन 20:1-17 में दी गई इन दस आज्ञाओं में परमेश्वर के स्वरूप और चरित्र, मनुष्य और परमेश्वर के संबंध, तथा मनुष्य के साथ मनुष्य के पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों के विषय परमेश्वर की आज्ञाएँ दी गई हैं। और अद्भुत, विलक्षण बात यह है कि संसार के किसी भी देश के किसी भी संविधान में, वह चाहे कितना भी वृहत क्यों न हो, ऐसा कुछ नहीं है, जो इन दस आज्ञाओं की परिधि में न पाया जाता हो, या इनके अन्तर्गत न देखा जा सकता हो।

            प्रभु यीशु मसीह के प्रभाव के बारे में कहा गया है, "वे संसार के इतिहास के महानतम व्यक्ति हैं। उन्होंने कोई सेवक नहीं रखे, लेकिन लोगों ने उन्हें 'स्वामी' कहकर संबोधित किया। उनके पास कोई शैक्षिक योग्यता नहीं थी, किन्तु उनके समय के विद्वानों, धर्म-गुरुओं, और आम लोगों ने उन्हें 'हे गुरु' कहा। उनके पास कोई औषधि नहीं थी, किन्तु वे इतिहास के सबसे महान चंगाई देने वाले हुए। उनकी कोई सेना नहीं थी, किन्तु राजा उनसे थर्राते थे। उन्होंने कोई सैनिक अभियान अथवा युद्ध नहीं लड़े, फिर भी वे सारे विश्व पर जयवंत हैं। उन्होंने कोई पाप, कोई अपराध नहीं किया, फिर भी उन्हें क्रूस पर चढ़ाकर मार डाल गया। उन्हें कब्र में गाड़ कर उसे भारी पत्थर से मुहरबंद कर दिया गया और सैनिकों का पहरा बैठा दिया गया, किन्तु वे तीसरे दिन जीवित होकर कब्र से बाहर आ गए और आज भी जीवित हैं, तथा हर उस हृदय में रहते हैं जो उन्हें स्वेच्छा से समर्पित होकर आमंत्रित करता है।"

            बाइबल की शिक्षाओं ने सभ्यताओं और समाजों के व्यवहारों को बदल डाला है - हजारों वर्ष पुरानी और प्राचीनतम सभ्यताओं की भी अनुचित तथा अनुपयुक्त बातों को सुधार दिया है, जिन्हें वे सभ्यताएं और उनके लोग स्वयं नहीं पहचान और सुधार पाए। बाइबल की शिक्षाओं के आधार पर संसार भर के अनेकों स्थानों में व्याप्त कुरीतियाँ, जैसे कि मनुष्यों में परस्पर भेद-भाव का व्यवहार और मनुष्यों को ऊंचा-नीचा देखना, बाल-विवाह, रंग-भेद, दास प्रथा, स्त्रियों का दमन और उनके साथ दुर्व्यवहार, नर-भक्षी प्रथाएं, शिक्षा को केवल कुछ विशेष लोगों तक ही सीमित रखना, आदि को बुराई के रूप में पहचाना तथा मिटाया गया है; यह करने के लिए संविधान बनाए अथवा बदले गए हैं या संशोधित किए गए हैं। संसार भर में जहाँ-जहाँ भी बाइबल के प्रचारक गए हैं, वहाँ उनके साथ समाज के सभी लोगों के लिए समान शिक्षा, सभी लोगों को हर प्रकार की शिक्षा उपलब्ध करवाने के लिए शिक्षा-संस्थान और विद्यालय, सभी को समाज में आदर का स्थान तथा समाज सुधार, सभी के लिए चिकित्सा सुविधाएं, महिलाओं का उत्थान आदि भी साथ ही होता चला गया है।

            क्या यह सब किसी मनुष्य की कल्पना या विचारों के द्वारा लिखी गई बातों से संभव है वास्तविकता तो यह कि बाइबल की बातों और शिक्षाओं ने ही मनुष्यों के विचारों और कल्पनाओं से लिखी गई बातों में पलने और बनी रहने वाली सामाजिक कुरीतियों को सुधार कर लोगों के जीवनों को एक नई दिशा, एक नया मार्गदर्शन प्रदान किया है।

 

बाइबल पाठ: भजन 119:97-105

भजन 119:97 अहा! मैं तेरी व्यवस्था में कैसी प्रीति रखता हूं! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है।

भजन 119:98 तू अपनी आज्ञाओं के द्वारा मुझे अपने शत्रुओं से अधिक बुद्धिमान करता है, क्योंकि वे सदा मेरे मन में रहती हैं।

भजन 119:99 मैं अपने सब शिक्षकों से भी अधिक समझ रखता हूं, क्योंकि मेरा ध्यान तेरी चितौनियों पर लगा है।

भजन 119:100 मैं पुरनियों से भी समझदार हूं, क्योंकि मैं तेरे उपदेशों को पकड़े हुए हूं।

भजन 119:101 मैं ने अपने पांवों को हर एक बुरे रास्ते से रोक रखा है, जिस से मैं तेरे वचन के अनुसार चलूं।

भजन 119:102 मैं तेरे नियमों से नहीं हटा, क्योंकि तू ही ने मुझे शिक्षा दी है।

भजन 119:103 तेरे वचन मुझ को कैसे मीठे लगते हैं, वे मेरे मुंह में मधु से भी मीठे हैं!

