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रविवार, 6 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (22)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (3) - सुसमाचार की योजना

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और पिछले लेख से हमने सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, और इन आरंभिक लेखों में हम सही सुसमाचार क्या है, यह देख और समझ रहे हैं, जिससे गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, स्वयं भी उस से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। पिछले दो लेखों में हमने देखा है कि सुसमाचार संसार के प्रत्येक व्यक्ति के लिए है, चाहे उसका धर्म, धारणा, मान्यता कुछ भी हो; ईसाइयों या मसीहियों के लिए भी। सभी को उसके लिए व्यक्तिगत रीति से निर्णय लेना है। सुसमाचार का व्यक्ति के जीवन में कार्यकारी होना उसके सच्चे समर्पित मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप और प्रभु यीशु से पापों के क्षमा माँगकर उसे समर्पित हो जाने से आरंभ होता है। आज हम इस सुसमाचार के विषय परमेश्वर की योजना के बारे में देखेंगे।  

सुसमाचार - आरंभ से ही परमेश्वर द्वारा स्थापित 

बहुधा लोगों की यह धारणा रहती है कि प्रभु यीशु में पापों की क्षमा और उद्धार तथा उससे संबंधित आशीषों का यह सुसमाचार नए नियम, या प्रभु यीशु के आगमन और सेवकाई के साथ आरंभ हुआ है। संसार के बहुत से लोग तो प्रभु यीशु के विषय यह धारणा भी रखते हैं कि वह एक भक्त यहूदी था, जिसके जीवन से उस समय के बहुत से लोग बहुत प्रभावित हुए थे, और उसके बाद, उसके अनुयायियों ने उसके नाम में कुछ शिक्षाओं और बातों को बना कर फैला दिया, जिनमें से एक यह उसके नाम में विश्वास द्वारा पापों से क्षमा और उद्धार की बात भी है। किन्तु बहुत कम लोगों को यह पता है कि इस सुसमाचार का उल्लेख पुराने नियम में भी है, और इसका आरंभ सृष्टि के पहले से है। परमेश्वर का वचन बाइबल हमें सुसमाचार में होकर परमेश्वर की इस उद्धार की योजना के विषय सामान्य धारणाओं और विचारों से बहुत भिन्न तथ्य प्रदान करती है। बाइबल के इन तथ्यों को देखना आरंभ हम सुसमाचार के संक्षिप्त रूप, उसके सार को परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में प्रेरित पौलुस द्वारा कुरिन्थुस की मण्डली को लिखी गई पहली पत्री में से देखने के साथ करते हैं:

“हे भाइयों, मैं तुम्हें वही सुसमाचार बताता हूं जो पहिले सुना चुका हूं, जिसे तुम ने अंगीकार भी किया था और जिस में तुम स्थिर भी हो। उसी के द्वारा तुम्हारा उद्धार भी होता है, यदि उस सुसमाचार को जो मैं ने तुम्हें सुनाया था स्मरण रखते हो; नहीं तो तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ हुआ। इसी कारण मैं ने सब से पहिले तुम्हें वही बात पहुंचा दी, जो मुझे पहुंची थी, कि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गया। ओर गाड़ा गया; और पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा” (1 कुरिन्थियों 15:1-4)। 

ये पद इस बात को स्पष्ट कर देते हैं कि उद्धार के सुसमाचार का मर्म, प्रभु यीशु मसीह का पृथ्वी पर आना, मानव-जाति के पापों के लिए मारा जाना, गाड़ा जाना, और तीसरे दिन जी उठना, इनमें से कोई भी बात आकस्मिक या अनपेक्षित नहीं थीं। वरन, ये सारी बातें जो हुईं, वे सभी “पवित्र शास्त्र के अनुसार” ही हुईं; अर्थात पवित्र शस्त्र में, जो उस समय वर्तमान का पुराना नियम था, पहले से ही लिखी हुई थीं, और उन्हीं भविष्यवाणी की बातों की पूर्ति प्रभु यीशु के जीवन के द्वारा हुई!

