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मंगलवार, 21 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 27


पाप का समाधान - उद्धार - 23

       पिछले लेखों में एकत्रित किए गए, सीखे तथा समझे गए, पाप और उद्धार, और प्रभु यीशु मसीह के जन्म, जीवन, कार्य, मृत्यु, और पुनरुत्थान से संबंधित तथ्यों के आधार पर आज से हम देखेंगे कि प्रभु यीशु मसीह ने संसार के सभी लोगों के लिए यह पापों की क्षमा, उद्धार, और परमेश्वर से मेल-मिलाप करवाकर, अदन की वाटिका में मनुष्य के पाप द्वारा खोई हुई स्थिति को किस प्रकार सभी मनुष्यों के लिए बहाल किया, और उनके लिए इस आशीष को प्राप्त कर लेने का मार्ग कैसे बना कर दिया, और इस महान कार्य से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों पर भी विचार करेंगे।

       इस बात को समझने के लिए हमें पहले देखी गई बातों को ध्यान में रखना होगा, उन्हें स्मरण करते रहना होगा। पहले हम उन छः अनिवार्यताओं को देखते हैं, जो मनुष्यों के पापों का समाधान और निवारण करके देने वाले उस सिद्ध मनुष्य में होनी अनिवार्य थीं:

      

अनिवार्यता 

प्रभु यीशु मसीह में पूर्ति

वह एक मनुष्य हो।  

   प्रभु यीशु, माता के गर्भ में आने से लेकर उनकी मृत्यु होने तक, हर रीति से पूर्णतः मनुष्य थे; सामान्य साधारण मनुष्यों के सभी अनुभवों में से होकर निकले थे; और वे पूर्णतः परमेश्वर भी थे। 

वह अपने जीवन भर मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में पूर्णतः निष्पाप, निष्कलंक, और पवित्र रहा हो। 

  प्रभु यीशु ने निष्पाप, निष्कलंक, निर्दोष, पवित्र, और सिद्ध जीवन व्यतीत किया। आज तक कभी भी, कोई भी उनके जीवन में किसी भी प्रकार के पाप को न दिखा सका है और न प्रमाणित कर सका है। 

वह अपना जीवन और सभी कार्य परमेश्वर की इच्छा और आज्ञाकारिता में होकर, उसे समर्पित रहकर करे। 

  प्रभु यीशु मसीह ने अपने जन्म से लेकर मृत्यु, पुनरुत्थान, और स्वर्गारोहण तक, पृथ्वी के अपने समय में अपनी हर बात को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार, और परमेश्वर के वचन में उनके बारे में दी गई भविष्यवाणियों के अनुसार ही किया। उन्होंने अपने आप को शून्य किया, परमेश्वर पिता की पूर्ण आज्ञाकारिता में, बिना कोई आनाकानी अथवा संदेह किए बने रहे, और इस आज्ञाकारिता में पापी मनुष्यों के लिए क्रूस की मृत्यु भी सह ली। 

वह स्वेच्छा से सभी मनुष्यों के पापों को अपने ऊपर लेने और उनके दण्ड - मृत्यु को सहने के लिए तैयार हो।  

  क्योंकि प्रभु यीशु निष्पाप और सिद्ध थे, इसलिए मृत्यु का उन पर कोई अधिकार नहीं था। उन्हें किसी भी अन्य स्वाभाविक मनुष्य के समान मृत्यु भोगने की आवश्यकता नहीं थी; और न ही उनमें कोई दोष अथवा अपराध था, जिसके लिए उन्हें कोई दण्ड सहना हो। 

   किन्तु उन्होंने क्रूस की अत्यंत पीड़ादायक और भयानक मृत्यु स्वेच्छा से सभी मनुष्यों के लिए सहन कर ली। 

वह मृत्यु से वापस लौटने की सामर्थ्य रखता हो; मृत्यु उस पर जयवंत नहीं होने पाए। 

  सारे संसार के इतिहास में केवल एक प्रभु यीशु मसीह ही हैं जो मर कर भी अपनी उसी देह में वापस आए। उनका जीवन, उनकी मृत्यु, और उनका मृतकों में से पुनरुत्थान संसार के इतिहास में भली-भांति जाँचा, परखा, और प्रमाणित तथ्य है, जिसे पिछले 2000 वर्षों से लेकर आज तक कोई भी गलत अथवा झूठ प्रमाणित नहीं कर सका है। 

   जिन्होंने उसे गलत प्रमाणित करने के प्रयास किए, वे नहीं करने पाए और उनमें से बहुतेरे अंततः उपलब्ध प्रमाणों के समक्ष प्रभु यीशु मसीह के अनुयायी बन गए, उन्हें अपना उद्धारकर्ता स्वीकार कर लिया। 

वह अपने इस महान बलिदान के प्रतिफलों को सभी मनुष्यों को सेंत-मेंत देने के लिए तैयार हो। 

  प्रभु यीशु ने सदा सब का भला ही किया, अपने बैरियों, विरोधियों, और सताने वालों का भी भला चाहा, उन्हें क्षमा किया, और उनके हित की चाह रखी। 

   उन्होंने अपने जीवन, शिक्षाओं, मृत्यु, और पुनरुत्थान से मिलने वाले लाभ कभी भी अपने पास नहीं रखे; और न ही उनके लिए कभी कोई कीमत लगाई। 

   उन्होंने पाप और मृत्यु पर प्राप्त अपनी विजय को सेंत-मेंत सारे संसार के लिए उपलब्ध करवा दिया, और यह आज भी सारे संसार के सभी लोगों के लिए उपलब्ध है। 

 

       यदि आप अभी भी प्रभु यीशु मसीह में, उनके जीवन, शिक्षाओं, बलिदान, और पुनरुत्थान में; और उनके आपकी वास्तविक पापमय स्थिति को भली-भांति जानने के बावजूद भी आपके लिए उनके प्रेम में विश्वास नहीं करते हैं, तो आप स्वयं भी प्रभु यीशु के जीवन, मृत्यु, और पुनरुत्थान से संबंधित प्रमाणों की जाँच कर सकते हैं, अपने आप को संतुष्ट कर सकते हैं। प्रभु यीशु आपको इस सांसारिक नाशमान जीवन से अविनाशी जीवन में लाना चाहता है; पाप के परिणाम से निकालकर परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप करवाकर अब से लेकर अनन्तकाल के लिए आपको स्वर्गीय आशीषों का वारिस बनाना चाहता है। शैतान की किसी बात में न आएं, उसके द्वारा फैलाई जा रही किसी गलतफहमी में न पड़ें, अभी समय और अवसर के रहते स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप कर लें, अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।” आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा। 

 

बाइबल पाठ: रोमियों 6:5-14 

रोमियों 6:5 क्योंकि यदि हम उस की मृत्यु की समानता में उसके साथ जुट गए हैं, तो निश्चय उसके जी उठने की समानता में भी जुट जाएंगे।