भजन 119:104 तेरे उपदेशों के कारण मैं समझदार हो जाता हूं, इसलिये मैं सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूं।

भजन 119:105 तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 84 -86
  • रोमियों 1

बुधवार, 11 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – अनुपम एवं विशिष्ट – 7


7. बचे रहने में अनुपम और विशिष्ट

            संसार के इतिहास में जितना प्रयास बाइबल को नष्ट करने के लिए किया गया है, उतना किसी भी अन्य पुस्तक या ग्रंथ के लिए नहीं किया गया, किन्तु इन सभी प्रयासों के बावजूद, बाइबल सुरक्षित बनी रही, और संसार के इतिहास में सर्वाधिक बिकने तथा वितरित होने वाली पुस्तक है।

            बाइबल की आरंभिक पुस्तकें papyrus (पेपिरस या भोजपत्रों) पर हाथ से लिखी गई थीं। पेपिरस मिस्र और सीरिया की नदियों और छिछले पानी के तालाबों में उगाने वाला एक प्रकार का नरकट या सरकंडा होता है, जिसे पतला काट और छील कर, उसकी परतों को आपस में दबा कर, सुखा कर कागज के समान लिखने के योग्य बनाया जाता था। अंग्रेजी शब्द paper इसी पेपिरस से बने लिखने की सामग्री से आया है। बाद में चर्मपत्रों पर, जो पशुओं की खाल से बनाए जाते थे, लिखना आरंभ हुआ। यह बहुत अचरज की बात है कि नाजुक और नाशमान, शीघ्र गल या खराब हो जाने वाले पेपिरस पर लिखे हुए उपलब्ध सबसे प्राचीन लेख लगभग 2400 ईस्वी पूर्व के हैं।

            बाइबल की लेखों की सत्यता और सही होने पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। बाइबल के पुराने नियम की पुस्तकों को हाथ से लिखने के लिए यहूदियों में विशेष प्रशिक्षण पाए हुए लोग प्रयोग किए जाते थे। उन लेखों के हर अक्षर, मात्रा, शब्द, और परिच्छेद की गिनती की हुई थी, और प्रत्येक हस्तलिपि का प्रत्येक पृष्ठ बारीकी से उस संख्या के अनुसार सही होने के लिए लिखें वाले से भिन्न अन्य प्रशिक्षित लोगों के द्वारा जाँचा जाता था, और बिना त्रुटि के पाए जाने पर ही उसे संकलित करने के लिए स्वीकार किया जाता था, अन्यथा उसे नष्ट कर दिया जाता था, जिससे त्रुटिपूर्ण लेख की संकलित पुस्तक में सम्मिलित होने के कोई संभावना शेष न रहे। इस प्रकार से यहूदियों ने यह सुनिश्चित किया हुआ था कि उन्हें मिले परमेश्वर के वचन का हर अक्षर, मात्रा, शब्द, और अनुच्छेद ठीक वैसा ही रहे जैसे वह मूल स्वरूप में था। बाइबल की पुस्तकों से संबंधित जितने भी पुराने लेख  या उनके जो भी अंश मिले हैं, उनका अवलोकन करने से यह बात स्पष्ट है कि जैसा उन पुराने लेखों में था, लेख वैसे ही आज भी विद्यमान है।

            इन नाशमान सामग्रियों पर हाथ से इतने परिश्रम से लिखे जाने के बावजूद, बाइबल की अनेकों पुस्तकों के प्राचीन लेख या उनके अंश की प्रतिलिपियाँ आज भी विद्यमान हैं, समय और वातावरण के प्रभाव के कारण सभी नष्ट नहीं हुईं, और प्रमाणित करती हैं कि उन लेखों में लिखी बात सदियों और हजारों वर्षों से अपरिवर्तित चली आ रही है।

            संसार भर में, बाइबल के संकलित होकर एक पुस्तक बनने के आरंभ से ही, बाइबल के शत्रुओं ने उसे नष्ट करके समाप्त करने के अनगिनत प्रयास किए हैं। बाइबल के प्रसारण पर प्रतिबंध लगे गए, उसकी प्रतियों को खोज-खोज कर एकत्रित किया गया और जला दिया गया। रोमी शासन से लेकर वर्तमान समय में कम्युनिस्ट देशों में उसे कानून द्वारा वर्जित कर दिया गया, उसकी प्रतियों को अपने साथ रखना दण्डनीय अपराध घोषित किया गया। किन्तु बाइबल की प्रतियाँ फिर भी बची रहीं, और बढ़ती रहीं; लोगों ने जान पर खेलकर या जान तक देकर, बेघर होकर, बंदीगृहों में कठोर दंड सहने के लिए डाल दिए जाने के बावजूद बाइबल को बचा कर रखा, और उसे प्रकाशित तथा प्रसारित करते रहे।

            वोल्टेयर नामक विख्यात फ्रांसीसी नास्तिक और परमेश्वर का घोर विरोध एवं निन्दा करने वाले व्यक्ति ने, जिसका देहांत 1778 में हुआ था, भविष्यवाणी की थी कि उसके समय से 100 वर्ष के अंदर ही, मसीही विश्वास और बाइबल दोनों समाप्त हो जाएंगे, इतिहास में दब कर रह जाएंगे। वोल्टेयर जाता रहा, उसकी भविष्यवाणी भी बिना पूरी हुए जाती रही; किन्तु एक बहुत रोचक बात भी हुई। वोल्टेयर की मृत्यु के पचास वर्ष बाद, जेनेवा बाइबल सोसायटी ने वोल्टेयर के घर को खरीद लिया, और फिर उसके घर में लगी छापने की मशीन से बाइबल की छपाई होने लगी, छपी हुई बाइबल का प्रसार और वितरण उसी के घर से होना आरंभ हो गया। प्रभु यीशु मसीह ने कहा था, "आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी" (मरकुस 13:31), और आज तक उनकी कही यह बात सही प्रमाणित होती रही है; कोई परमेश्वर के वचन को नाश अथवा झूठा प्रमाणित करने नहीं करने पाया है।