बाइबल में उद्धारकर्ता की पहली प्रतिज्ञा, आदम और हव्वा के पाप करने के साथ ही, परमेश्वर ने अदन की वाटिका में ही कर दी थी - “और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा” (उत्पत्ति 3:15)। सामान्यतः किसी भी परिवार में, “वंश” पुरुष के द्वारा ज़ारी रखा माना जाता है, पुरुष का ही माना जाता है। किन्तु यहाँ परमेश्वर ने “स्त्री के वंश” की बात की, जो उस सर्प रूपी शैतान के सिर को कुचलने वाले उद्धारकर्ता, प्रभु यीशु मसीह के, बिना पुरुष के साथ मेल के कुँवारी स्त्री से जन्म लेने, और शैतान के कार्यों का तथा उसका नाश करके मानव जाति के उद्धार के कार्य को संपन्न करने की पहली भविष्यवाणी थी। और इसी भविष्यवाणी के अनुसार प्रभु यीशु के जन्म के समय मरियम को आश्वस्त किया गया, “स्वर्गदूत ने उस से कहा, हे मरियम; भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है। और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।” “मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, यह क्योंकर होगा? मैं तो पुरुष को जानती ही नहीं। स्वर्गदूत ने उसको उत्तर दिया; कि पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ्य तुझ पर छाया करेगी इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।” (लूका 1:30-31, 34-35)

नए नियम में इब्रानियों की पत्री में, प्रभु यीशु मसीह के मनुष्य रूप में पृथ्वी पर आने के समय का वार्तालाप दर्ज किया गया है: “इसी कारण वह जगत में आते समय कहता है, कि बलिदान और भेंट तू ने न चाही, पर मेरे लिये एक देह तैयार किया। होम-बलियों और पाप-बलियों से तू प्रसन्न नहीं हुआ। तब मैं ने कहा, देख, मैं आ गया हूं, (पवित्र शास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है) ताकि हे परमेश्वर तेरी इच्छा पूरी करूं” (इब्रानियों 10:5-7)। ये पद भी हमारे लिए सुसमाचार के बारे में कुछ बहुत महत्वपूर्ण तथ्य रखते हैं - 

  • जैसे परमेश्वर ने उत्पत्ति 3:15 में “स्त्री के वंश” की बात कही थी, उसकी के अनुसार, कुँवारी मरियम के गर्भ में पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से एक मानव देह तैयार कर के रखी गई जिसमें होकर परमेश्वर पुत्र - प्रभु यीशु ने जगत में, बिना किसी पुरुष के योगदान के, एक कुँवारी से जन्म लिया।
  • प्रभु का जगत में आना परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए था - अर्थात परमेश्वर पिता की यह इच्छा पहले से ही विद्यमान थी, जिसे पूरा करने के लिए परमेश्वर पुत्र ने स्वर्ग का वैभव, आदर, और महिमा छोड़कर, अपने आप को शून्य करके (फिलिप्पियों 2:5-8) पृथ्वी पर आना स्वीकार किया। 
  • प्रभु यीशु के विषय यह सब पवित्र शास्त्र में पहले से ही लिखा हुआ था। 

प्रभु यीशु मसीह ने अपने पुनरुत्थान के बाद, इम्माऊस के मार्ग पर जा रहे अपने दो शिष्यों के साथ हुई बातचीत में उन्हें स्मरण करवाया, “फिर उसने उन से कहा, ये मेरी वे बातें हैं, जो मैं ने तुम्हारे साथ रहते हुए, तुम से कही थीं, कि अवश्य है, कि जितनी बातें मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं और भजनों की पुस्तकों में, मेरे विषय में लिखी हैं, सब पूरी हों” (लूका 24:44)। प्रेरित पौलुस के जीवन-परिवर्तन के बाद, पुराने नियम के अपने ज्ञान के आधार पर उसने “और वह तुरन्त आराधनालयों में यीशु का प्रचार करने लगा, कि वह परमेश्वर का पुत्र है। परन्तु शाऊल और भी सामर्थी होता गया, और इस बात का प्रमाण दे देकर कि मसीह यही है, दमिश्क के रहने वाले यहूदियों का मुंह बन्द करता रहा” (प्रेरितों 9:20, 22)। इसी प्रकार अपुल्लोस भी, जो पवित्र शास्त्र का अच्छा गया रखता था, “अपुल्लोस नाम एक यहूदी जिस का जन्म सिकन्‍दिरया में हुआ था, जो विद्वान पुरुष था और पवित्र शास्त्र को अच्छी तरह से जानता था इफिसुस में आया। क्योंकि वह पवित्र शास्त्र से प्रमाण दे देकर, कि यीशु ही मसीह है; बड़ी प्रबलता से यहूदियों को सब के सामने निरुत्तर करता रहा” (प्रेरितों के काम 18:24, 28)।

