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रविवार, 15 फ़रवरी 2015

प्रार्थना


   इतने वर्षों के बाद भी मैं प्रार्थना को पूरी रीति से समझ नहीं पाया हूँ; मेरे लिए यह अभी भी एक रहस्य ही है। जब हम किसी अत्याधिक आवश्यकता की स्थिति में होते हैं तो प्रार्थना स्वाभाविक रीति से हमारे हृदय की गहराईयों से, हमारे होठों से निकलने लगती है। जब हम किसी बात से बहुत डर जाते हैं, जब हमें हमारी सहने की सीमाओं से परे धकले जाने के प्रयास होते हैं, जब हम अपने आरामदायक जीवन से हिलाए जाते हैं, जब हम खतरों का आभास करते हैं, ऐसी और इनके जैसी अन्य परिस्थितियों में हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रिया परमेश्वर को सहायता के लिए पुकारने की होती है।

   लेखक यूजीन पीटरसन ने लिखा, "प्रार्थना की भाषा परेशानियों की भट्टी में तैयार होती है। जब हम असहाय होते हैं और हमें सहायता चाहिए होती है; जब हम अनचाहे स्थान पर होते हैं और बाहर निकलने का मार्ग चाहिए होता है; जब हम अपने आप से परेशान होते हैं और अपने अन्दर परिवर्तन चाहते हैं, तब हम बहुत साधारण तथा आधारभूत भाषा का प्रयोग करते हैं और यही प्रार्थना की भाषा बन जाती है।"

   प्रार्थना परेशानियों में आरंभ होती है, और क्योंकि हम किसी ना किसी रूप में परेशानियों में सदा ही बने रहते हैं, इसलिए प्रार्थना भी हमारे जीवनों में बनी रहती है। प्रार्थना के लिए ना तो कोई विशेष तैयारी चाहिए होती है, ना ही कोई निर्धारित शब्दावली और ना ही शरीर की कोई निश्चित मुद्रा अथवा आसन। प्रार्थना हमारे अन्दर से हमारी आवश्यकतानुसार निकलती है, और समय के साथ हमारी प्रत्येक परिस्थिति - भली या बुरी के लिए, हमारी आदत बन जाती है।

   लेकिन हमारे लिए सबसे अद्भुत और सांत्वनापूर्ण बात है कि हमारे परमेश्वर पिता ने हमें खूली छूट दी है कि हम अपने प्रत्येक बात को प्रभु यीशु में होकर उसके सामने प्रार्थना में रखें और वह हमारी हर प्रार्थना को सुनने और उत्तर देने के लिए सदा तैया रहता है; इसलिए चाहे मैं प्रार्थना को पूरी रीति से ना भी समझूँ तो भी प्रार्थना का यथासंभव उपयोग करने से मैं नहीं चूकता। - डेविड रोपर


परमेश्वर की सहायता केवल एक प्रार्थना भर की दूरी पर उपलब्ध है।

किसी भी बात की चिन्‍ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं। तब परमेश्वर की शान्‍ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी। - फिलिप्पियों 4:6-7

बाइबल पाठ: भजन 142
Psalms 142:1 मैं यहोवा की दोहाई देता, मैं यहोवा से गिड़गिड़ाता हूं, 
Psalms 142:2 मैं अपने शोक की बातें उस से खोल कर कहता, मैं अपना संकट उस के आगे प्रगट करता हूं। 
Psalms 142:3 जब मेरी आत्मा मेरे भीतर से व्याकुल हो रही थी, तब तू मेरी दशा को जानता था! जिस रास्ते से मैं जाने वाला था, उसी में उन्होंने मेरे लिये फन्दा लगाया। 
Psalms 142:4 मैं ने दाहिनी ओर देखा, परन्तु कोई मुझे नहीं देखता है। मेरे लिये शरण कहीं नहीं रही, न मुझ को कोई पूछता है।
Psalms 142:5 हे यहोवा, मैं ने तेरी दोहाई दी है; मैं ने कहा, तू मेरा शरणस्थान है, मेरे जीते जी तू मेरा भाग है। 
Psalms 142:6 मेरी चिल्लाहट को ध्यान देकर सुन, क्योंकि मेरी बड़ी दुर्दशा हो गई है! जो मेरे पीछे पड़े हैं, उन से मुझे बचा ले; क्योंकि वे मुझ से अधिक सामर्थी हैं। 
Psalms 142:7 मुझ को बन्दीगृह से निकाल कि मैं तेरे नाम का धन्यवाद करूं! धर्मी लोग मेरे चारों ओर आएंगे; क्योंकि तू मेरा उपकार करेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • लैव्यवस्था 17-18
  • मत्ती 27:27-50



शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

मूल्य


   परमेश्वर के वचन बाइबल में एक घटना है, याकूब के विवाह की। याकूब अपने मामा लाबान के यहाँ रहता और कार्य करता था, और लाबान की छोटी बेटी राहेल से प्रेम करता था। याकूब ने लाबान से राहेल का हाथ माँगा तो लाबान ने स्वीकार कर लिया, लेकिन शादी के समय राहेल के स्थान पर उसकी बड़ी बहिन लियाह को, जो आँखों से कमज़ोर थी, याकूब को दे दिया। शादी की रात याकूब ने लियाह के साथ यह समझते हुए बिताई कि वह राहेल के साथ है, लेकिन दिन निकलने पर उसे पता पड़ा कि उसके साथ धोखा हुआ है। अब अपनी प्रेमिका को पाने के लिए याकूब को लाबान के साथ एक और समझौते में पड़ना पड़ा। लाबान ने लियाह को याकूब से ब्याह तो दिया लेकिन वह लियाह से याकूब को सच्चा प्रेम करवाने में असफल रहा, याकूब सदा ही लियाह से कम और राहेल से अधिक प्रेम करता रहा।

   लियाह द्वारा अपने आप को याकूब की नज़रों में "दूसरे दर्जे" का होना का आभास सदा ही होता रहा। इस बात का एहसास हमें होता है लियाह द्वारा अपने पहले तीन पुत्रों को दिए गए नामों के द्वारा। उसने अपने सबसे पहले पुत्र का नाम रखा रूबेन जिसका अर्थ है "देखो, एक पुत्र"; फिर दूसरे पुत्र का नाम रखा शिमौन जिसका अर्थ है "सुन लेना" और तीसरे पुत्र का नाम रखा लेवी जिसका अर्थ है "मिलाना"; जबकि राहेल जिससे याकूब प्रेम रखता था बाँझ ही रही। अपने हर पुत्र के जन्म के साथ लियाह को आशा होती थी कि उसका पति अब उसे प्रेम करने लगेगा, अपने पुत्रों में होकर वह अपने पति के प्रेम को पाना चाहती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और समय के साथ लियाह की आशा भी बदलने लगी, उसे अब एहसास होने लगा कि चाहे उसका पति उससे प्रेम ना भी करे तौ भी परमेश्वर उससे प्रेम करता है और उसे आशीष दे रहा है, और परमेश्वर के प्रेम को पाने के लिए उसे अपने किसी प्रयास के करने की आवश्यकता नहीं है - वह पहले से ही उससे प्रेम करता आ रहा है, इसलिए उसने अपने चौथे पुत्र का नाम रखा यहूदा जिसका अर्थ है "उत्सव मनाना"।

   यही बात हम सभी के लिए भी ऐसी ही लागू है - हम परमेश्वर के प्रेम को "कमा" नहीं सकते क्योंकि हमारे प्रति उसका प्रेम हमारे किए किसी कार्य पर निर्भर नहीं है। परमेश्वर ने हमसे हमारे पाप की दशा में होने पर भी प्रेम किया, इतना प्रेम कि हमारे लिए अपने एकलौते पुत्र प्रभु यीशु मसीह को बलिदान होने संसार में भेजा, जिससे उसके साथ हमारे मेल-मिलाप का रास्ता बन जाए (रोमियों 5:8)। परमेश्वर की नज़रों में हमारा मूल्य बहुत है, हम "दूसरे दर्जे" के नहीं हैं; वह हमारे साथ रहना चाहता है, संगति करना चाहता है, अपने साथ स्वर्ग में रखना चाहता है। क्या आप उसके द्वारा इस प्रकार मूल्यवान आंके जाने को महत्व देंगे? - सिंडी हैस कैस्पर


प्रभु यीशु के क्रूस पर दिए गए बलिदान से बढ़कर हम मनुष्यों के प्रति परमेश्वर के प्रेम को और कुछ वर्णन नहीं कर सकता।

परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा। - रोमियों 5:8

बाइबल पाठ: उत्पत्ति 29:16-35
Genesis 29:16 लाबान के दो बेटियां थी, जिन में से बड़ी का नाम लिआ: और छोटी का राहेल था। 
Genesis 29:17 लिआ: के तो धुन्धली आंखे थी, पर राहेल रूपवती और सुन्दर थी। 
Genesis 29:18 सो याकूब ने, जो राहेल से प्रीति रखता था, कहा, मैं तेरी छोटी बेटी राहेल के लिये सात बरस तेरी सेवा करूंगा। 
Genesis 29:19 लाबान ने कहा, उसे पराए पुरूष को देने से तुझ को देना उत्तम होगा; सो मेरे पास रह। 
Genesis 29:20 सो याकूब ने राहेल के लिये सात बरस सेवा की; और वे उसको राहेल की प्रीति के कारण थोड़े ही दिनों के बराबर जान पड़े। 
Genesis 29:21 तब याकूब ने लाबान से कहा, मेरी पत्नी मुझे दे, और मैं उसके पास जाऊंगा, क्योंकि मेरा समय पूरा हो गया है। 
Genesis 29:22 सो लाबान ने उस स्थान के सब मनुष्यों को बुला कर इकट्ठा किया, और उनकी जेवनार की। 
Genesis 29:23 सांझ के समय वह अपनी बेटी लिआ: को याकूब के पास ले गया, और वह उसके पास गया। 
Genesis 29:24 और लाबान ने अपनी बेटी लिआ: को उसकी लौंडी होने के लिये अपनी लौंडी जिल्पा दी। 
Genesis 29:25 भोर को मालूम हुआ कि यह तो लिआ है, सो उसने लाबान से कहा यह तू ने मुझ से क्या किया है? मैं ने तेरे साथ रहकर जो तेरी सेवा की, सो क्या राहेल के लिये नहीं की? फिर तू ने मुझ से क्यों ऐसा छल किया है? 
Genesis 29:26 लाबान ने कहा, हमारे यहां ऐसी रीति नहीं, कि जेठी से पहिले दूसरी का विवाह कर दें। 
Genesis 29:27 इसका सप्ताह तो पूरा कर; फिर दूसरी भी तुझे उस सेवा के लिये मिलेगी जो तू मेरे साथ रह कर और सात वर्ष तक करेगा। 
Genesis 29:28 सो याकूब ने ऐसा ही किया, और लिआ: के सप्ताह को पूरा किया; तब लाबान ने उसे अपनी बेटी राहेल को भी दिया, कि वह उसकी पत्नी हो। 
Genesis 29:29 और लाबान ने अपनी बेटी राहेल की लौंडी होने के लिये अपनी लौंडी बिल्हा को दिया। 
Genesis 29:30 तब याकूब राहेल के पास भी गया, और उसकी प्रीति लिआ: से अधिक उसी पर हुई, और उसने लाबान के साथ रहकर सात वर्ष और उसकी सेवा की। 
Genesis 29:31 जब यहोवा ने देखा, कि लिआ: अप्रिय हुई, तब उसने उसकी कोख खोली, पर राहेल बांझ रही। 
Genesis 29:32 सो लिआ: गर्भवती हुई, और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, और उसने यह कहकर उसका नाम रूबेन रखा, कि यहोवा ने मेरे दु:ख पर दृष्टि की है: सो अब मेरा पति मुझ से प्रीति रखेगा। 
Genesis 29:33 फिर वह गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और उसने यह कहा कि यह सुनके, कि मैं अप्रिय हूं यहोवा ने मुझे यह भी पुत्र दिया: इसलिये उसने उसका नाम शिमोन रखा। 
Genesis 29:34 फिर वह गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और उसने कहा, अब की बार तो मेरा पति मुझ से मिल जाएगा, क्योंकि उस से मेरे तीन पुत्र उत्पन्न हुए: इसलिये उसका नाम लेवी रखा गया। 
Genesis 29:35 और फिर वह गर्भवती हुई और उसके एक और पुत्र उत्पन्न हुआ; और उसने कहा, अब की बार तो मैं यहोवा का धन्यवाद करूंगी, इसलिये उसने उसका नाम यहूदा रखा; तब उसकी कोख बन्द हो गई।

एक साल में बाइबल: 
  • लैव्यवस्था 15-16
  • मत्ती 27:1-26



शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

प्रदर्शन


   दो दशकों से वैज्ञानिक माईक हैण्ड्स मध्य अमेरिका के किसानों को किसानी करने के बेहतर तरीकों और अच्छी फसल प्राप्त करने के उपायों को सिखा रहे हैं। लेकिन उन किसानों द्वारा पारंपरिक तरीकों को त्यागकर नए तरीकों को अपनाना कठिन होता है, यद्यपि वे किसान यह समझते हैं कि उनके पारंपरिक तरीके मिट्टी को कम उपजाऊ और वायु को दूषित कर देने वाले हैं। इसलिए माईक उन्हें केवल करने के लिए कहते ही नहीं हैं, परन्तु अपनी कही बात को उनके सामने एक वृतचित्र द्वारा प्रदर्षित भी करते हैं। माईक का कहना है कि सुधारने के लिए केवल प्रचार करने या उसका वर्णन कर देने के द्वारा ही काम नहीं चलता है, उस बात को लोगों के सामने प्रदर्षित भी करना होता है, लोगों को उसे अपने हाथों द्वारा देखना और अनुभव भी करना होता है।