            आलोचकों ने कई धारणाएं बनाई, कि बाइबल को झूठा या गलत प्रमाणित कर दें। एक प्रयास यह तर्क देने के द्वारा किया गए कि मूसा द्वारा लिखी बाइबल की पहली पाँच पुस्तकें उसके द्वारा लिखी हुई हो ही नहीं सकती थीं क्योंकि मूसा के समय (1500-1400 ईस्वी पूर्व) तक लिखना इतना विकसित ही नहीं होने पाया था; इसलिए वे पुस्तकें बाद में कभी लिखी गई होंगे, और उन्हें मूसा के नाम रख दिया गया है। किन्तु इस तर्क और धारणा के दिए जाने के कुछ समय बाद "हममूराबी की लाठ" खोज निकाली गई; पत्थर की इस लाठ पर उसके द्वारा उसके राज्य में लागू किए गए नियम लिखे हैं, और यह लाठ मूसा से सैकड़ों वर्ष पुरानी है - अर्थात, यह प्रमाणित हो गया कि मूसा के समय से भी बहुत पहले से लोग लिखना जानते थे, और लिखित नियम विद्यमान थे। बाद में हुई अन्य पुरातत्व खोजों ने भी यह प्रमाणित कर दिया है कि मूसा के समय से पहले भी लिखित सामग्री विद्यमान थी, भाषा विकसित हो चुकी थी। इसी प्रकार का एक अन्य तर्क यह दिया गया था कि अब्राहम के साथ उत्पत्ति की पुस्तक में जिन हित्ती लोगों का उल्लेख आया है, उनका बाइबल के बाहर कोई प्रमाण नहीं है। किन्तु पुरातत्व खोजों ने इस दावे को भी झूठा दिखा दिया और हित्तियों की प्राचीन सभ्यता को उजागर कर दिया।

            आज तक भी, सारे संसार भर में, और सारे इतिहास में, बाइबल को गलत या झूठा प्रमाणित करने, उसे नष्ट करने के सभी प्रयास असफल ही रहे हैं। बाइबल को नष्ट करने का प्रयास करने वाले नाश हो गए, किन्तु परमेश्वर का वचन बाइबल आज भी स्थिर और दृढ़ स्थापित है, अटल है, अचूक है।

 

बाइबल पाठ: यशायाह 40:1-8

यशायाह 40:1 तुम्हारा परमेश्वर यह कहता है, मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति!

यशायाह 40:2 यरूशलेम से शान्ति की बातें कहो; और उस से पुकार कर कहो कि तेरी कठिन सेवा पूरी हुई है, तेरे अधर्म का दण्ड अंगीकार किया गया है: यहोवा के हाथ से तू अपने सब पापों का दूना दण्ड पा चुका है।

यशायाह 40:3 किसी की पुकार सुनाई देती है, जंगल में यहोवा का मार्ग सुधारो, हमारे परमेश्वर के लिये अराबा में एक राजमार्ग चौरस करो।

यशायाह 40:4 हर एक तराई भर दी जाए और हर एक पहाड़ और पहाड़ी गिरा दी जाए; जो टेढ़ा है वह सीधा और जो ऊंचा नीचा है वह चौरस किया जाए।

यशायाह 40:5 तब यहोवा का तेज प्रगट होगा और सब प्राणी उसको एक संग देखेंगे; क्योंकि यहोवा ने आप ही ऐसा कहा है।

यशायाह 40:6 बोलने वाले का वचन सुनाई दिया, प्रचार कर! मैं ने कहा, मैं क्या प्रचार करूं? सब प्राणी घास हैं, उनकी शोभा मैदान के फूल के समान है।

यशायाह 40:7 जब यहोवा की सांस उस पर चलती है, तब घास सूख जाती है, और फूल मुर्झा जाता है; नि:सन्देह प्रजा घास है।

यशायाह 40:8 घास तो सूख जाती, और फूल मुर्झा जाता है; परन्तु हमारे परमेश्वर का वचन सदैव अटल रहेगा।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 81 -83
  • रोमियों 11:19-36

मंगलवार, 10 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – अनुपम एवं विशिष्ट – 6

 

6. प्रसार और अनुवाद में अनुपम

            प्रसार: किसी पुस्तक के बारे में यह सुनना कोई असामान्य बात नहीं है कि उसकी कुछ हज़ार या दसियों हज़ार प्रतियां बिक गई हैं, और वह सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकों के सूची में सम्मिलित हो गई है। ऐसी पुस्तकों की संख्या बहुत कम है जिनकी लाखों या दसियों लाख प्रतियों की बिक्री हुई है; ऐसी पुस्तकें तो और भी कम हैं जिनकी बिक्री या वितरित हुई प्रतियों की संख्या करोड़ या करोड़ों में हो। ऐसे में यह भौंचक्का कर देने वाली बात है कि संसार के इतिहास में बाइबल ही एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसकी संसार भर में विभिन्न भाषाओं में बिक्री अथवा वितरित हुई प्रतियों की संख्या अरबों में है। छपाई के इतिहास के आरंभ होने से लेकर आज तक, बाइबल ही एकमात्र ऐसी पुस्तक है जो लगातार, बिना कभी भी किसी अन्य पुस्तक को स्थान दिए, संसार की सर्वाधिक बिकने तथा वितरित होने वाली पुस्तक रही है।