क्योंकि पवित्र शास्त्र, अर्थात वर्तमान के पुराने नियम में एक उद्धारकर्ता के जन्म और छुटकारे के कार्य के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी, इसीलिए प्रभु यीशु की सेवकाई के समय में लोगों को यह अंदेशा था कि उस उद्धारकर्ता के आने का समय हो गया है, वे उसकी बाट जोह रहे थे। इसी प्रत्याशा में यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने अपनी सेवकाई आरंभ की, और जब वह आया तो उसे पहचान लिया “दूसरे दिन उसने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, देखो, यह परमेश्वर का मेम्ना है, जो जगत के पाप उठा ले जाता है” (यूहन्ना 1:29)। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के शिष्य अन्द्रियास ने, यूहन्ना के कहने पर प्रभु यीशु को मसीह स्वीकार कर लिया, “उसने पहिले अपने सगे भाई शमौन से मिलकर उस से कहा, कि हम को ख्रिस्तुस अर्थात मसीह मिल गया” (यूहन्ना 1:41)। सामान्य लोगों में भी यही प्रत्याशा थी जैसा सामरी स्त्री ने प्रभु यीशु से कहा, “स्त्री ने उस से कहा, मैं जानती हूं कि मसीह जो ख्रीस्‍तुस कहलाता है, आने वाला है; जब वह आएगा, तो हमें सब बातें बता देगा। आओ, एक मनुष्य को देखो, जिसने सब कुछ जो मैं ने किया मुझे बता दिया: कहीं यह तो मसीह नहीं है?” (यूहन्ना 4:25, 29)।

यह सभी दिखाता है कि प्रभु यीशु मसीह में उद्धार का सुसमाचार नए नियम से भी पहले का है, पवित्र शास्त्र के अनुसार है, पुराने नियम के आरंभ में से ही उसके बारे में लिख दिया गया था, उसकी योजना बनाई जा चुकी थी। किन्तु अद्भुत बात यह है कि प्रभु यीशु मसीह का अपने बलिदान के द्वारा छुटकारे का, पापों से क्षमा और उद्धार का मार्ग प्रदान करने का कार्य जगत की उत्पत्ति से पहले ही स्थापित कर दिया गया था “उसका ज्ञान तो जगत की उत्पत्ति के पहिले ही से जाना गया था, पर अब इस अन्तिम युग में तुम्हारे लिये प्रगट हुआ” (1 पतरस 1:20), और वह घात या बलि जगत की उत्पत्ति के समय हुआ, “और पृथ्वी के वे सब रहने वाले जिन के नाम उस मेम्ने की जीवन की पुस्तक में लिखे नहीं गए, जो जगत की उत्पत्ति के समय से घात हुआ है, उस पशु की पूजा करेंगे” (प्रकाशितवाक्य 13:8)। 

अर्थात, प्रभु यीशु मसीह में होकर पापों की क्षमा और उद्धार का यह सुसमाचार न तो मनुष्य के पाप करने के बाद, परिस्थिति के अनुसार, बाद में लिया गया निर्णय और किया गया कार्य है; और न ही मनुष्यों की कल्पनाओं और विचारों की गढ़ी हुई बात है। यह जगत की उत्पत्ति से पहले स्थापित हो गया था, और जगत की उत्पत्ति के समय, इससे पहले कि मनुष्य की सृष्टि भी होती और वो पाप में गिराया जाता, उसे पाप से छुड़ाने का प्रयोजन और क्रिया को परमेश्वर ने तैयार कर के रख लिया था। इसीलिए इसे “eternal salvation” या “सदा काल का उद्धार” कहा गया है (इब्रानियों 5:9)। 

ये बातें सुसमाचार के महत्व, सिद्धता, शुद्धता और पवित्रता को दिखाती हैं; बताती हैं कि कैसे सुसमाचार से की गई थोड़ी से भी छेड़ा-खानी, उसमें की गई कोई भी मिलावट, उसमें डाली गई कोई भी अतिरिक्त बात, उसे भ्रष्ट कर देगी, उसे अप्रभावी बना देगी। अगले लेख में हम देखेंगे के शैतान किन युक्तियों के द्वारा सुसमाचार को अप्रभावी बनाता है, और हमें उस भ्रष्ट सुसमाचार के चक्करों में फँसा कर, वास्तविक और सच्चे सुसमाचार को हमारे जीवनों में कार्यकारी एवं प्रभावी होने से रोक देता है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं में न पड़े हों। यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • व्यवस्थाविवरण 1-2          
  • मरकुस 10:1-31

शनिवार, 5 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (21)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (2) - सुसमाचार क्या है?