रोमियों 6:6 क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा पुराना मनुष्यत्व उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया, ताकि पाप का शरीर व्यर्थ हो जाए, ताकि हम आगे को पाप के दासत्व में न रहें।

रोमियों 6:7 क्योंकि जो मर गया, वह पाप से छूटकर धर्मी ठहरा।

रोमियों 6:8 सो यदि हम मसीह के साथ मर गए, तो हमारा विश्वास यह है, कि उसके साथ जीएंगे भी।

रोमियों 6:9 क्योंकि यह जानते हैं, कि मसीह मरे हुओं में से जी उठ कर फिर मरने का नहीं, उस पर फिर मृत्यु की प्रभुता नहीं होने की।

रोमियों 6:10 क्योंकि वह जो मर गया तो पाप के लिये एक ही बार मर गया; परन्तु जो जीवित है, तो परमेश्वर के लिये जीवित है।

रोमियों 6:11 ऐसे ही तुम भी अपने आप को पाप के लिये तो मरा, परन्तु परमेश्वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो।

रोमियों 6:12 इसलिये पाप तुम्हारे मरनहार शरीर में राज्य न करे, कि तुम उस की लालसाओं के आधीन रहो।

रोमियों 6:13 और न अपने अंगों को अधर्म के हथियार होने के लिये पाप को सौंपो, पर अपने आप को मरे हुओं में से जी उठा हुआ जानकर परमेश्वर को सौंपो, और अपने अंगों को धर्म के हथियार होने के लिये परमेश्वर को सौंपो।

रोमियों 6:14 और तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के आधीन नहीं वरन अनुग्रह के आधीन हो।

एक साल में बाइबल:

·      सभोपदेशक 7-9

·      2 कुरिन्थियों 13

सोमवार, 20 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 26

 

पाप का समाधान - उद्धार - 22

पिछले तीन सप्ताह से हम मनुष्य के पाप के समाधान और निवारण, और इस कार्य में प्रभु यीशु मसीह की भूमिका के विषय में देखते और सीखते हुए आ रहे हैं। आज से हम इस विषय का निष्कर्ष, प्रभु यीशु मसीह ने यह कार्य किस प्रकार किया को देखना आरंभ करेंगे। अभी तक जो हमने देखा है, आज उसका एक संक्षिप्त पुनः अवलोकन कर लेते हैं; कल प्रभु के द्वारा मनुष्यों के उद्धार के लिए किए गए कार्य को परमेश्वर के वचन बाइबल के पदों के साथ देखेंगे और समझेंगे। 

अभी तक के विवरण का सार इस प्रकार से है:

हमने परमेश्वर के वचन बाइबल की पहली पुस्तक के आरंभिक तीन अध्यायों में से देखा है कि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप में सृजा और अपनी ही श्वास से उसे जीवन प्रदान किया। उसके सृजे जाने के समय मनुष्य निष्पाप, निष्कलंक, निर्दोष, और पवित्र था। उन प्रथम मनुष्यों, आदम और हव्वा, के लिए परमेश्वर ने एक आशीष का स्थान - अदन की वाटिका को लगा कर दिया था, जहाँ पर परमेश्वर उनसे संगति रखता था, उनसे मिला करता था। परमेश्वर ने केवल एक को छोड़, अदन की वाटिका के अन्य सभी फलों को मनुष्य के खाने के लिए उपलब्ध करवाया था; और मनुष्य को चेतावनी दी थी कि जिस दिन उसने वह वर्जित फल खाया, उसी दिन उसकी मृत्यु हो जाएगी। किन्तु शैतान के बहकावे में आकर मनुष्य ने परमेश्वर की बात पर, और उनके प्रति परमेश्वर की भली मनसा पर संदेह किया, परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता की, और उस वर्जित फल को कहा लिया। इसी अनाज्ञाकारिता के कारण पाप का संसार में प्रवेश हुआ, जिसका दुष्प्रभाव सारी सृष्टि में फैल गया और मनुष्य में पाप करने की प्रवृत्ति आ गई, और फिर वंशागत रीति से एक से दूसरी पीढ़ी में चलती चली गई। परिणाम स्वरूप, स्वाभाविक रीति से गर्भ में आने और जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य में पाप का दोष और पाप करने की प्रवृत्ति उसके गर्भ में आने, जन्म लेने से लेकर मृत्यु तक बनी रहती है। 

मृत्यु का अर्थ है एक अपरिवर्तनीय पृथक हो जाना, ऐसा जिसे कोई भी मनुष्य अपने किसी भी प्रयास से पलट कर पहले की स्थिति को बहाल नहीं कर सकता है। मृत्यु दो प्रकार की है - आत्मिक और शारीरिक। आत्मिक मृत्यु अर्थात पाप के कारण परमेश्वर से अलग हो जाना, क्योंकि परमेश्वर पाप के साथ समझौता और संगति नहीं कर सकता है - जिस दिन मनुष्य ने पाप किया, उसी दिन वह परमेश्वर की संगति से पृथक हो गया। शारीरिक मृत्यु, अर्थात शरीर का क्षय होते चले जाना, और अंततः वापस मिट्टी में मिल जाना - यह प्रक्रिया भी पाप करते ही मनुष्य में आरंभ हो गई, और अंततः सभी मनुष्य देर-सवेर मर जाते हैं; मनुष्य के जन्म लेते ही उसकी शारीरिक मृत्यु की ओर निरंतर बढ़ते जाने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है; तथा वह जन्म से ही पाप के प्रभाव के अंतर्गत होने के कारण परमेश्वर से पृथक, अर्थात आत्मिक मृत्यु की दशा में होता है।

मनुष्य के पाप ने परमेश्वर को एक असंभव प्रतीत होने वाली विडंबना में डाल दिया। मनुष्य के प्रति उसका प्रेम, उसे मनुष्य को नाश होते हुए नहीं देखने देता; और परमेश्वर का निष्पक्ष न्यायी और धर्मी होना, उसे पाप को दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ने देता। परमेश्वर कभी झूठ नहीं बोलता, उसकी कही बात सदा पूरी होती है, इसलिए पाप का दण्ड मृत्यु को भी पापी पर लागू किया जाना अनिवार्य था। अब इस विडंबना, इस असंभव प्रतीत होने वाली स्थिति का समाधान और निवारण क्या हो सकता था। जो मनुष्य के लिए असंभव था, परमेश्वर ने ही उसके लिए मार्ग बनाया। एक ऐसा मनुष्य जो निष्पाप, निष्कलंक, निर्दोष, पवित्र, परमेश्वर तथा उसके प्रति परमेश्वर की योजनाओं पर कभी संदेह न करने वाला, परमेश्वर का पूर्ण आज्ञाकारी हो, उसे पाप का दण्ड, परमेश्वर से दूरी और मृत्यु - आत्मिक एवं शारीरिक सहने की कोई आवश्यकता नहीं थी। यह सिद्ध मनुष्य यदि स्वेच्छा से मनुष्यों के पापों को अपने ऊपर लेकर, उनके स्थान पर स्वयं उन पापों का दण्ड अर्थात मृत्यु को सह ले, और मृत्यु को पराजित कर के वापस सदेह जीवित हो उठे, और फिर अपने इस बलिदान तथा पुनरुत्थान के लाभ को सेंत-मेंत सभी मनुष्यों को उपलब्ध करवा दे, तो इस समस्या का समाधान और निवारण हो जाएगा। परमेश्वर की बात भी पूरी हो जाएगी, उसके न्याय के माँग भी पूरी हो जाएगी, मृत्यु का प्रभाव भी जाता रहेगा, और फिर पापों के परिणाम से बचाया गया मनुष्य परमेश्वर की संगति में भी बहाल हो सकता है। 