            संसार भर में बाइबल को प्रकाशित करने वाली अनेकों संस्थाएं हैं; हर देश में बाइबल को प्रकाशित करने वाली अपनी संस्थाएं हैं। यूनाइटिड बाइबल सोसायटी, एक ऐसी संस्था है जो संसार भर में बाइबल प्रकाशन और वितरण का कार्य करती है; सारे संसार में उसकी शाखाएं और दफ्तर हैं। उनके सभी शाखाओं और दफ्तरों द्वारा 1998 में  वितरित की गई बाइबलों की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने तब संसार भर में 208 लाख सम्पूर्ण बाइबल, तथा इसके अतिरिक्त 201 लाख नए या पुराने नियम की प्रतियाँ वितरित की थीं। यदि बाइबल के सभी स्वरूपों – सम्पूर्ण बाइबल, पुराना या नए नियम की प्रतियाँ, बाइबल के कुछ भाग जैसे कि बाइबल की कोई पुस्तक, बाइबल के कुछ अंश, या किसी विषय पर बाइबल के संकलित अंशों के लेख आदि की कुल गणना देखी जाए तो यह संख्या 5850 लाख पहुँच जाती है – और यह केवल यूनाइटिड बाइबल सोसायटीस द्वारा प्रकाशित तथा वितरित की गई बाइबल या उसके भाग अथवा अंश की संख्या है। यदि संसार भर में अन्य संस्थाओं द्वारा किए गए ऐसे ही वितरण के आँकड़े एकत्रित किए जाएं, और आज के समय तक के किए गए कार्य को देखा जाए, तो अनुमान लगाइए कि संख्या कहाँ पहुँचेगी। संसार के इतिहास में कोई अन्य पुस्तक नहीं है जो बाइबल के प्रकाशन अथवा वितरण के आँकड़ों के कहीं निकट भी आती है। यदि बाइबल और उसके भागों की संसार भर में इतनी माँग न होती, तो यह कार्य कैसे संभव होता; वह भी सारे संसार में, और छपाई के आरंभ से लेकर आज दिन तक, निरंतर? संसार भर में बाइबल, या बाइबल के भाग, या बाइबल के अंश ही सर्वाधिक पढ़े जाने वाले लेख हैं। विचार करने वाली बात है, बाइबल और उसके संदेश में कुछ तो विलक्षण तथा अनुपम होगा, कि उनकी इतनी माँग संसार भर में बनी हुई है।

            अनुवाद: जैसे प्रभावशाली और विस्मित करने वाले बाइबल के प्रकाशन और वितरण के आँकड़े हैं, उसी के समान प्रभावशाली और विस्मित करने वाले बाइबल के अनुवादों से संबंधित आँकड़े भी हैं।  

            संसार भर में छपने वाली अधिकांश पुस्तकें अपनी मूल भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में अनुवाद ही नहीं होती हैं। जो अनुवाद भी होती हैं, वो अधिकांशतः दो या तीन भाषाओं में अनुवाद होती हैं। बहुत ही कम पुस्तकें हैं जो अपनी संपूर्णता या भागों में भी 10 से लेकर 20 विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुई हैं। आज संसार की ज्ञात 6500 भाषाओं और बोलियों में से अधिकांश भाषाओं या बोलियों में बाइबल, या बाइबल का कोई भाग, अथवा अंश अनुवाद किया जा चुका है, और उसे प्रसारित किया गया है – छापे हुए स्वरूप में, अथवा औडियो रिकॉर्डिंग के रूप में; उन भाषाओं में भी जो केवल मौखिक हैं, जिनके लिखने के लिए कोई वर्णमाला तथा अक्षर नहीं हैं। जिन भाषाओं में केवल बाइबल के अंश हैं, उनमें बाइबल के भागों का अनुवाद ज़ारी है; और जिनमें अंश तथा भाग उपलब्ध हैं, उनमें सम्पूर्ण बाइबल का अनुवाद होना ज़ारी है। जैसे जैसे माँग बढ़ती जाती है, कार्य भी बढ़ता जाता है, और उपलब्ध हो जाने वाले अंश अथवा भाग या बाइबल वितरण के लिए उपयोग होते जाते हैं, वितरित होने लगते हैं। यदि यह कार्य औडियो रिकॉर्डिंग के रूप में है, तो उसे उसी स्वरूप में विभिन्न माध्यमों के द्वारा वितरित किया जाता है। कठिन प्रयासों और बाधाओं के बावजूद, संसार के सभी भू-भाग के लोगों के पास परमेश्वर का वचन, उनकी अपनी भाषा अथवा बोली में, उपलब्ध करवाया जा रहा है। अनेकों संस्थाएं संसार भर में इस कार्य में लगी हुई हैं; कुछ स्थानीय है, कुछ अंतर्राष्ट्रीय हैं; किन्तु सभी का यही प्रयास है कि संसार का कोई भू-भाग, कोई भाषा या बोली का समुदाय, उनकी अपनी भाषा में परमेश्वर के वचन से वंचित न रह जाए।

            अब यह बाइबल के आलोचकों और विरोधियों के लिए विचार करने और उत्तर ढूँढने की बात है कि बाइबल और उसके संदेश में आखिर ऐसा क्या है जो सारे संसार के सभी इलाकों में लोगों को प्रेरित कर रहा है कि अनेकों बाधाओं, विरोध, और समस्याओं का सामना करते हुए भी, बाइबल में विश्वास करने वाले, उसे संसार के हर व्यक्ति, हर समुदाय तक पहुंचाने में लगे हुए हैं। संसार के इतिहास में क्या कोई अन्य ऐसा ग्रंथ अथवा पुस्तक है जिसका इतना व्यापक प्रसार एवं अनुवाद किया गया हो? बाइबल में कुछ तो होगा जो लोगों में उसके संदेश के लिए एक भूख, एक लालसा उत्पन्न कर रहा है; और जिनके पास बाइबल और उसका संदेश है, उन्हें किसी भी कीमत पर उस संदेश को सारे संसार के सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रेरित कर रहा है, और करवाता जा रहा है!