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और पिछले लेख से हमने सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, इस विषय के परिचय को देखा है। इस परिचय में हमने देखा है कि प्रभु यीशु का सुसमाचार परमेश्वर के राज्य में मनुष्य के प्रवेश प्राप्त करने के बारे में है, और इस प्रवेश के लिए सबसे पहला कदम है प्रत्येक व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रीति से अपने पापों से पश्चाताप करना, जो सभी के लिए समान रीति से अनिवार्य है, चाहे वे किसी भी धर्म, धारणा, मान्यता, या समुदाय के हों, चाहे अपने आप को पिछली कई पीढ़ियों “प्रभु के लोग” अर्थात ईसाई या मसीही होना ही क्यों न समझते हों। आज हम यहाँ से आगे बढ़ेंगे और देखेंगे कि सुसमाचार क्या है। 

सुसमाचार क्या है? 

जैसा हम पिछले लेख में देख चुके हैं, सुसमाचार शब्द का अर्थ है भला समाचार या अच्छी खबर। यह लोगों को प्रदान की जाने वाली जानकारी है, कोई प्रथा, परंपरा, या विधि नहीं है जिसे करने के द्वारा व्यक्ति धार्मिकता के किसी विशेष स्तर पर पहुँच जाता है, और परमेश्वर फिर उसे अपने राज्य में प्रवेश देने के लिए बाध्य हो जाता है। सुसमाचार अच्छा समाचार तब ही हो सकता है, जब उसकी तुलना में कुछ बुरा समाचार भी हो, और वह बुरा समाचार सारे संसार के सभी लोगों पर लागू हो; अन्यथा सुसमाचार वास्तव में सुसमाचार हो ही नहीं सकता है। इस “बुरे समाचार” को हम परमेश्वर के वचन बाइबल के कुछ पदों से देखते हैं:

  • रोमियों 5:12 इसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, इसलिये कि सब ने पाप किया।
  • रोमियों 3:23 इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं।
  • रोमियों 6:23 क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है। 

अर्थात, संसार का प्रत्येक मनुष्य, उस पाप के दोष के साथ जन्म लेता है, जो अदन की वाटिका में आदम और हव्वा के पाप करने से मनुष्य जाति में प्रवेश कर गया था, अनुवांशिक रीति से उनमें बस गया था और एक से दूसरी पीढ़ी में फैलने वाला दोष था। उस पाप के कारण मृत्यु ने सृष्टि में प्रवेश किया, और मृत्यु सभी मनुष्यों में फैल गई। यह मृत्यु दो प्रकार की है - आत्मिक और शारीरिक। आत्मिक मृत्यु के कारण मनुष्य परमेश्वर की संगति और सहभागिता से दूर है; और शारीरिक मृत्यु के कारण वह अन्ततः एक दिन मरेगा ही। परिणामस्वरूप मनुष्य जन्म लेते ही मारना आरंभ कर देता है, और उसकी आयु पूरी हो जाने पर मर जाता है। मनुष्य अपनी स्वाभाविक पापमय दशा में ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता है जिसके द्वारा अपनी इस परिस्थिति को पलट सके, परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी और उसे स्वीकार्य बन सके। हम इस विषय को विस्तार से पहले के कुछ लेखों में देख चुके हैं, इसलिए यहाँ इन पर और अधिक चर्चा नहीं करेंगे। अर्थात, बुरी खबर या बुरा समाचार यह है कि संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य अपनी स्वाभाविक पापी दशा के कारण परमेश्वर से दूर, और अनन्त मृत्यु, यानि कि हमेशा के लिए परमेश्वर से दूर नरक में रहने की दशा में है। 

इसीलिए भला समाचार या अच्छी खबर सभी मनुष्यों के लिए है कि परमेश्वर ने ही मनुष्यों के लिए इस अनन्त मृत्यु, सदा काल के नरक से बचने का मार्ग बनाकर दे दिया है, संसार के सभी लोगों के लिए उसे सेंत-मेंत उपलब्ध करवा दिया है, और सभी को उसमें आने का खुला निमंत्रण दे रखा है। अब केवल मनुष्य को परमेश्वर के इस प्रयोजन पर विश्वास करके, उसे स्वीकार करना है। इस संदर्भ में एक बार फिर बाइबल में रोमियों की पत्री से कुछ पद देखिए:

  • रोमियों 5:15 पर जैसा अपराध की दशा है, वैसी अनुग्रह के वरदान की नहीं, क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध से बहुत लोग मरे, तो परमेश्वर का अनुग्रह और उसका जो दान एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के अनुग्रह से हुआ बहुतेरे लोगों पर अवश्य ही अधिकाई से हुआ।
  • रोमियों 5:17 क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कारण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्म रूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे।
  • रोमियों 5:18 इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ।
  • रोमियों 5:19 क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।

तो सभी मनुष्यों के लिए, समस्त मानव जाति के लिए, सुसमाचार, या भला समाचार, यानि कि अच्छी खबर यह है कि किसी को भी उसकी पाप की दशा में बने रहने और पाप के उस दण्ड को भुगतने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने इससे छुटकारे का मार्ग बनाकर, उस मार्ग को सभी के लिए सेंत-मेंत उपलब्ध करवा दिया है। अब निर्णय प्रत्येक व्यक्ति को लेना है कि वो परमेश्वर के इस प्रयोजन को स्वीकार करेगा या अस्वीकार; परमेश्वर द्वारा धर्मी और पाप के दोष से मुक्त बनाया जाएगा, या फिर इसके लिए अपने ही व्यर्थ और निष्फल प्रयासों में पड़ा रहेगा, और अनन्तकाल की मृत्यु में चला जाएगा। परमेश्वर किसी के साथ ज़बरदस्ती नहीं करता है। वह हर एक को उसकी स्वेच्छा पर छोड़ देता है; वह उसे उसके जीवन भर याद दिलाता रहता है, पुकारता रहता है, समझाता रहता है कि जैसे भी हो, जिस भी दशा में हो, तुमने कुछ भी क्यों न किया हो, अपने व्यर्थ और निष्फल प्रयासों को छोड़कर तैयार किए गए आशीषित मार्ग पर आ जाओ, क्योंकि शरीर से निकल जाने के बाद फिर निर्णय कभी बदला नहीं जा सकेगा, इसलिए अभी सही निर्णय कर लो। किन्तु जो परमेश्वर की इस पुकार को अस्वीकार कर देते हैं, उसके मार्ग का तिरस्कार कर देते हैं, परमेश्वर उनके इस निर्णय, उनकी इस स्वेच्छा का आदर करता है, और उन्हें उनके द्वारा निर्णय लिए हुए स्थान पर भेज देता है। जिन्होंने अपने शारीरिक जीवन में पश्चाताप के साथ परमेश्वर के साथ हो जाने का निर्णय लिया है, वे उसके साथ स्वर्ग में रहने के लिए ले जाए जाएंगे; और जिन्होंने सब कुछ जानते हुए भी, अवसर मिलने पर भी परमेश्वर से दूर रहने का निर्णय लिया, वो हमेशा के लिए उससे दूर नरक में डाले जाएंगे। 

संक्षेप में, यही सुसमाचार है, कि परमेश्वर का राज्य निकट है; आज, अभी समय और अवसर रहते अपने लिए सही निर्णय कर लो, और अपने कैसे भी कर्मों या धर्म-कर्म आदि के द्वारा नहीं वरन सच्चे और समर्पित मन से किए गए पापों से पश्चाताप तथा प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा अपने अनन्त काल को सुरक्षित एवं आशीषित कर लो। इस सुसमाचार की योजना के बारे में हम अगले लेख में देखेंगे। किन्तु यहाँ पर बहुत ध्यान से इस बात को देख और समझ लीजिए - सुसमाचार का केंद्र-बिन्दु और उसका मर्म है “अपने कैसे भी कर्मों या धर्म-कर्म आदि के द्वारा नहीं वरन सच्चे और समर्पित मन से किए गए पापों से पश्चाताप तथा प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा”; यदि यह नहीं है, तो सुसमाचार कार्यकारी, प्रभावी, परमेश्वर की ओर से दिया गया नहीं है। इसीलिए शैतान सुसमाचार के इसी केंद्र-बिन्दु, इसी मर्म पर विभिन्न प्रकार से हमला करता है, उसमें तरह-तरह की बातें मिला कर उसे भ्रष्ट करता है, उस पर ध्यान लगाने की बजाए इधर-उधर की बातों में भटकाता है, जिससे व्यक्ति सुसमाचार की सिधाई और सच्चाई से हट कर और ही बातों में पड़ जाए, और उद्धार पाने से रह जाए। उसकी इन्हीं युक्तियों को हम आगे के लेखों में देखेंगे। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं में न पड़े हों। यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • गिनती 34-36         
  • मरकुस 9:30-50 