किन्तु मनुष्य तो पाप के दोष और प्रवृत्ति में आ चुका था, स्वाभाविक रीति से जन्म लेने वाला हर मनुष्य पाप के दोष और प्रवृत्ति के साथ ही जन्म लेता। इसलिए वह तो कभी निष्पाप, निष्कलंक, और निर्दोष हो नहीं सकता था। इसलिए इस समाधान और निवारण को कार्यान्वित करने के लिए एक ऐसे मनुष्य की आवश्यकता थी जिसमें पाप का दोष और प्रवृत्ति भी न हो, और वह उपरोक्त सभी आवश्यकताओं को भी पूरा करता हो। इसलिए परमेश्वर स्वयं एक विशिष्ट रीति से मनुष्य बनकर, प्रभु यीशु मसीह के नाम से संसार में आ गया। परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से प्रभु यीशु ने संसार में एक विशेष रीति से तैयार की गई देह में होकर, जो इस कार्य के लिए समर्पित और आज्ञाकारी कुँवारी, मरियम की कोख में एक भ्रूण के समान रखी गई थी, प्रवेश किया। एक सामान्य मनुष्य के समान वह देह भ्रूण से लेकर मानव शिशु स्वरूप तक उस कोख में विकसित हुई, और उसने जन्म लेने के सारे अनुभव, अन्य किसी भी मनुष्य के समान सहे। फिर एक सामान्य, साधारण मनुष्य के समान दुख-सुख सभी कुछ अनुभव करते हुए प्रभु यीशु शिशु अवस्था से वयस्क हुए, किन्तु उन्होंने कभी भी मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में कोई पाप नहीं किया। लगभग तीस वर्ष की आयु में उन्होंने पृथ्वी की अपनी निर्धारित सेवकाई आरंभ की; लोगों को परमेश्वर के राज्य के आगमन के बारे में सिखाने और सचेत करने, तथा पापों से पश्चाताप करने का आह्वान किया, और सभी की भलाई करते रहे। 

लगभग साढ़े तीन वर्ष की सेवकाई के बाद, उन्हें तब के धर्म के अगुवों ने उनकी स्पष्टवादिता, खराई, और उन धर्म के अगुवों के दोगलेपन को प्रकट करते रहने के कारण उनके प्रति द्वेष और बैर के कारण पकड़ कर उस समय की सबसे क्रूर, पीड़ादायक और वीभत्स मृत्यु, जो समाज के सबसे निकृष्ट और जघन्य अपराध करने वालों को दी जाती थी - क्रूस की मृत्यु, उस समय के उनके शासक, रोमी गवर्नर, के हाथों दिलवाई। प्रभु यीशु मसीह क्रूस पर मारे गए, उन्हें कब्र में कफन में लपेट कर दफनाया गया, और कब्र के मुँह पर पत्थर लगा कर उसे मोहर-बंद कर दिया गया, किन्तु तीसरे दिन वे अपने कहे के अनुसार जीवित हो उठे, सार्वजनिक रीति से लोगों से मिलते रहे, दिखाई देते रहे, लोगों से बात करते रहे, उन्हें सिखाते-समझाते रहे, और फिर अपने शिष्यों की आँखों के सामने स्वर्ग पर उठा लिए गए। अपने स्वर्गारोहण से पहले उन्होंने अपने शिष्यों को आज्ञा दी कि वे सारे संसार में जाकर उनके द्वारा समस्त संसार के सभी लोगों के लिए उपलब्ध करवाए गए पापों की क्षमा और उद्धार के मार्ग के बारे में उन्हें बताऐं और उन्हें प्रभु यीशु के शिष्य बनाएं, प्रभु की बातें सिखाएं। जो स्वेच्छा से प्रभु के द्वारा किए गए कार्य को स्वीकार करेगा, अपने पापों से पश्चाताप करेगा, और अपना जीवन प्रभु यीशु को समर्पित करेगा, वह पापों की क्षमा अर्थात उद्धार या नया जन्म पाकर अनन्तकाल के लिए परमेश्वर की संतान, उसके राज्य का वारिस बन जाएगा, और परमेश्वर की संगति में बहाल हो जाएगा।

प्रभु यीशु ने न तो कभी कोई धर्म दिया, न किसी धर्म को बनाने की शिक्षा अथवा आज्ञा दी, न किसी धर्म-विशेष को मानने-मनवाने, और न ही किसी का भी धर्म परिवर्तन करने की कोई बात अपने शिष्यों से कही। उन्होंने तो सभी मनुष्यों के पाप की प्रवृत्ति और दोष से मन परिवर्तन करने और पाप से क्षमा प्राप्त करने, तथा उनकी शिष्यता एवं आज्ञाकारिता में पापी मनुष्यों को पवित्र जीवन जीने के लिए सक्षम करे जाने की शिक्षा लोगों को बताने, और इसे स्वीकार करने का निर्णय उन लोगों के हाथों में ही छोड़ देने की आज्ञा दी।

प्रभु यीशु ने तो अपना काम कर के दे दिया है; किन्तु क्या आपने उसके इस आपकी ओर बढ़े हुए प्रेम और अनुग्रह के हाथ को थाम लिया है, उसकी भेंट को स्वीकार कर लिया है? या आप अभी भी अपने ही प्रयासों के द्वारा वह करना चाह रहे हैं जो मनुष्यों के लिए कर पाना असंभव है। यदि अभी भी आपने प्रभु यीशु के बलिदान के कार्य को स्वीकार नहीं किया है, तो  अभी समय और अवसर के रहते स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप कर लें, अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।” आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।   


बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 15:1-11 

1 कुरिन्थियों 15:1 हे भाइयों, मैं तुम्हें वही सुसमाचार बताता हूं जो पहिले सुना चुका हूं, जिसे तुम ने अंगीकार भी किया था और जिस में तुम स्थिर भी हो।

1 कुरिन्थियों 15:2 उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता है, यदि उस सुसमाचार को जो मैं ने तुम्हें सुनाया था स्मरण रखते हो; नहीं तो तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ।