   प्रेरित पौलुस ने भी प्रभु यीशु में विश्वास द्वारा समस्त संसार के सभी लोगों के लिए उपलब्ध पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार के सन्देश के प्रसार के लिए यही विधि अपनाई थी। पौलुस ने कुरिन्थुस के मसीही विश्वासियों को लिखा: "और मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभाने वाली बातें नहीं; परन्तु आत्मा और सामर्थ का प्रमाण था। इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो" (1 कुरिन्थियों 2:4-5)। और आगे चलकर पौलुस ने फिर लिखा, "क्योंकि परमेश्वर का राज्य बातों में नहीं, परन्तु सामर्थ में है" (1 कुरिन्थियों 4:20)।

   परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वह प्रतिदिन आपके शब्दों को आपके जीवन में प्रदर्शित करवा कर उन्हें आपके संपर्क में आने वाले लोगों के लिए सार्थक एवं प्रभावी बना दे। जब हम संसार के सामने परमेश्वर को हम में होकर कार्य करता हुआ दिखाने के लिए तैयार होते हैं, तो यह उसके अनुग्रह और सामर्थ का अभूतपूर्व प्रदर्शन तथा बहुत प्रभावी गवाही होता है। - डेविड मैक्कैसलैंड


सार्थक होने के लिए हमारे शब्दों को उनके अनुरूप हमारी क्रियाओं का समर्थन अनिवार्य है।

क्योंकि हमारा सुसमाचार तुम्हारे पास न केवल वचन मात्र ही में वरन सामर्थ और पवित्र आत्मा, और बड़े निश्‍चय के साथ पहुंचा है; जैसा तुम जानते हो, कि हम तुम्हारे लिये तुम में कैसे बन गए थे। - 1 थिस्सलुनीकियों 1:5

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 2:1-5
1 Corinthians 2:1 और हे भाइयों, जब मैं परमेश्वर का भेद सुनाता हुआ तुम्हारे पास आया, तो वचन या ज्ञान की उत्तमता के साथ नहीं आया। 
1 Corinthians 2:2 क्योंकि मैं ने यह ठान लिया था, कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह, वरन क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूं। 
1 Corinthians 2:3 और मैं निर्बलता और भय के साथ, और बहुत थरथराता हुआ तुम्हारे साथ रहा। 
1 Corinthians 2:4 और मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभाने वाली बातें नहीं; परन्तु आत्मा और सामर्थ का प्रमाण था। 
1 Corinthians 2:5 इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो।

एक साल में बाइबल: 
  • लैव्यवस्था 14
  • मत्ती 26:51-75



गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

निमंत्रण


   कुछ महीने पहले की बात है, मुझे किसी कार्य के लिए वायु-यान द्वारा आना और जाना पड़ा। लौटते समय मुझे अचरज भी हुआ और अच्छा भी लगा कि मुझे जो सीट मिली थी उसके आगे पैर फैलाने के लिए काफी स्थान था, साथ ही मेरे पास वाली सीट खाली थी, इसलिए मैं हाथ भी फैला कर भी बैठ सकता था; कुल मिलाकर सब अच्छा और आरामदायक था, क्योंकि मुझे सीमित से स्थान में फंस कर बैठे रहने की आवश्यकता नहीं थी। अपने आराम के बारे में सोचने के साथ ही मुझे उन अन्य यात्रियों को हो रही असुविधा का भी ध्यान आया जिनके पास मेरे समान सुविधाजनक सीट नहीं थी। मैंने अपनी दृष्टि घुमाकर देखा और मुझे कुछ अपनी जान-पहचान के लोग दिखाई दिए; मैंने उन्हें निमंत्रण दिया कि वे आकर मेरे पास वाली सीट पर बैठ जाएं, लेकिन आश्चर्य हुआ जब किसी ने मेरा निमंत्रण स्वीकार नहीं किया और किसी ना किसी कारण से वे अपनी ही असुविधापूर्ण सीट पर बैठे रहने में संतुष्ट थे।

   हम मसीही विश्वासियों को एक और भी अति आवश्यक निमंत्रण संसार के लोगों को देना है - प्रभु यीशु में विश्वास लाने के द्वारा हमें प्राप्त हुई पापों की क्षमा, उद्धार और अनन्त जीवन में संभागी होने का निमंत्रण, जिसे कुछ तो स्वीकार कर लेंगे, और कुछ नहीं करेंगे। परमेश्वर के वचन बाइबल में यूहन्ना 1:40 में हम लिखा पाते हैं कि जब अन्द्रियास ने प्रभु यीशु के पीछे चलने का निर्णय लिया, तो उसने तुरंत ही अपने भाई शमौन को भी निमंत्रण दिया कि वह भी जगत के उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के पीछे हो ले (पद 41)। प्रभु यीशु ने अपने अनुयायियों के समक्ष जीवन का नया और अद्भुत प्रस्ताव रखा था, कि वे उसे जानें और उसके साथ एक नए तथा आशीषमय जीवन का आनन्द लें।