शुक्रवार, 4 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (20)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (1) - परिचय

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा है, जो संक्षिप्त में निम्नलिखित थीं: 

  • किसी को भी पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए कोई विशेष प्रयास या प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परमेश्वर के वचन के अनुसार, प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के नया जन्म या उद्धार पाते ही, तुरंत उसके उद्धार पाने के पल से ही परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी संपूर्णता में आकर उसके अंदर निवास करने लगता है, और उसी में बना रहता है, उसे कभी छोड़ कर नहीं जाता है; इसलिए पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए अलग से प्रयास करने की शिक्षा गलत है।  
  • और इसी को पवित्र आत्मा से भरना या पवित्र आत्मा से बपतिस्मा पाना भी कहते हैं। वचन स्पष्ट है कि पवित्र आत्मा से भरना या उससे बपतिस्मा पाना कोई दूसरा या अतिरिक्त अनुभव नहीं है, वरन उद्धार के साथ ही सच्चे मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा का आकर निवास करना ही है। 

· प्रेरितों 2 अध्याय में जो अन्य भाषाएं बोली गईं, वे पृथ्वी ही की भाषाएं और उनकी बोलियाँ थीं; कोई अलौकिक भाषा नहीं।

·  उन लोगों के द्वारा “अन्य-भाषाओं” को अलौकिक भाषाएं बताना, और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग के द्वारा इससे संबंधित कई और गलत शिक्षाओं को सिखाने के बारे में भी हम देख चुके हैं कि यह भी एक ऐसी गलत शिक्षा है जिसका वचन से कोई समर्थन या आधार नहीं है।

  • हमने यह भी देखा था कि वचन में इस शिक्षा का भी कोई आधार या समर्थन नहीं है कि “अन्य-भाषाएं” प्रार्थना की भाषाएं हैं। 
  • हमने यह भी देखा था कि उन लोगों के सभी दावों के विपरीत, 
    • न तो प्रेरितों 2:3-11 में प्रभु के शिष्यों द्वारा अन्य-भाषाओं में बोलना कोई “सुनने” का आश्चर्यकर्म था, 
    • न ही अन्य भाषाएं प्रार्थना करने की गुप्त भाषाएँ हैं, 
    • और न ही ये पृथ्वी के अन्य स्थानों की भाषाएं किसी को भी यूं ही दे दी जाती हैं, जब तक कि व्यक्ति की उस स्थान पर सेवकाई न हो, जहाँ की भाषा बोलने की सामर्थ्य उसे प्रदान की गई है।  
  • “अन्य-भाषाएं” बोलना ही पवित्र आत्मा प्राप्त करने का प्रमाण है, के भी झूठ होने और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग पर आधारित होने को हमने देखा है। 
  • व्यक्ति “अन्य-भाषा” बोलने के द्वारा सीधे परमेश्वर से बात करता है, इसके तथा कुछ संबंधित और बहुत महत्वपूर्ण बातों के बारे में हम देख चुके हैं कि उनका यह दावा भी वचन की कसौटी पर बिलकुल गलत है, अस्वीकार्य है।

सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाएं 

आज हम 2 कुरिन्थियों 11:4 में गलत शिक्षाओं के तीसरे विषय, सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाओं पर विचार आरंभ करेंगे। हम पहले इस विषय का परिचय लेंगे, फिर देखेंगे कि सुसमाचार क्या है; क्योंकि जब तक किसी भी बात के “असली” या “वास्तविकता” की जानकारी और पहचान नहीं होगी, तब तक उसके “नकली” या “अवास्तविक” को जानना और पहचानना कठिन होगा। और फिर देखेंगे कि कैसे शैतान उसे बिगाड़ता है, भ्रष्ट करता है, अप्रभावी करता है, और फिर वचन से सही और गलत सुसमाचार को पहचानने और उनमें भिन्नता करने की बातों को देखेंगे। 