            प्रभु यीशु मसीह ने जगत के अंत और सभी लोगों के न्याय के लिए जो चिह्न दिए थे (मत्ती 24 अध्याय), वे सभी पूरे होते जा रहे हैं; आज के विषय से संबंधित एक महत्वपूर्ण चिह्न है: “और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा” (मत्ती 24:14)। अब आप स्वयं देख लीजिए कि जगत अपने अंत और न्याय के कितना निकट खड़ा है। क्या आप अपने जीवन का हिसाब प्रभु परमेश्वर को देने के लिए तैयार हैं? यदि नहीं तो आज, अभी, जब अवसर है, और प्रभु का अनुग्रह उपलब्ध है, तो स्वेच्छा तथा सत्यनिष्ठा से, अपने पापों को स्वीकार करके, उन से पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से उनके लिए क्षमा माँगकर, प्रभु यीशु को अपना जीवन समर्पित कीजिए और उसके वचन बाइबल के अध्ययन एवं पालन में समय लगाइए। सच्चे और समर्पित मन से की गई एक प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मेरे पाप क्षमा कर; मुझे अपनी शरण में ले, और मेरा जीवन बदल दे” आपको अनन्तकाल के लिए परमेश्वर की संतान और स्वर्गीय आशीषों का वारिस बना देगी – विलंब न करें, निर्णय अभी लें और उसका पालन करें।

 

बाइबल पाठ: 2 पतरस 3:8-18

2 पतरस 3:8 हे प्रियो, यह एक बात तुम से छिपी न रहे, कि प्रभु के यहां एक दिन हजार वर्ष के बराबर है, और हजार वर्ष एक दिन के बराबर हैं।

2 पतरस 3:9 प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के विषय में देर नहीं करता, जैसी देर कितने लोग समझते हैं; पर तुम्हारे विषय में धीरज धरता है, और नहीं चाहता, कि कोई नाश हो; वरन यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले।

2 पतरस 3:10 परन्तु प्रभु का दिन चोर के समान आ जाएगा, उस दिन आकाश बड़ी हड़हड़ाहट के शब्द से जाता रहेगा, और तत्व बहुत ही तप्त हो कर पिघल जाएंगे, और पृथ्वी और उस पर के काम जल जाएंगे।

2 पतरस 3:11 तो जब कि ये सब वस्तुएं, इस रीति से पिघलने वाली हैं, तो तुम्हें पवित्र चाल चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होना चाहिए।

2 पतरस 3:12 और परमेश्वर के उस दिन की बाट किस रीति से जोहना चाहिए और उसके जल्द आने के लिये कैसा यत्न करना चाहिए; जिस के कारण आकाश आग से पिघल जाएंगे, और आकाश के गण बहुत ही तप्त हो कर गल जाएंगे।

2 पतरस 3:13 पर उस की प्रतिज्ञा के अनुसार हम एक नए आकाश और नई पृथ्वी की आस देखते हैं जिन में धामिर्कता वास करेगी।

2 पतरस 3:14 इसलिये, हे प्रियो, जब कि तुम इन बातों की आस देखते हो तो यत्न करो कि तुम शान्ति से उसके सामने निष्कलंक और निर्दोष ठहरो।

2 पतरस 3:15 और हमारे प्रभु के धीरज को उद्धार समझो, जैसे हमारे प्रिय भाई पौलुस न भी उस ज्ञान के अनुसार जो उसे मिला, तुम्हें लिखा है।

2 पतरस 3:16 वैसे ही उसने अपनी सब पत्रियों में भी इन बातों की चर्चा की है जिन में कितनी बातें ऐसी है, जिनका समझना कठिन है, और अनपढ़ और चंचल लोग उन के अर्थों को भी पवित्र शास्त्र की और बातों के समान खींच-तान कर अपने ही नाश का कारण बनाते हैं।

2 पतरस 3:17 इसलिये हे प्रियो तुम लोग पहिले ही से इन बातों को जान कर चौकस रहो, ताकि अधर्मियों के भ्रम में फंस कर अपनी स्थिरता को हाथ से कहीं खो न दो।

2 पतरस 3:18 पर हमारे प्रभु, और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते जाओ। उसी की महिमा अब भी हो, और युगानुयुग होती रहे। आमीन।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 79 -80
  • रोमियों 11:1-18

सोमवार, 9 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – अनुपम एवं विशिष्ट – 5


5. सत्यवादी और स्पष्टवादी होने में अनुपम

            सुप्रसिद्ध और विश्व-विख्यात बाइबल कॉलेज, डैलस बाइबल सेमीनरी के संस्थापक तथा भूतपूर्व अधिपति, ल्यूइस एस. शेफर ने कहा था, “बाइबल ऐसी पुस्तक नहीं है जिसे कोई मनुष्य, यदि वह लिखना चाहता, तो वैसा लिख पाता जैसी वह है; और न ही यह ऐसी पुस्तक है जिसे यदि वह वैसे लिख पाता जैसी वह है, तो फिर वह उसे लिखना चाहता।” उनकी यह बात बहुत अटपटी लगती है, और तुरंत समझ में नहीं आती है ; किन्तु बिलकुल सटीक और सही है, क्योंकि उन्होंने यह बात बाइबल के पूर्णतः सत्यवादी और स्पष्टवादी होने के संदर्भ में कही थी।

            बाइबल के परमेश्वर के लिए, उसके इस सत्य-वचन में लिखा गया है: "सृष्टि की कोई वस्तु उस से छिपी नहीं है वरन जिस से हमें काम है, उस की आंखों के सामने सब वस्तुएं खुली और बेपरदा हैं" (इब्रानियों 4:13); तथा बाइबल के लिए लिखा गया है, "सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है" (यूहन्ना 17:17); "तेरा सारा वचन सत्य ही है; और तेरा एक एक धर्ममय नियम सदा काल तक अटल है" (भजन 119:160)। यह केवल कहने की बात नहीं है, वरन बाइबल का के परम-सत्यों में से एक है। बाइबल ही एकमात्र ऐसी पुस्तक है जो अपने पात्रों, प्रमुख लोगों, नायकों, और बाइबल के लेखकों तक के भी जीवन, व्यवहार, और पापों को बड़ी स्पष्टता तथा पूर्ण सत्यता के साथ प्रकट करती है और बताती है। चाहे वे परमेश्वर द्वारा चुने हुए लोग ही क्यों न हों, और उनके उस व्यवहार या बात से लोगों को उँगली उठाने और लांछन लगाने के अवसर ही क्यों न मिले, किन्तु बाइबल कभी भी सत्य कहने और स्पष्टता से कहने से बचती नहीं है।