1 कुरिन्थियों 15:3 इसी कारण मैं ने सब से पहिले तुम्हें वही बात पहुंचा दी, जो मुझे पहुंची थी, कि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गया।

1 कुरिन्थियों 15:4 ओर गाड़ा गया; और पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा।

1 कुरिन्थियों 15:5 और कैफा को तब बारहों को दिखाई दिया।

1 कुरिन्थियों 15:6 फिर पांच सौ से अधिक भाइयों को एक साथ दिखाई दिया, जिन में से बहुतेरे अब तक वर्तमान हैं पर कितने सो गए।

1 कुरिन्थियों 15:7 फिर याकूब को दिखाई दिया तब सब प्रेरितों को दिखाई दिया।

1 कुरिन्थियों 15:8 और सब के बाद मुझ को भी दिखाई दिया, जो मानो अधूरे दिनों का जन्मा हूं।

1 कुरिन्थियों 15:9 क्योंकि मैं प्रेरितों में सब से छोटा हूं, वरन प्रेरित कहलाने के योग्य भी नहीं, क्योंकि मैं ने परमेश्वर की कलीसिया को सताया था।

1 कुरिन्थियों 15:10 परन्तु मैं जो कुछ भी हूं, परमेश्वर के अनुग्रह से हूं: और उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ परन्तु मैं ने उन सब से बढ़कर परिश्रम भी किया: तौभी यह मेरी ओर से नहीं हुआ परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से जो मुझ पर था।

1 कुरिन्थियों 15:11 सो चाहे मैं हूं, चाहे वे हों, हम यही प्रचार करते हैं, और इसी पर तुम ने विश्वास भी किया।

एक साल में बाइबल:

·      सभोपदेशक 4-6

·      2 कुरिन्थियों 12 

रविवार, 19 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 25

 

पाप का समाधान - उद्धार - 21

       पिछले लेखों में हम देखते आ रहे हैं कि मनुष्य के पाप से उत्पन्न हुई स्थिति के समाधान और निवारण के लिए एक ऐसे सिद्ध मनुष्य की आवश्यकता थी जो परमेश्वर के पूर्ण आज्ञाकारिता में जीवन व्यतीत करे, और सभी के पापों के लिए अपने आप को स्वेच्छा से बलिदान करके, उनके लिए मृत्यु को सह ले। किन्तु उसे मृत्यु को पराजित भी करना था, अर्थात मृतकों में से लौट कर आना था, जिससे मनुष्यों पर से मृत्यु की पकड़ मिट जाए, और फिर उसके द्वारा दिए गए अपने बलिदान, अपने पुनरुत्थान, और मृत्यु पर विजय को सारे संसार के सभी मनुष्यों के साथ सेंत-मेंत बांटने को तैयार हो। अभी तक हमने देखा कि प्रभु यीशु मसीह ही वह एकमात्र ऐसा निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, सिद्ध मनुष्य था जिसने अपने पृथ्वी के जीवन में इन सभी आवश्यक बातों को पूरा किया, और मृतकों में से जी भी उठा। 

आज हम परमेश्वर के वचन बाइबल से देखेंगे कि प्रभु यीशु ने अपने जीवन, बलिदान, और पुनरुत्थान के लाभ को सेंत-मेंत समस्त मानवजाति को उपलब्ध भी करवा दिया है। उसने अपने लिए कुछ नहीं रख छोड़ा, अपना सब कुछ हम पापी मनुष्यों के प्रति अपने प्रेम के अंतर्गत न्योछावर कर दिया। यह हम पापी मनुष्यों के प्रति उसका अनुग्रह है, अर्थात उसकी वह भलाई है, जिसके हम योग्य नहीं हैं, और न ही जिसे कभी अपने किसी धर्म-कर्म, रीतियों, और धार्मिकता के कार्यों के द्वारा कमा सकते हैं। भला एक पापी मनुष्य कुछ भी कर ले, किन्तु क्या वह कभी भी एक निर्दोष, निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र मनुष्य से बढ़कर योग्य हो सकता है? क्या पापी मनुष्य उस सिद्ध के द्वारा अपने प्राणों के एक भयानक, वीभत्स, अत्यंत यातनाएँ सहते हुए दिए गए बलिदान की कोई कीमत लगा सकता है; और फिर उस कीमत को चुकाने के योग्य हो सकता है? मनुष्य केवल प्रभु यीशु के कार्य को कृतज्ञ और धन्यवादी होकर एक भेंट के रूप में स्वीकार ही कर सकता है; उसे किसी भी रीति से प्रभु से खरीद नहीं सकता है, प्रभु के कार्य के प्रत्युत्तर में उसके समान या उससे बढ़कर कुछ ऐसा नहीं कर सकता है जिसके सहारे वह फिर प्रभु के कार्य के लाभों कीमत चुका कर उससे उसको प्राप्त कर सके। 

परमेश्वर के वचन बाइबल में लिखे इन पदों पर ध्यान कीजिए: “पर जैसा अपराध की दशा है, वैसी अनुग्रह के वरदान की नहीं, क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध से बहुत लोग मरे, तो परमेश्वर का अनुग्रह और उसका जो दान एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के अनुग्रह से हुआ बहुतेरे लोगों पर अवश्य ही अधिकाई से हुआ। और जैसा एक मनुष्य के पाप करने का फल हुआ, वैसा ही दान की दशा नहीं, क्योंकि एक ही के कारण दण्ड की आज्ञा का फैसला हुआ, परन्तु बहुतेरे अपराधों से ऐसा वरदान उत्पन्न हुआ, कि लोग धर्मी ठहरे। क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कारण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्म रूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे। इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ। क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे” (रोमियों 5:15-19)। इन पदों से प्रकट बातें हैं:

  • प्रभु यीशु मसीह द्वारा किया गया कार्य, परमेश्वर द्वारा अनुग्रह के वरदान समान उपलब्ध करवाया गया है। 
  • यह कुछ सीमित और परिभाषित लोगों के लिए नहीं वरन “बहुतेरों” के लिए है; अर्थात उनके लिए जो उसके इस बलिदान और अनुग्रह की भेंट को स्वीकार कर लेंगे।
  • जो भी इस प्रभु यीशु से उसके इस अनुग्रह के दान को स्वीकार करेगा, वही परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी ठहरेगा; और प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनन्त जीवन में राज्य करेगा। 
  • प्रभु यीशु मसीह का यह कार्य “सब मनुष्यों के लिए” उन्हें अनन्त जीवन के लिए धर्मी ठहराए जाने के लिए है; सभी के लिए पर्याप्त है, उपलब्ध है। किन्तु इसे स्वीकार अथवा अस्वीकार करना, प्रत्येक व्यक्ति का अपना निर्णय है। 
  • प्रभु यीशु मसीह द्वारा की गई परमेश्वर की आज्ञाकारिता, आदम और हव्वा द्वारा की गई अनाज्ञाकारिता के परिणामों को पलट कर वापस लोगों को धर्मी ठहराने के लिए सक्षम और पर्याप्त है। 