   प्रभु यीशु में जो आशीषें तथा प्रतिज्ञाएं तब अन्द्रियास एवं शमौन को उपलब्ध थीं, वे आज भी सभी मसीही विश्वासियों के लिए वैसे ही उपलब्ध हैं:
  • उसकी क्षमा, अनुग्रह एवं धर्मी ठहराया जाना (रोमियों 3:24)
  • उसकी सहायता और सुरक्षा (इब्रानियों 13:5)
  • उसकी आशा (रोमियों 15:13)
  • उसकी शांति (यूहन्ना 14:27)
  • उसके साथ अनन्तकाल का जीवन (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)

   प्रभु यीशु का यह निमंत्रण किसी धर्म या जाति विशेष के लिए नहीं वरन संसार के सभी लोगों के लिए है। क्या आप उसके निमंत्रण को स्वीकार करके अपने जीवन को सुनिश्चित करेंगे? - ऐनी सेटास


संसार को दिखाएं कि मसीह यीशु ने आपके लिए क्या किया है, और संसार जान लेगा कि प्रभु यीशु संसार के लिए क्या कर सकता है।

यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्‍त तक सदैव तुम्हारे संग हूं। - मत्ती 28:18-20

बाइबल पाठ: यूहन्ना 1:35-42
John 1:35 दूसरे दिन फिर यूहन्ना और उसके चेलों में से दो जन खड़े हुए थे। 
John 1:36 और उसने यीशु पर जो जा रहा था दृष्टि कर के कहा, देखो, यह परमेश्वर का मेम्ना है। 
John 1:37 तब वे दोनों चेले उस की यह सुनकर यीशु के पीछे हो लिए। 
John 1:38 यीशु ने फिरकर और उन को पीछे आते देखकर उन से कहा, तुम किस की खोज में हो? उन्होंने उस से कहा, हे रब्बी, अर्थात (हे गुरू) तू कहां रहता है? उसने उन से कहा, चलो, तो देख लोगे। 
John 1:39 तब उन्होंने आकर उसके रहने का स्थान देखा, और उस दिन उसी के साथ रहे; और यह दसवें घंटे के लगभग था। 
John 1:40 उन दोनों में से जो यूहन्ना की बात सुनकर यीशु के पीछे हो लिये थे, एक तो शमौन पतरस का भाई अन्द्रियास था। 
John 1:41 उसने पहिले अपने सगे भाई शमौन से मिलकर उस से कहा, कि हम को ख्रिस्तुस अर्थात मसीह मिल गया। 
John 1:42 वह उसे यीशु के पास लाया: यीशु ने उस पर दृष्टि कर के कहा, कि तू यूहन्ना का पुत्र शमौन है, तू केफा, अर्थात पतरस कहलाएगा।

एक साल में बाइबल: 
  • लैव्यवस्था 13
  • मत्ती 26:26-50



बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

आवश्यक तथा महत्वपूर्ण



   एक विनाशकारी बवंडर द्वारा मचाई गई तबाही के बाद एक व्यक्ति अपने टूटे हुए घर के बाहर खड़ा हुआ घर तथा आस-पास के हाल का अवलोकन कर रहा था। घर की दशा जर्जर हो चुकी थी, अन्दर सामान टूटा-बिखरा पड़ा था और उसी टूटे-बिखरे सामान में कहीं उसकी पत्नि के गहने तथा उसकी अपनी कीमती वस्तुएं भी थीं। लेकिन वह व्यक्ति उस टूटे और कमज़ोर पड़ गए घर के अन्दर जाकर उन्हें ढूँढ़ने का कोई प्रयास नहीं कर रहा था; उसका कहना था, "वे सब जान का जोखिम उठाने लायक आवश्यक तथा महत्वपूर्ण नहीं हैं।" जब संकट होता है तब जीवन के लिए आवश्यक तथा महत्वपूर्ण का आंकलन करने का हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में भजन 90, जो मूसा की प्रार्थना है, परमेश्वर का जन मूसा जीवन पर आरंभ से अंत तक दृष्टि करता है। जीवन के संक्षिप्त होने, तथा पाप के कारण परमेश्वर के क्रोधित होने को ध्यान में रखते हुए मूसा परमेश्वर से प्रार्थना करता है: "हम को अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएं" (भजन 90:12)। आगे मूसा परमेश्वर से दया तथा करुणा करने की विनती करता है और अपनी प्रार्थना का अन्त भविष्य में परमेश्वर के अनुग्रह और कार्यों पर उसकी आशीष के बने रहने को माँगने के साथ करता है।

   मूसा के समान ही हमारी भी परमेश्वर से यह प्रार्थना होनी चाहिए कि हम अपने जीवन के विषय में बुद्धिमान हो जाएं। एक दिन तो हमें परमेश्वर के सामने खड़े होकर अपने जीवन तथा कार्यों का हिसाब देना ही है। इसलिए आज भी यह बात हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण तथा आवश्यक है - क्योंकि हमारे जीवन के दिन गिने हुए हैं, थोड़े हैं इसलिए उनका सदुपयोग करने की समझ रखना हमारे लिए अति आवश्यक है। - डेविड मैक्कैसलैंड


हमारे गिने हुए दिन क्या हमें परमेश्वर तथा उसके प्रेम पर विचार करने को प्रेरित करते हैं?