            बाइबल अपने किसी भी पात्र की किसी भी कमज़ोरी, पाप की प्रवृत्ति, झूठ, छल, शारीरिक भावनाओं, आदि को छुपाने, या उनके लिए बहाने बनाने, अथवा उन्हें किसी भक्ति अथवा धार्मिक आवरण में ढाँप कर उन्हें उचित और स्वीकार्य ठहराने के प्रयास कदापि नहीं करती है; वरन गलत और अनुचित को दो टूक गलत और अनुचित बताकर उसके प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण और न्याय को भी साथ ही बताया देती है। बाइबल परमेश्वर का वचन है, उसकी हर बात सत्य पर केंद्रित है, किसी कल्पना, धारणा, अवसरवादिता, अथवा छल पर नहीं। उसमें सत्य और असत्य, भला और बुरा, उत्तम और निकृष्ट, आशा और निराशा, जीवन का आनंद और पीड़ा, सभी कुछ साफ, स्पष्ट, सत्य वचनों में लिखा और बताया गया है। बाइबल के इस सत्यवादी और स्पष्टवादी होने के दावे को आज तक कभी भी, कोई भी, कितने ही प्रयासों के बावजूद कभी गलत प्रमाणित नहीं करने पाया है; इसलिए बाइबल की हर बात की सत्यता को बिना किसी संशय के स्वीकार किया जा सकता है, परख कर देखा जा सकता है

            बाइबल की इस अभूतपूर्व तथा अनुपम सत्यवादिता एवं स्पष्टवादिता के कुछ उदाहरणों को, बाइबल के कुछ पात्रों, घटनाओं, और लेखों में से देखते हैं:

·        बाइबल के प्रमुख नायकों, वंशों के कुल-पिताओं, के पाप स्पष्ट लिखे गए हैं:

o   उत्पत्ति 9:20-21 – नूह दाखमधु पीकर मतवाला हुआ,  और अनुचित दशा में व्यवहार किया।

o   उत्पत्ति 12:11-13 – अब्राहम ने अपनी जान बचाने के लिए अपनी पत्नी से झूठ बोलने को कहा तथा उसे अन्य पुरुषों द्वारा भ्रष्ट किए जाने के जोखिम में डाला।

o   उत्पत्ति 27:21-27 – याकूब ने अपने अंधे पिता से झूठ बोलकर तथा उसको धोखा देकर अपने भाई की आशीषों को प्राप्त किया।

·        परमेश्वर के लोगों, इस्राएल, के पापों को सार्वजनिक करके उनकी भर्त्सना की गई – व्यवस्थाविवरण 9:7, 24; भजन 78:8; 1 शमूएल 8:8; प्रेरितों 7:51-53; आदि।

·        राजा दाऊद ने अपने वफादार सेनापति ऊरिय्याह की पत्नी के साथ व्यभिचार किया, तथा उसके गर्भवती होने पर अपने पाप को छुपाने के लिए ऊरिय्याह को धोखे से मरवा डाल; जिसके लिए परमेश्वर ने उसे उसी के भरे दरबार में दोषी ठहराया और दंडित किया (2 शमूएल 11 और 12 अध्याय)।

·        सुसमाचार लेखक तथा प्रचारक अपनी कमियों और पापों का अंगीकार अपने द्वारा लिखे गए वचनों में लिखते हैं:

o   मत्ती 26 :31-56 – शिष्यों ने प्रभु के साथ बने रहने के दावे किए, किन्तु संकट आते ही उसे छोड़ कर भाग गए, पतरस ने तो तीन बार, एक दासी लड़की के सामने भी, प्रभु को जानने से भी इनकार कर दिया।

o   मरकुस 6:52; 8:18 – शिष्यों ने प्रभु द्वारा सिखाए और समझाने के बाद भी अपने मन की कठोरता के कारण अविश्वास के साथ व्यवहार किया।

o   लूका 8:24-25 – शिष्यों ने प्रभु यीशु को जानते और उसके साथ रहते हुए भी अविश्वास के साथ व्यवहार किया।

o   मरकुस 9:33-35 – प्रभु द्वारा दीनता और नम्रता का जीवन जीने के बारे में सिखाए जाने के बावजूद शिष्यों में एक-दूसरे से बड़ा बनने की चाह रहती थे, और वे इसके लिए प्रभु से छिपकर आपस में विवाद भी करते थे।

o   मरकुस 10:35-37 – प्रभु के चुने हुए बारह में से दो शिष्यों, याकूब और यूहन्ना, ने स्वार्थी होकर अपने लिए स्वर्ग में औरों से उत्तम आशीष का स्थान सुनिश्चित करने का प्रयास किया।

o   1 कुरिन्थियों 1:11 – प्रभु के विश्वासी लोगों की मंडली में परस्पर झगड़े होते थे; मंडलियों के लोगों के ऐसे व्यवहार से पौलुस प्रेरित दुखी था (1 कुरिन्थियों 4:21; 2 कुरिन्थियों 2:3-4; गलातियों 3:1)।

 