सुसमाचार का परिचय

जैसा कि शब्द “सुसमाचार” से ही प्रकट है, इसका शब्दार्थ है भला समाचार या अच्छी खबर, जो मूल यूनानी भाषा में प्रयोग किए गए शब्द के अनुरूप ही है; अर्थात यह एक भला या अच्छा समाचार है, जानकारी है। तात्पर्य यह कि सुसमाचार लोगों के पास किसी बात के बारे में अच्छा समाचार पहुंचाता है। उन तक पहुंचाए गए उस समाचार या जानकारी को स्वीकार अथवा अस्वीकार करना, प्रत्येक सुनने वाले का अपना निर्णय है। इससे प्रश्न उठता है कि यह जानकारी या समाचार किस बात के विषय है और इसे भला क्यों कहते हैं? परमेश्वर के वचन बाइबल में “सुसमाचार” शब्द का किया गया प्रथम प्रयोग इसके विषय हमें बताता है: “और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा” (मत्ती 4:23)। यह बात प्रभु यीशु द्वारा उनकी पृथ्वी की सेवकाई आरंभ करने के समय कही गई है; अर्थात प्रभु यीशु ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई का आरंभ उपदेश करने, राज्य के सुसमाचार का लोगों की सभाओं में प्रचार करने, तथा लोगों को बीमारियों और दुर्बलताओं से चंगा करने के साथ किया। यहाँ पर प्रभु की इस बात में ध्यान देने योग्य दो महत्वपूर्ण बातें हैं - 

(1) पहली बात, इस पद के अनुसार प्रभु यीशु ने तीन कार्य किए - उपदेश दिया, सुसमाचार का प्रचार किया, और लोगों को उनकी बीमारियों और दुर्बलताओं से चंगा किया। अर्थात, सुसमाचार में, और उपदेश देने में तथा लोगों को बीमारियों से चंगा करने में अन्तर है; तीनों एक ही नहीं हैं; प्रभु यीशु ने अपनी सेवकाई के आरंभ से ही इन तीनों अलग-अलग कार्यों को किया। आज यह गलत धारणा लोगों में फैली हुई है कि इन तीनों में से किसी एक का किया जाना, शेष दोनों को भी किए जाने के बराबर है; जो सही नहीं है। हम पहले भी देख चुके हैं कि इफिसियों 4:11 के अनुसार कलीसिया के कार्यों के लिए उपदेश देना प्रभु द्वारा स्थापित की गई एक पृथक सेवकाई है, और सुसमाचार प्रचार करना एक भिन्न सेवकाई है। साथ ही, 1 कुरिन्थियों 12:9 के अनुसार चंगा करना परमेश्वर पवित्र आत्मा का एक वरदान है, जो अन्य वरदानों के समान पवित्र आत्मा के द्वारा, उसकी इच्छा के अनुसार, किसी किसी को दिया जाता है, सभी को एक ही वरदान नहीं दिए जाते हैं। क्योंकि ये तीनों, उपदेश देना, सुसमाचार प्रचार करना, और चंगा करना अलग-अलग सेवाकाइयाँ हैं, इसलिए इनमें से किसी एक पर अत्यधिक ज़ोर देना, और शेष की अनदेखी करना उचित नहीं है। 

प्रभु यीशु ने जब अपने शिष्यों को उनकी पहली प्रचार सेवकाई के लिए भेजा था, तब भी उन से इन तीनों कार्यों को करने के लिए कहा था: “फिर उसने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें।” “और चलते चलते प्रचार कर कहो कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है। बीमारों को चंगा करो: मरे हुओं को जिलाओ: कोढिय़ों को शुद्ध करो: दुष्टात्माओं को निकालो: तुम ने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो” (मत्ती 10:1,7-8)। और अपनी अंतिम महान आज्ञा में भी इन तीनों कार्यों को करने के लिए ही कहा, “इसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं।” (मत्ती 28:19-20); “और उसने उन से कहा, तुम सारे जगत में जा कर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो। जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा। और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह होंगे कि वे मेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालेंगे। नई नई भाषा बोलेंगे, सांपों को उठा लेंगे, और यदि वे नाशक वस्तु भी पी जाएं तौभी उन की कुछ हानि न होगी, वे बीमारों पर हाथ रखेंगे, और वे चंगे हो जाएंगे” (मरकुस 16:15-18)। और फिर प्रेरितों के कार्य में भी, जो पहली कलीसिया के आरंभ और कार्यों का इतिहास है, हम प्रभु के शिष्यों और प्रेरितों को यही तीनों कार्य करते हुए देखते हैं। 