हे यहोवा ऐसा कर कि मेरा अन्त मुझे मालुम हो जाए, और यह भी कि मेरी आयु के दिन कितने हैं; जिस से मैं जान लूं कि कैसा अनित्य हूं! - भजन 39:4

बाइबल पाठ: भजन 90:7-17
Psalms 90:7 क्योंकि हम तेरे क्रोध से नाश हुए हैं; और तेरी जलजलाहट से घबरा गए हैं। 
Psalms 90:8 तू ने हमारे अधर्म के कामों से अपने सम्मुख, और हमारे छिपे हुए पापों को अपने मुख की ज्योति में रखा है।
Psalms 90:9 क्योंकि हमारे सब दिन तेरे क्रोध में बीत जाते हैं, हम अपने वर्ष शब्द की नाईं बिताते हैं। 
Psalms 90:10 हमारी आयु के वर्ष सत्तर तो होते हैं, और चाहे बल के कारण अस्सी वर्ष के भी हो जाएं, तौभी उनका घमण्ड केवल नष्ट और शोक ही शोक है; क्योंकि वह जल्दी कट जाती है, और हम जाते रहते हैं। 
Psalms 90:11 तेरे क्रोध की शक्ति को और तेरे भय के योग्य तेरे रोष को कौन समझता है? 
Psalms 90:12 हम को अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएं। 
Psalms 90:13 हे यहोवा लौट आ! कब तक? और अपने दासों पर तरस खा! 
Psalms 90:14 भोर को हमें अपनी करूणा से तृप्त कर, कि हम जीवन भर जयजयकार और आनन्द करते रहें। 
Psalms 90:15 जितने दिन तू हमें दु:ख देता आया, और जितने वर्ष हम क्लेश भोगते आए हैं उतने ही वर्ष हम को आनन्द दे। 
Psalms 90:16 तेरा काम तेरे दासों को, और तेरा प्रताप उनकी सन्तान पर प्रगट हो। 
Psalms 90:17 और हमारे परमेश्वर यहोवा की मनोहरता हम पर प्रगट हो, तू हमारे हाथों का काम हमारे लिये दृढ़ कर, हमारे हाथों के काम को दृढ़ कर।

एक साल में बाइबल: 
  • लैव्यवस्था 11-12
  • मत्ती 26:1-31



मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

आग


   प्राचीन काल में यूनानी साम्राज्य के समय, युद्ध में दुशमनों के नाश के लिए एक विशेष रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से उनपर आग बरसायी जाती; इस आग को "यूनानी आग" कहा जाता था, और इसका विकास 672 ईसवीं में हुआ था। यह बहुत विनाशक हुआ करती थी क्योंकि यह पानी पर भी जलती रहती थी इसलिए समुद्री युद्ध में बड़ी सफलता से प्रयोग करी जाती थी। इसका रासायनिक सूत्र बहुत गुप्त रखा गया था, और अन्ततः कहीं इतिहास के पन्नों में दबकर ही रह गया। आज भी शोधकर्ता उसे बनाने की विधि को खोजने के प्रयास तो कर रहे हैं, परन्तु अभी तक असफल नहीं रहे हैं।

   संसार को आज चाहे "यूनानी आग" के बारे में पता ना हो लेकिन अनेक अन्य प्रकार की आग हैं जिनका प्रभाव कुछ कम विनाशकारी नहीं है। ऐसी ही एक विनाशकारी, आग जो ना तो रहस्यमय है और ना ही अनजानी है, तथा दुर्भाग्यवश मसीही विश्वासियों में पाई भी जाती है शब्दों या वचनों की आग। परमेश्वर के वचन बाइबल में याकूब ने इस आग के विषय में लिखा: "जीभ भी एक आग है: जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है और सारी देह पर कलंक लगाती है, और भवचक्र में आग लगा देती है और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है" (याकूब 3:6)। ये कठोर शब्द हमें ध्यान करवाते हैं कि बिना विचारे कहे गए शब्द कितने नाशकारी हो सकते हैं।

   ऐसी "आग" को, जो रिश्तों को जला सकती है, परिवारों को तोड़ सकती है, मण्डलियों में फूट डाल सकती है, अपने मूँह से निकलने देने की बजाए भला होगा कि आप अपनी जीभ को परमेश्वर की आत्मा की आधीनता में कर दें, और ऐसे शब्द ही मूँह से निकालें जो परमेश्वर को महिमा देने वाले हों। - बिल क्राऊडर