            ये बाइबल के पात्रों, और उनके जीवन के केवल कुछ उदाहरण हैं। किन्तु परमेश्वर ने इन्हीं दुर्बल, बारंबार गलती करते रहने वाले, संसार की दृष्टि में अयोग्य लोगों को लेकर उन्हें अद्भुत रीति से परिवर्तित कर दिया, और अपनी महिमा का कारण बना लिया। प्रभु यीशु मसीह में होकर आज भी परमेश्वर सारे संसार के सभी लोगों में यही करने में लगा हुआ है। जो कोई भी, वह चाहे कैसे भी पाप करने वाला, कैसी भी पृष्ठभूमि से, कोई भी भिन्न दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति क्यों न हो, जो कोई स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करके अपने पापों के लिए उससे क्षमा माँग लेता है, अपना जीवन उसे समर्पित कर देता है, प्रभु परमेश्वर उसे स्वीकार करके, उसका जीवन बदल देता है, उसे अपनी समानता में ढालने लगता है।

 

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 1:17-31

1 कुरिन्थियों 1:17 क्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, वरन सुसमाचार सुनाने को भेजा है, और यह भी शब्दों के ज्ञान के अनुसार नहीं, ऐसा न हो कि मसीह का क्रूस व्यर्थ ठहरे।

1 कुरिन्थियों 1:18 क्योंकि क्रूस की कथा नाश होने वालों के निकट मूर्खता है, परन्तु हम उद्धार पाने वालों के निकट परमेश्वर की सामर्थ्य है।

1 कुरिन्थियों 1:19 क्योंकि लिखा है, कि मैं ज्ञानवानों के ज्ञान को नाश करूंगा, और समझदारों की समझ को तुच्छ कर दूंगा।

1 कुरिन्थियों 1:20 कहां रहा ज्ञानवान? कहां रहा शास्त्री? कहां इस संसार का विवादी? क्या परमेश्वर ने संसार के ज्ञान को मूर्खता नहीं ठहराया?

1 कुरिन्थियों 1:21 क्योंकि जब परमेश्वर के ज्ञान के अनुसार संसार ने ज्ञान से परमेश्वर को न जाना तो परमेश्वर को यह अच्छा लगा, कि इस प्रचार की मूर्खता के द्वारा विश्वास करने वालों को उद्धार दे।

1 कुरिन्थियों 1:22 यहूदी तो चिन्ह चाहते हैं, और यूनानी ज्ञान की खोज में हैं।

1 कुरिन्थियों 1:23 परन्तु हम तो उस क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह का प्रचार करते हैं जो यहूदियों के निकट ठोकर का कारण, और अन्यजातियों के निकट मूर्खता है।

1 कुरिन्थियों 1:24 परन्तु जो बुलाए हुए हैं क्या यहूदी, क्या यूनानी, उन के निकट मसीह परमेश्वर की सामर्थ्य, और परमेश्वर का ज्ञान है।

1 कुरिन्थियों 1:25 क्योंकि परमेश्वर की मूर्खता मनुष्यों के ज्ञान से ज्ञानवान है; और परमेश्वर की निर्बलता मनुष्यों के बल से बहुत बलवान है।

1 कुरिन्थियों 1:26 हे भाइयों, अपने बुलाए जाने को तो सोचो, कि न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान, और न बहुत सामर्थी, और न बहुत कुलीन बुलाए गए।

1 कुरिन्थियों 1:27 परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञान वालों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है, कि बलवानों को लज्जित करे।

1 कुरिन्थियों 1:28 और परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्‍छों को, वरन जो हैं भी नहीं उन को भी चुन लिया, कि उन्हें जो हैं, व्यर्थ ठहराए।

1 कुरिन्थियों 1:29 ताकि कोई प्राणी परमेश्वर के सामने घमण्ड न करने पाए।

1 कुरिन्थियों 1:30 परन्तु उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा अर्थात धर्म, और पवित्रता, और छुटकारा।

1 कुरिन्थियों 1:31 ताकि जैसा लिखा है, वैसा ही हो, कि जो घमण्ड करे वह प्रभु में घमण्ड करे।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 77 -78
  • रोमियों 10

रविवार, 8 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – अनुपम एवं विशिष्ट – 4

 

4. लेखों के विषयों तथा सामग्री में अनुपम

          बाइबल की पुस्तकों में कई भिन्न प्रकार की साहित्यिक लेखन शैलियाँ हैं, जैसे कि:

                        नियम और व्यवस्था

                        ऐतिहासिक वृतांत

                        स्मृतियाँ

                        दृष्टांत

                        नीतिवचन

                        भजन, कविता, और स्तुति गीत

                        प्रेम-प्रसंग

                        व्यंग्य

                        पत्र  

                        जीवनियाँ

                        आत्म-कथाएं

                        वंशावलियाँ

                        शिक्षाएं

                        भविष्यवाणियाँ

            आदि।

            बाइबल के लेखकों ने सैकड़ों विभिन्न विषयों के बारे में लिखा, तथा बाइबल के लेखों में अनेकों विषयों को संबोधित किया गया है, जिनमें से कई विषय विवादात्मक भी हैं, जिनकी चर्चा या वार्तालाप में प्रतिस्पर्धी विचार उत्पन्न होना सामान्य बात है, जैसे कि विवाह, वैवाहिक संबंध तथा दायित्व, तलाक, पुनः विवाह, समलैंगिक संबंध, व्यभिचार, अधिकारियों की अधीनता, सत्य-वादिता, असत्य-वादिता, चरित्र तथा चरित्र का विकास, बच्चों का पालन-पोषण और शिक्षण, प्रकृति, स्वर्गदूत, परमेश्वर, स्वर्ग, नरक, उद्धार, पाप, पाप-क्षमा, पाप का दंड, परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता और आज्ञाकारिता के परिणाम और प्रतिफल, जीवन, मरण, परमेश्वर के प्रति मनुष्यों के उत्तरदायित्व, अनन्तकाल, आदि।