            प्रभु यीशु का यह कार्य सारे संसार के सभी मनुष्यों के लिए है, उसके अनुग्रह से उसके द्वारा समस्त मानवजाति को दान के समान उपलब्ध करवाया गया है। दान को कृतज्ञता के साथ स्वीकार तथा प्रयुक्त किया जाता है; दान को किसी भी प्रकार से मोल लेने का प्रयास करना, उस दान की कीमत और महत्व को गौण करना, तथा उस दान और दान देने वाले, दोनों का ही अपमान करना है। 

इसी प्रकार से प्रभु ने अपने पुनरुत्थान और उससे मृत्यु पर मिली विजय को भी अपने अनुग्रह के दान के समान समस्त मानव जाति के लिए सेंत-मेंत उपलब्ध करवा दिया है: “इसलिये जब कि लड़के मांस और लहू के भागी हैं, तो वह आप भी उन के समान उन का सहभागी हो गया; ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्ति मिली थी, अर्थात शैतान को निकम्मा कर दे। और जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा ले” (इब्रानियों 2:14-15)।

प्रभु यीशु ने हम पापी मनुष्यों के उद्धार और परमेश्वर से मेल-मिलाप को बहाल करवाने के लिए जो कुछ भी आवश्यक था, वह सब संपूर्ण करके दे दिया, उसे हमें सेंत-मेंत में अर्थात मुफ़्त में, उपलब्ध भी करवा दिया। यह उद्धार और बहाली परमेश्वर की ओर से हमारे प्रति उसके अनुग्रह का कार्य है, जिसे वह हमारे प्रति अपने प्रेम के अंर्तगत एक दान, एक भेंट के रूप में उपलब्ध करवाता है। भेंट या दान इसलिए, क्योंकि किसी मनुष्य में यह योग्यता अथवा क्षमता नहीं है कि वह प्रभु परमेश्वर यीशु मसीह के द्वारा किए गए इस कार्य के लाभ को मोल ले सके; और यदि परमेश्वर इसकी कोई कीमत लगा देता, तो उनका क्या होता जो किसी भी कारण से वह कीमत चुका पाने में असमर्थ होते - वे तो फिर उद्धार के लाभ से वंचित रह जाते। परमेश्वर सभी से समान प्रेम करता है, इसलिए सभी के लिए, वह कोई भी, कैसा भी, कहीं भी क्यों न हो, सभी को एक समान अवसर प्रदान किया है।

प्रभु यीशु ने तो अपना काम कर के दे दिया है; किन्तु क्या आपने उसके इस आपकी ओर बढ़े हुए प्रेम और अनुग्रह के हाथ को थाम लिया है, उसकी भेंट को स्वीकार कर लिया है? या आप अभी भी अपने ही प्रयासों के द्वारा वह करना चाह रहे हैं जो मनुष्यों के लिए कर पाना असंभव है। यदि अभी भी आपने प्रभु यीशु के बलिदान के कार्य को स्वीकार नहीं किया है, तो  अभी समय और अवसर के रहते स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप कर लें, अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।” आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा। 

बाइबल पाठ: रोमियों 5:6-11 

रोमियों 5:6 क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्तिहीनों के लिये मरा।

रोमियों 5:7 किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो र्दुलभ है, परन्तु क्या जाने किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी हियाव करे।

रोमियों 5:8 परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।

रोमियों 5:9 सो जब कि हम, अब उसके लहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा क्रोध से क्यों न बचेंगे?

रोमियों 5:10 क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे?

रोमियों 5:11 और केवल यही नहीं, परन्तु हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा जिस के द्वारा हमारा मेल हुआ है, परमेश्वर के विषय में घमण्ड भी करते हैं।

 

एक साल में बाइबल:

·      सभोपदेशक 1-3

·      2 कुरिन्थियों 11:16-33

शनिवार, 18 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 24


पाप का समाधान - उद्धार - 20

       पिछले लेख में हमने प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान और उसके महत्व को देखना आरंभ किया था। हमने देखा था कि यदि प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान मसीही विश्वास में से हटा दिया जाए, या उसे झूठ प्रमाणित कर दिया जाए, तो फिर मसीही विश्वास, संसार के किसी भी अन्य धर्म से भिन्न नहीं रह जाता है, उसका महत्व समाप्त हो जाता है। मनुष्यों के पापों का समाधान और निवारण प्रदान करने वाले सिद्ध मनुष्य के लिए यह अनिवार्य था कि वह मनुष्यों पर से मृत्यु के प्रभाव को मिटा दे। क्योंकि प्रभु यीशु का यह पुनरुत्थान इतना अधिक महत्व रखता था, शैतान और उसके राज्य के लिए इतना घातक था, इसीलिए प्रभु यीशु के पुनरुत्थान के साथ ही उसे झुठलाने के प्रयास भी शैतान द्वारा फैलाए जाने लगे। 

प्रभु यीशु के पुनरुत्थान को नकारने, उसे झूठ दिखाने के प्रयासों के लिए जो मनगढ़ंत बातें कही जाती हैं, वे प्रभु यीशु के मारे जाने, गाड़े जाने और तीसरे दिन मृतकों में से जी उठने के बाइबल में दिए विवरण से कदापि मेल नहीं खाती हैं; और इन कहानियों की पुष्टि के लिए कोई भी प्रमाण विद्यमान नहीं हैं। सामान्यतः लोगों में फैलाई गई मन-गढ़न्त बातें हैं:

  •  पुनरुत्थान को झूठा ठहराने का पहला प्रयास तो पुनरुत्थान के दिन ही किया गया था – मत्ती 28:11-15 – लोगों में यह बात फैला दी गई कि प्रभु जी नहीं उठा, वरन उसकी लोथ उसके चेलों ने चुरा ली – किन्तु कोई भी, कभी भी, उन भयभीत और जान बचाकर छुपे हुए शिष्यों के पास से उस लोथ को निकलवाकर उनके द्वारा किए जा रहे प्रभु के पुनरुत्थान के प्रचार को झूठ प्रमाणित नहीं कर सका।
  • प्रभु की लोथ चुराने से संबंधित कुछ अन्य कहानियाँ यह भी हैं:
    • अरिमथिया के यूसुफ ने, जिसने निकुदेमुस के साथ मिलाकर प्रभु यीशु को दफनाया था (यूहन्ना 19:38-42), उसी ने प्रभु को किसी और स्थान पर ले जाकर दफना दिया, क्योंकि उस दिन सबत आरंभ होने वाला था, इसलिए उसे यह कार्य शीघ्रता से करना पड़ा था। - यूसुफ क्योंकि एक गुप्त शिष्य था, इसलिए उसके द्वारा बिना अन्य शिष्यों को इसके विषय बताए, किसी और स्थान पर ले जाकर दफनाना उचित नहीं लगता है; और ऐसा करने से क्या लाभ होने वाला था? और फिर शिष्यों में इतनी हिम्मत कैसे आ गई कि वे हर सताव और दुःख सहते हुए भी प्रभु के पुनरुत्थान और सुसमाचार का प्रचार करने से रोके नहीं जा सके, यदि वे जानते थे कि प्रभु जी नहीं उठा है?
    • रोमियों ने लोथ ले जाकर कहीं और दफना दी – पिलातुस यरूशलेम में शान्ति रखना चाहता था – ऐसा करने से तो अशांति फैलने की संभावना अधिक थी।
    • यहूदियों ने ही लोथ निकालकर कही और दफना दी – तो फिर जब शिष्य उसके पुनरुत्थान का प्रचार करने लगे, तो उन्होंने वह लोथ निकालकर क्यों नहीं दिखाई?
  • एक कहानी यह भी कही जाती है कि प्रभु यीशु मसीह को क्रूस पर नहीं चढ़ाया गया, वरन उसके स्थान पर उसके जैसा दिखने वाला कोई व्यक्ति चढ़ा दिया गया। जिसे पूरे लश्कर के साथ जाकर पकड़ा; सारी रात से एक से दूसरी कचहरी में घसीटते रहे, मारते-पीटते रहे, फिर उसे दिन चढ़े छोड़ क्यों दिया गया? और जिस व्यक्ति को उसके स्थान पर क्रूस पर चढ़ाया गया, वह व्यक्ति अकारण ही क्यों चुपचाप क्रूस पर चढ़ गया, और सब कुछ चुपचाप क्यों सहता रहा? और फिर क्रूस पर से कहे गए सात वचनों के साथ कैसे इस बात का तालमेल बैठा सकते हैं – प्रभु द्वारा अपने सताने वालों को क्षमा करने, यूहन्ना को अपनी माता को सौंपने, साथ टंगे हुए डाकू को क्षमा और स्वर्ग का आश्वासन देने, वचन में लिखी उसके विषय की भविष्यवाणियों पर ध्यान करके उन्हें पूरा करने, परमेश्वर को पिता कहने, आदि बातें कोई साधारण मनुष्य कैसे पूरा कर सकता था?
  • कुछ अन्य कहते हैं कि प्रभु मरा नहीं था, केवल बेहोश हुआ था, फिर कब्र में ठण्डे में विश्राम करने के बाद वह होश में आया, और कब्र में से बाहर आ गया। जिस बेरहमी से प्रभु को क्रूस पर चढ़ाने से पहले उसे मारा-पीटा गया था, फिर हाथों-पैरों में कील ठोंके गए, छाती में भाला मारा गया (यूहन्ना 19:34), और सैनिकों ने पुष्टि की, कि वह मर गया है, इसलिए उसकी टांगें नहीं तोड़ीं (यूहन्ना 19:32-33) – इन सभी प्रमाणों के होते हुए, यह कहानी निराधार है। और फिर तीन दिन कब्र में लहूलुहान और बिना भोजन या पानी के पड़े रहने के बाद किस मनुष्य के शरीर में यह शक्ति बचेगी कि वह 50 सेर मसालों के लेप और लपेटे हुए कपड़े (यूहन्ना 19:39-40) को खोल कर, अपने कीलों से छेदे हुए हाथों और पैरों तथा बेधी हुई छाती के साथ कब्र के मुँह पर लुढ़काए गए भारी पत्थर को हटा कर बाहर आ जाए, पहरेदारों को भी भगा दे, और चलकर वहाँ से चला जाए।
  • एक अन्य कहानी है कि शिष्यों ने अपनी मनःस्थिति के कारण, प्रभु की आत्मा को देखा था न कि उसके जी उठे शरीर को। प्रभु ने स्वयं ही इस धारणा का खण्डन प्रदान किया – लूका 24:38-43; और थोमा को भी आमंत्रित किया कि वह अपनी रखी गई शर्त के अनुसार उसके घावों को छू कर देख ले (यूहन्ना 20:26-27)। और प्रभु चालीस दिन तक अलग-अलग लोगों को अलग-अलग स्थानों पर दिखाई देता रहा, उनके साथ बात करता रहा; एक साथ पाँच सौ से अधिक शिष्यों को भी दिखाई दिया (1 कुरिन्थियों 15:5-8) – क्या सभी एक ही भ्रम के शिकार थे; और इस भ्रम के कारण अपनी जान पर भी खेलकर प्रचार करने से नहीं रुके? क्या एक भ्रम के लिए वे शिष्य अपने उस अनुभव के बाद उसके लिए दुःख उठाने और मारे जाने को भी तैयार हो गए। जिसने प्रभु का अनुभव कर लिया है, वह उससे पलट नहीं  सकता है।

प्रभु यीशु के पुनरुत्थान और सुसमाचार की सत्यता का संभवतः सबसे बड़ा प्रमाण, जो आज भी कार्यकारी है, वह है प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता स्वीकार कर लेने के बाद जीवनों में आने वाला परिवर्तन। उद्धार पाया व्यक्ति कुछ और ही हो जाता है; स्वयं अपने आप पर अचंभित होता है कि मैं इतना बदल कैसे गया – और यह सारे संसार में, हर स्थान पर, हर प्रकार के लोगों में, पिछले दो हज़ार वर्षों से निरंतर होता चला आ रहा है। यदि पुनरुत्थान और सुसमाचार कल्पना की बातें होतीं, तो आरंभिक उत्साह और उत्तेजना के बाद, कुछ ही समय में उनकी पोल खुल जाती, और प्रचार समाप्त हो जाता, लोग वापस अपने पुराने जीवन में लौट जाते – जो नहीं हुआ, वरन लोग हर दुःख-परेशानी-मुसीबत उठाकर भी सारे संसार में सुसमाचार फैलाते फिरे और आज भी फिर रहे हैं; क्यों?