अपनी ज़ुबान पर लगाम रखने के लिए अपने हृदय की लगाम परमेश्वर के हाथों में रखें।

मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्‍तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ। - कुलुस्सियों 3:16

बाइबल पाठ: याकूब 3:1-12
James 3:1 हे मेरे भाइयों, तुम में से बहुत उपदेशक न बनें, क्योंकि जानते हो, कि हम उपदेशक और भी दोषी ठहरेंगे। 
James 3:2 इसलिये कि हम सब बहुत बार चूक जाते हैं: जो कोई वचन में नहीं चूकता, वही तो सिद्ध मनुष्य है; और सारी देह पर भी लगाम लगा सकता है। 
James 3:3 जब हम अपने वश में करने के लिये घोड़ों के मुंह में लगाम लगाते हैं, तो हम उन की सारी देह को भी फेर सकते हैं। 
James 3:4 देखो, जहाज भी, यद्यपि ऐसे बड़े होते हैं, और प्रचण्‍ड वायु से चलाए जाते हैं, तौभी एक छोटी सी पतवार के द्वारा मांझी की इच्छा के अनुसार घुमाए जाते हैं। 
James 3:5 वैसे ही जीभ भी एक छोटा सा अंग है और बड़ी बड़ी डींगे मारती है: देखो, थोड़ी सी आग से कितने बड़े वन में आग लग जाती है। 
James 3:6 जीभ भी एक आग है: जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है और सारी देह पर कलंक लगाती है, और भवचक्र में आग लगा देती है और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है। 
James 3:7 क्योंकि हर प्रकार के बन-पशु, पक्षी, और रेंगने वाले जन्‍तु और जलचर तो मनुष्य जाति के वश में हो सकते हैं और हो भी गए हैं। 
James 3:8 पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता; वह एक ऐसी बला है जो कभी रुकती ही नहीं; वह प्राण नाशक विष से भरी हुई है। 
James 3:9 इसी से हम प्रभु और पिता की स्‍तुति करते हैं; और इसी से मनुष्यों को जो परमेश्वर के स्‍वरूप में उत्पन्न हुए हैं श्राप देते हैं। 
James 3:10 एक ही मुंह से धन्यवाद और श्राप दोनों निकलते हैं। 
James 3:11 हे मेरे भाइयों, ऐसा नहीं होना चाहिए। 
James 3:12 क्या सोते के एक ही मुंह से मीठा और खारा जल दोनों निकलते हैं? हे मेरे भाइयों, क्या अंजीर के पेड़ में जैतून, या दाख की लता में अंजीर लग सकते हैं? वैसे ही खारे सोते से मीठा पानी नहीं निकल सकता।

एक साल में बाइबल: 
  • लैव्यवस्था 8-10
  • मत्ती 25:31-46



सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

सहायता



   सन 1962 में जॉन ग्लेन प्रथम अमेरीकी अंतरिक्ष यात्री बने और इतिहास की पुस्तकों में उनका नाम दर्ज हो गया। जब उनके रॉकेट ने उड़ान भरना आरंभ किया तब धरती पर नियंत्रण कक्ष से उन्हें कहा गया, "गौडस्पीड, जॉन ग्लेन" अर्थात "परमेश्वर तुम्हें सफल करे, जॉन ग्लेन"। आज हमें यह शब्द "गौडस्पीड" बहुत कम ही प्रयुक्त होते मिलता है, लेकिन परमेश्वर के वचन बाइबल में इसका प्रयोग है।

   प्रभु यीशु के चेले यूहन्ना ने अपनी दूसरी पत्री में लिखा: "यदि कोई तुम्हारे पास आए, और यही शिक्षा न दे, उसे न तो घर मे आने दो, और न नमस्‍कार करो" (2 यूहन्ना 1:10)। जिस शब्द का अनुवाद "नमस्कार" हुआ है, उसका अर्थ है "आशीष देना" और उसे अंग्रज़ी में "गौडस्पीड" भी अनुवादित किया गया है।