            इतने भिन्न और असंबंधित प्रतीत होने वाले विषयों और लेखन शैलियों, तथा लेखकों में परस्पर इतनी असमानताएं होने के बावजूद, बाइबल की पहली पुस्तक – उत्पत्ति के आरंभ से लेकर अंतिम पुस्तक – प्रकाशितवाक्य के अंत तक, इन सभी लेखकों ने इन सभी विषयों को एक अद्भुत सामंजस्य और तालमेल के साथ संबोधित किया है। एक ही विषय पर अलग-अलग लेखों और लेखकों में कोई विरोधाभास या दृष्टिकोण की भिन्नता नहीं है; यदि भिन्न लेखों में से उस एक विषय की बातों को संकलित किया जाए, तो वे एक दूसरे के पूरक, एक दूसरे को समझने में सहायक, एक दूसरे से पूर्णतः मेल खाने वाले होते हैं, कभी अलग-अलग बात कहने वाले नहीं। और न ही कोई एक विषय कभी किसी अन्य संबंधित विषय से कोई विवाद उत्पन्न करता है अथवा उसकी बात को काटता या नकारता है। आरंभ से लेकर अंत तक, हर बात, हर विषय, हर लेखक, हर शैली, हमेशा पूरे तालमेल के साथ, एक दूसरे के पूरक और सहायक होकर साथ ही खड़े मिलेंगे, कभी भी एक दूसरे के विरोध में या भिन्न दृष्टिकोण के साथ नहीं।

            इतनी विभिन्नता होते हुए भी सम्पूर्ण बाइबल की हर पुस्तक, हर विषय, हर दृष्टिकोण, हर लेखक, एक ही मुख्य विषय, और एक ही मुख्य पात्र को लेकर वृतांत को विकसित करता जा रहा है, वृतांत और वर्णन को निखारता जा रहा है। बाइबल का मुख्य विषय है पाप में गिरे और फँसे हुए मनुष्यों से परमेश्वर का प्रेम, और उन्हें पाप के दासत्व से छुड़ाने का परमेश्वर का प्रयोजन एवं कार्य; तथा बाइबल का मुख्य पात्र है परमेश्वर के इस प्रयोजन को कार्यान्वित करके सफल बनाने और सभी के लिए उपलब्ध करवाने वाला परमेश्वर का पुत्र – प्रभु यीशु मसीह। जिस प्रकार एक देह में अनेकों भिन्न अंग होते हैं, किन्तु वे सभी साथ मिलकर ही देह को बनाते और चलाते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण बाइबल की हर पुस्तक, हर विषय, हर वर्णन प्रभु यीशु मसीह की इसी एक गाथा के विभिन्न अंग और आयाम हैं। पाप और पाप के दासत्व तथा अनन्तकालीन दुष्प्रभावों और दुष्परिणामों से, मनुष्यों के अपने किसी कार्य अथवा धार्मिकता से नहीं, वरन परमेश्वर के प्रेम, कृपा, दया, और अनुग्रह के द्वारा मनुष्यों की मुक्ति – मनुष्यों का उद्धार, और उस उद्धार से होने वाला उनके जीवनों में परिवर्तन, तथा परमेश्वर के समानता में ढलते जाना ही वह धागा है जो समस्त बाइबल की हर पुस्तक, हर लेख, हर विचार में होकर पिरोया गया है। आरंभ से लेकर अंत तक बाइबल प्रभु यीशु मसीह पर ही केंद्रित है, उसी की सत्य-कथा है ।

            दो लेखकों, गियसलर  और निक्स, ने इसे बड़े मनोहर रीति से व्यक्त किया है: पहले पुराने नियम को देखें तो व्यवस्था और नियम मसीह के लिए नींव रखते हैं; इतिहास की पुस्तकें मसीह के लिए तैयारी को दिखाती हैं; भजन और काव्य पुस्तकें मसीह के लिए अभिलाषा को व्यक्त करते हैं; और भविष्यवाणियाँ मसीह की प्रत्याशा देती हैं। फिर, नए नियम में आकर, सुसमाचारों में मसीह का प्रकट होता है; प्रेरितों के काम में मसीह का सारे संसार में प्रसार है; पत्रियों में मसीह की शिक्षाओं की व्याख्या है; और अंतिम पुस्तक प्रकाशितवाक्य में मसीह में सभी बातों की पूर्ति तथा अनन्त जीवन का आरंभ है।

            संसार में बाइबल के अतिरिक्त, अन्य साहित्य और काव्यों तथा ग्रंथों की कमी नहीं है, और उनमें से अनेकों तो लेखन सामग्री में उत्तम तथा शिक्षाप्रद भी हैं; किन्तु उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जिसमें यह सभी गुण और बातें पाई जाती हों, जो बाइबल के विषय इस लेख में बताई गई हैं। सारे संसार के इतिहास और साहित्य में बाइबल का अपना ही विशिष्ट स्थान है, जिसके निकट और कोई पुस्तक कभी नहीं पहुँच सकी है।

 

बाइबल पाठ: इफिसियों 2:1-10

इफिसियों 2:1 और उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे।

इफिसियों 2:2 जिन में तुम पहिले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है।

इफिसियों 2:3 इन में हम भी सब के सब पहिले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर, और मन की मनसाएं पूरी करते थे, और और लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे।

इफिसियों 2:4 परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उसने हम से प्रेम किया।

इफिसियों 2:5 जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया; (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।)

इफिसियों 2:6 और मसीह यीशु में उसके साथ उठाया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया।

इफिसियों 2:7 कि वह अपनी उस कृपा से जो मसीह यीशु में हम पर है, आने वाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए।

इफिसियों 2:8 क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है।

इफिसियों 2:9 और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।

इफिसियों 2:10 क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं; और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहिले से हमारे करने के लिये तैयार किया।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 74 -76
  • रोमियों 9:16 -33