       मसीही विश्वास ही संसार का एकमात्र विश्वास है जो लोगों को खुला आमंत्रण देता है कि उसे परखें, और फिर विश्वास करें – “सब बातों को परखो: जो अच्छी है उसे पकड़े रहो” (1 थिस्सलुनीकियों 5:21); “परखकर देखो कि यहोवा कैसा भला है! क्या ही धन्य है वह पुरुष जो उसकी शरण लेता है” (भजन 34:8)। अन्य सभी धर्मों और मान्यताओं में यदि संदेह के प्रश्न उठाए जाएँ तो उसे उन धर्मों एवं मान्यताओं का अपमान समझा जाता है, लोग ऐसा करने वाले को मारने-काटने को तैयार हो जाते हैं। किन्तु परमेश्वर के वचन बाइबल की खुली चुनौती है कि कोई भी उसकी बातों को जाँच-परख कर देख सकता है, उनकी वास्तविकता की जाँच कर सकता है, और फिर, अपनी जाँच के आधार पर अपना निर्णय ले सकता है। प्रभु यीशु की खाली कब्र आज भी इस्राएल में विद्यमान है। उनके जीवन, क्रूस पर मारे जाने, और तीसरे दिन जी उठने के ऐतिहासिक प्रमाण, बाइबल के बाहर समकालिक के लेखों में पाए जाते हैं। अनेकों लोगों ने प्रभु के जीवन, मरने, और जी उठने को गलत प्रमाणित करने का प्रयास किया है, किन्तु सफल कोई नहीं होने पाया। अपितु, इन प्रयासों में बहुत से लोगों के जीवन बदल गए और वे नास्तिक अथवा प्रभु में अविश्वासी होने से प्रभु में विश्वास करने वाले और उसे समर्पित जीवन जीने वाले बन गए। 

       हम अगले लेख में प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के महत्व के बारे देखेंगे। यदि आप अभी भी प्रभु यीशु मसीह में, उनके जीवन, शिक्षाओं, बलिदान, और पुनरुत्थान में; आपकी वास्तविक स्थिति के बावजूद आपके लिए उनके प्रेम में विश्वास नहीं  करते हैं, तो आप भी प्रभु यीशु के पुनरुत्थान से संबंधित प्रमाणों की जाँच कर सकते हैं, अपने आप को संतुष्ट कर सकते हैं। प्रभु यीशु आपको इस सांसारिक नाशमान जीवन से अविनाशी जीवन में लाना चाहता है; पाप के परिणाम से निकालकर परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप करवाकर अब से लेकर अनन्तकाल के लिए आपको स्वर्गीय आशीषों का वारिस बनाना चाहता है। शैतान की किसी बात में न आएं, उसके द्वारा फैलाई जा रही किसी गलतफहमी में न पड़ें, अभी समय और अवसर के रहते स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप कर लें, अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।” आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा। 

 

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 15:21-28  

1 कुरिन्थियों 15:21 क्योंकि जब मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई; तो मनुष्य ही के द्वारा मरे हुओं का पुनरुत्थान भी आया।

1 कुरिन्थियों 15:22 और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे।

1 कुरिन्थियों 15:23 परन्तु हर एक अपनी अपनी बारी से; पहिला फल मसीह; फिर मसीह के आने पर उसके लोग।

1 कुरिन्थियों 15:24 इस के बाद अन्त होगा; उस समय वह सारी प्रधानता और सारा अधिकार और सामर्थ्य का अन्त कर के राज्य को परमेश्वर पिता के हाथ में सौंप देगा।

1 कुरिन्थियों 15:25 क्योंकि जब तक कि वह अपने बैरियों को अपने पांवों तले न ले आए, तब तक उसका राज्य करना अवश्य है।

1 कुरिन्थियों 15:26 सब से अन्तिम बैरी जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है।

1 कुरिन्थियों 15:27 क्योंकि परमेश्वर ने सब कुछ उसके पांवों तले कर दिया है, परन्तु जब वह कहता है कि सब कुछ उसके आधीन कर दिया गया है तो प्रत्यक्ष है, कि जिसने सब कुछ उसके आधीन कर दिया, वह आप अलग रहा।

1 कुरिन्थियों 15:28 और जब सब कुछ उसके आधीन हो जाएगा, तो पुत्र आप भी उसके आधीन हो जाएगा जिसने सब कुछ उसके आधीन कर दिया; ताकि सब में परमेश्वर ही सब कुछ हो।

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 30-31

·      2 कुरिन्थियों 11:1-15 

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 23


पाप का समाधान - उद्धार - 19

हम देखते आ रहे हैं कि मनुष्यों के पाप से उत्पन्न स्थिति के समाधान के लिए ऐसा मनुष्य चाहिए था जो पूर्णतः निष्पाप और निष्कलंक हो; इतना सामर्थी हो कि मृत्यु उसे वश में न रख सके; और इतना कृपालु हो कि मनुष्यों के पापों को स्वेच्छा से अपने ऊपर लेकर, उनके दण्ड को मनुष्यों के स्थान पर सह ले, और फिर प्रतिफल को मनुष्यों में सेंत-मेंत बाँट दे। ऐसा मनुष्य पाप के दण्ड को सभी के लिए चुका सकता था, और मनुष्य को मृत्यु से स्वतंत्र कर के, उनका मेल-मिलाप परमेश्वर से करवा सकता था, अदन की वाटिका में खोई गई स्थिति को मनुष्यों के लिए वापस बहाल कर सकता था। इस संदर्भ में हम देख चुके हैं कि: 

  • प्रभु यीशु पूर्णतः परमेश्वर होने के साथ ही पूर्णतः मनुष्य भी थे, किन्तु उनकी मानवीय देह में पाप का दोष, और उनमें पाप की कोई प्रवृत्ति नहीं थी।
  • उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर पिता की आज्ञाकारिता में व्यतीत किया, बिना परमेश्वर पर कोई संदेह किए अथवा उनकी आज्ञाकारिता के लिए कोई आनाकानी किए। 
  • वे साधारण और सामान्य मनुष्यों के सभी अनुभवों में से होकर निकले किन्तु निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र बने रहे। 
  • उन्होंने स्वेच्छा से मनुष्यों के पापों के लिए अपने आप को बलिदान किया, ये जानते हुए भी कि क्रूस की मृत्यु कितनी पीड़ादायक, क्रूर, और वीभत्स होगी। 

        आज से हम उनके पाप का समाधान होने के लिए आवश्यक सिद्ध पुरुष होने के एक और गुण - उनके मृत्यु पर जयवंत होने के बारे देखना आरंभ करेंगे। हम पहले के लेखों में देख चुके हैं कि परमेश्वर ने प्रथम पुरुष और स्त्री को चेतावनी दे रखी थी कि वर्जित फल को खा लेने की अनाज्ञाकारिता का परिणाम मृत्यु, अर्थात पवित्र और सिद्ध परमेश्वर से और मनुष्यों की परस्पर एक दूसरे से अपरिवर्तनीय दूरी, होगी (उत्पत्ति 2:17)। यह मृत्यु दो स्वरूप में आएगी - आत्मिक, अर्थात परमेश्वर से दूरी; और शारीरिक, अर्थात एक दूसरे से दूर हो जाना – उनका शरीर क्षय होना आरंभ हो जाएगा, और अंततः मर जाएगा, फिर से मिट्टी में मिल जाएगा, जिस से उसे बनाया गया है (उत्पत्ति 3:17-19)। इसलिए यह स्वाभाविक है, जो भी व्यक्ति पाप का समाधान करेगा, पाप के दुष्प्रभावों को मिटाएगा, वह पाप के इस सबसे घातक परिणाम, आत्मिक तथा शारीरिक मृत्यु का अभी अंत करेगा, उसे मनुष्यों पर से हटा देगा। तब ही उसके द्वारा किया गया पाप के निवारण और समाधान का कार्य उचित, स्वीकार्य, और पूर्ण माना जा सकेगा। यदि सब कुछ करने के बाद भी मृत्यु अपने स्थान पर बनी रहेगी, तो जो किया गया वह अपूर्ण और व्यर्थ रहेगा। इसीलिए परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रभु यीशु मसीह के कार्य के लिए लिखा गया है “क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कारण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्म रूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे। इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ। क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे। और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ। कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे” (रोमियों 5:17-21)।