   प्रेरित यूहन्ना को "प्रेम का प्रेरित" भी कहा गया है; तो फिर यह प्रेम का प्रेरित मसीही विश्वासियों को किसी अन्य जन को आशीष देने से क्यों रोक रहा है? मसीही मण्डलियों के आरंभिक समय में भ्रमणकारी मसीही प्रचारक उस स्थान के मसीही विश्वासियों के आतिथ्य पर निर्भर हुआ करते थे - उनके रहने, खाने-पीने, देख-भाल, और फिर आगे दूसरे स्थान पर प्रचार के लिए भेजने का कार्य स्थानीय मसीही विश्वासी लोग किया करते थे। यूहन्ना यहाँ अपनी पत्री के द्वारा मसीही विश्वासियों को आगाह कर रहा है कि वे मसीही विश्वास के सत्य के विषय में सचेत रहें, और किसी गलत शिक्षा के प्रचार या प्रसार में अनजाने में भी सहभागी ना बनें। इसलिए यदि कोई भ्रमणकारी प्रचारक आए और प्रभु यीशु तथा उनके चेलों, अर्थात प्रेरितों, द्वारा दी गई शिक्षाओं से कुछ भिन्न बात कहे या सिखाए, तो उन मसीही विश्वासियों द्वारा उसे अपने घर ठहराने तथा उसकी देख-रेख आदि द्वारा उसे किसी प्रकार की सहायाता प्रदान नहीं करी जाए, अन्यथा वे उसकी गलत शिक्षाओं के प्रचार और प्रसार में उसके साथ दोषी ठहरेंगे।

   यही बात आज भी मसीही विश्वासियों के लिए वैसी ही लागू है। क्योंकि हम मसीही विश्वासी एक दयालु एवं करुणामय परमेश्वर के अनुयायी और सन्तान हैं इसलिए सबके साथ हमें भलाई तो करनी है; लेकिन उनकी सहायता करने के लिए परमेश्वर से समझ-बूझ माँगकर, परमेश्वर के वचन बाइबल के आधार पर उनकी शिक्षाओं की वास्तविक सत्यता पहचान कर ही कोई कदम उठाना चाहिए। सही निर्णय करने में परमेश्वर का पवित्र आत्मा जो हमें सभी सत्य में अगुवाई करता है (यूहन्ना 16:13), हमारी सहायता करेगा, हमारा मार्गदर्शन करेगा कि हमें किसकी सहायता कितनी और कैसे करनी है। - डेनिस फिशर


परमेश्वर का आत्मा, परमेश्वर के वचन द्वारा परमेश्वर संबंधित सत्य और असत्य को पहचानने की सूझ-बूझ देता है।

परन्तु जब वह अर्थात सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आने वाली बातें तुम्हें बताएगा। - यूहन्ना 16:13

बाइबल पाठ: 2 यूहन्ना 1:1-11
2 John 1:1 मुझ प्राचीन की ओर से उस चुनी हुई श्रीमती और उसके लड़के बालों के नाम जिन से मैं उस सच्चाई के कारण सत्य प्रेम रखता हूं, जो हम में स्थिर रहती है, और सर्वदा हमारे साथ अटल रहेगी। 
2 John 1:2 और केवल मैं ही नहीं, वरन वह सब भी प्रेम रखते हैं, जो सच्चाई को जानते हैं। 
2 John 1:3 परमेश्वर पिता, और पिता के पुत्र यीशु मसीह की ओर से अनुग्रह, और दया, और शान्‍ति, सत्य, और प्रेम सहित हमारे साथ रहेंगे। 
2 John 1:4 मैं बहुत आनन्‍दित हुआ, कि मैं ने तेरे कितने लड़के-बालों को उस आज्ञा के अनुसार, जो हमें पिता की ओर से मिली थी सत्य पर चलते हुए पाया। 
2 John 1:5 अब हे श्रीमती, मैं तुझे कोई नई आज्ञा नहीं, पर वही जो आरम्भ से हमारे पास है, लिखता हूं; और तुझ से बिनती करता हूं, कि हम एक दूसरे से प्रेम रखें। 
2 John 1:6 और प्रेम यह है कि हम उस की आज्ञाओं के अनुसार चलें: यह वही आज्ञा है, जो तुम ने आरम्भ से सुनी है और तुम्हें इस पर चलना भी चाहिए। 
2 John 1:7 क्योंकि बहुत से ऐसे भरमाने वाले जगत में निकल आए हैं, जो यह नहीं मानते, कि यीशु मसीह शरीर में हो कर आया: भरमाने वाला और मसीह का विरोधी यही है। 
2 John 1:8 अपने विषय में चौकस रहो; कि जो परिश्रम हम ने किया है, उसको तुम न बिगाड़ो: वरन उसका पूरा प्रतिफल पाओ। 
2 John 1:9 जो कोई आगे बढ़ जाता है, और मसीह की शिक्षा में बना नहीं रहता, उसके पास परमेश्वर नहीं: जो कोई उस की शिक्षा में स्थिर रहता है, उसके पास पिता भी है, और पुत्र भी। 
2 John 1:10 यदि कोई तुम्हारे पास आए, और यही शिक्षा न दे, उसे न तो घर मे आने दो, और न नमस्‍कार करो। 
2 John 1:11 क्योंकि जो कोई ऐसे जन को नमस्‍कार करता है, वह उस के बुरे कामों में साझी होता है।

एक साल में बाइबल: 
  • लैव्यवस्था 19-20
  • मत्ती 27:51-66