मसीही विश्वास के लिए वास्तविकता तो यही है कि प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान ही मसीही विश्वास का आधार है – यदि मसीही विश्वास में से पुनरुत्थान को हटा दें, या उसे झूठा प्रमाणित कर दें, तो फिर मसीही जीवन और शिक्षाएँ किसी भी अन्य धर्म की शिक्षाओं से भिन्न नहीं रह जाती हैं। इसीलिए प्रभु यीशु ने अपने पुनरुत्थान के बाद “और उसने दु:ख उठाने के बाद बहुत से बड़े प्रमाणों से अपने आप को उन्हें जीवित दिखाया, और चालीस दिन तक वह उन्हें दिखाई देता रहा: और परमेश्वर के राज्य की बातें करता रहा” (प्रेरितों 1:3)। प्रभु के लिए अपने मृतकों में से पुनरुत्थान को शिष्यों पर दृढ़ता से प्रमाणित करना, जिससे वे इसके विषय कभी धोखा न खाएं, कभी डगमगाए न जाएं अनिवार्य था - भविष्य की सारी मसीही सेवकाई इस एक बात पर निर्भर थी; और वह यह कार्य अपने पुनरुत्थान के बाद चालीस दिन तक उनके सामने करता रहा। बाइबल में 1 कुरिन्थियों 15 – पूरा अध्याय इसी विषय – पुनरुत्थान के महत्व, पर है, और पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस लिखता है कि यदि पुनरुत्थान नहीं है, यदि मसीह का पुनरुत्थान नहीं हुआ, तो मसीही विश्वास से संबंधित सभी प्रचार और शिक्षा व्यर्थ है (1 कुरिन्थियों 15:12-18)। इसीलिए, जैसा 1 कुरिन्थियों 15:12 में पूछे गए प्रश्न “सो जब कि मसीह का यह प्रचार किया जाता है, कि वह मरे हुओं में से जी उठा, तो तुम में से कितने क्योंकर कहते हैं, कि मरे हुओं का पुनरुत्थान है ही नहीं?” से प्रकट है, कलीसिया के आरंभ के साथ ही प्रभु यीशु के पुनरुत्थान की वास्तविकता पर हमले होने, उसका इनकार करने के प्रयास आरंभ हो गए थे। पुनरुत्थान को झुठलाने के शैतान के ये प्रयास दिखाते हैं कि यह तथ्य उसके तथा उसके राज्य के लिए कितना खतरनाक है।

  प्रभु यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान को झुठलाने के एक प्रयास को हम पिछले लेख में देख चुके हैं - लोगों में यह मनगढ़ंत कहानी प्रचलित कर दी गई कि प्रभु यीशु मरा नहीं था, बेहोश हुआ था, और कब्र के ठन्डे वातावरण में जब उसे होश आया, तो वह उठकर कब्र से बाहर आ गया और कहीं चला गया। इसी प्रकार से और भी कुछ कहानियाँ पुनरुत्थान को झुठलाने के लिए बनाई गई हैं, जिन्हें हम अगले लेख में देखेंगे। किन्तु बारीकी से जाँचने पर इनमें से कोई भी कहानी बाइबल में दिए गए विवरणों पर खरी नहीं उतरती है। लेकिन पुनरुत्थान को झुठलाने के ये प्रयास दिखाते हैं कि प्रभु यीशु का पुनरुत्थान कितनी महत्वपूर्ण घटना है, और शैतान इसे नकारने के लिए कितना बेचैन है। इसी से यह भी समझ में आने पाता है कि क्यों प्रभु ने चालीस दिन तक अपने शिष्यों को इस बात में दृढ़ किया कि वह वास्तव में शारीरिक रीति से जी उठा है, उसका पुनरुत्थान कोई कल्पना या छलावा या सामूहिक सम्मोहन द्वारा दिमाग में डाली गई बात नहीं है। 

वह जो मृत्यु के इस पार और उस पार, दोनों स्थितियों से भली-भांति अवगत है, वह आपसे, आपके प्रति अपने महान और समझ से बाहर प्रेम के अंतर्गत, अपने शिष्यों में होकर, इन लेखों में होकर, संसार की घटनाओं के प्रमाणों में होकर निवेदन कर रहा है “...मानो परमेश्वर हमारे द्वारा समझाता है: हम मसीह की ओर से निवेदन करते हैं, कि परमेश्वर के साथ मेल मिलाप कर लो” (2 कुरिन्थियों 5:20)। शैतान की किसी बात में न आएं, किसी गलतफहमी में न पड़ें, अभी समय और अवसर के रहते स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों से पश्चाताप कर लें, अपना जीवन उसे समर्पित कर के, उसके शिष्य बन जाएं। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।” आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।  

 

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 15:12-22 

1 कुरिन्थियों 15:12 सो जब कि मसीह का यह प्रचार किया जाता है, कि वह मरे हुओं में से जी उठा, तो तुम में से कितने क्योंकर कहते हैं, कि मरे हुओं का पुनरुत्थान है ही नहीं?

1 कुरिन्थियों 15:13 यदि मरे हुओं का पुनरुत्थान ही नहीं, तो मसीह भी नहीं जी उठा।

1 कुरिन्थियों 15:14 और यदि मसीह भी नहीं जी उठा, तो हमारा प्रचार करना भी व्यर्थ है; और तुम्हारा विश्वास भी व्यर्थ है।

1 कुरिन्थियों 15:15 वरन हम परमेश्वर के झूठे गवाह ठहरे; क्योंकि हम ने परमेश्वर के विषय में यह गवाही दी कि उसने मसीह को जिला दिया यद्यपि नहीं जिलाया, यदि मरे हुए नहीं जी उठते।

1 कुरिन्थियों 15:16 और यदि मुर्दे नहीं जी उठते, तो मसीह भी नहीं जी उठा।

1 कुरिन्थियों 15:17 और यदि मसीह नहीं जी उठा, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है; और तुम अब तक अपने पापों में फंसे हो।

1 कुरिन्थियों 15:18 वरन जो मसीह में सो गए हैं, वे भी नाश हुए।

1 कुरिन्थियों 15:19 यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे हैं।

1 कुरिन्थियों 15:20 परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उन में पहिला फल हुआ।

1 कुरिन्थियों 15:21 क्योंकि जब मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई; तो मनुष्य ही के द्वारा मरे हुओं का पुनरुत्थान भी आया।

1 कुरिन्थियों 15:22 और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे।

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 27-29

·      2 कुरिन्थियों 10