आज की परेशानी यह है कि कुछ लोग केवल चंगाइयों पर ही इतना ज़ोर देते हैं कि वही उनके प्रचार और सेवकाई का मुख्य विषय बना रहता है। वे चंगाई पाने को लालच के समान प्रयोग करके लोगों को आकर्षित करने के प्रयास करते हैं, और इस चंगाई के अतिरिक्त वे लोगों द्वारा पापों से क्षमा और उद्धार पाने, तथा परमेश्वर के वचन की समझ और उसके जीवनों में व्यवहारिक प्रयोग के बारे में या तो सिखाते ही नहीं है, या फिर उस पर बहुत कम बल देते हैं। ये लोग इस बात की अनदेखी कर देते हैं कि शारीरिक चंगाई से कहीं अधिक महत्वपूर्ण आत्मिक चंगाई है, क्योंकि हर चंगाई पाने के बाद भी शरीर ने अन्ततः मर ही जाना है, नाश होना ही है। किन्तु यदि आत्मा की चंगाई नहीं मिली, तो आत्मा नरक में जाएगी, और सारी शारीरिक चंगाई किसी काम की नहीं रहेगी। इसलिए प्राथमिकता आत्मिक चंगाई की या उद्धार पाने की है, शारीरिक चंगाई उसके बाद है, और इस क्रम को बनाए रखना है। इन तीनों सेवकाइयों में वचन की शिक्षा या उपदेश, सुसमाचार प्रचार, और चंगाई में संतुलन और उचित प्राथमिकता को बनाए रखना है। साथ ही कुछ लोगों ने चंगाई देने को अपनी प्रसिद्धि का, कमाई करने की साधन बना लिया है; चंगे के दावों के द्वारा वे सांसारिक लाभ और ख्याति पाने के प्रयासों में रहते हैं।  

 (2) दूसरी बात, सुसमाचार एक राज्य के बारे में है, किसी व्यक्ति, धारणा, धर्म, रीति-रिवाज़, या परंपरा के बारे में नहीं है। प्रभु ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई का आरंभ सुसमाचार प्रचार के साथ किया, और अपने उस उदाहरण के द्वारा हमें उस सुसमाचार प्रचार का स्वरूप प्रदान किया: “उस समय से यीशु प्रचार करना और यह कहना आरम्भ किया, कि मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है” (मत्ती 4:17)। यहाँ हम देखते हैं कि प्रभु द्वारा किए जाने वाले प्रचार या उपदेश का विषय था “... मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है”; और यही सुसमाचार का स्वरूप है। और यह इसीलिए सुसमाचार या अच्छी खबर है क्योंकि यह शीघ्र ही नष्ट हो जाने वाली इस नाशमान पृथ्वी और उसकी सभी नाशमान बातों से बचाए जाकर, अविनाशी परमेश्वर के अनन्तकालीन राज्य और उसकी अनन्त आशीषों में प्रवेश प्राप्त करने तथा सदा काल तक उसके साथ रहने के बारे में है (1 यूहन्ना 2:15-17)। सुसमाचार इस पृथ्वी पर किसी राज्य, या किसी शारीरिक उपलब्धि, या भौतिक संपत्ति अथवा संपन्नता के बारे में नहीं है। वह परमेश्वर के राज्य के बारे में है, जो निकट आ गया है, स्थापित होने वाला है; और जो कोई उसमें प्रवेश चाहता है, उसके प्रवेश पाने का पहला कदम पापों से पश्चाताप करना है। किसी भी व्यक्ति द्वारा बिना पापों से पश्चाताप किए सुसमाचार में कोई प्रगति या स्वीकृति नहीं है।

ध्यान करें कि प्रभु यीशु ने यह प्रचार यहूदियों, यानि कि परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा के लोगों के, जो पीढ़ियों से परमेश्वर की व्यवस्था, अपने धर्म की रीतियों, पर्वों, भेंटों, बलिदानों, आदि का पालन करते थे, मध्य में करना आरंभ किया। इसी से प्रकट है कि पश्चाताप करना सभी के लिए है, चाहे वे “प्रभु परमेश्वर के लोग” अर्थात ईसाई या मसीही ही क्यों न हों, जो चाहे कितनी भी पीढ़ियों से अपने धर्म की मान्यताओं, परंपराओं, और रीति-रिवाजों को मानते-मनाते चले आ रहे हों। परमेश्वर के राज्य में प्रवेश उन्हें केवल पश्चाताप से आरंभ करने के द्वारा ही प्राप्त होगा, किसी भी अन्य बात के आधार पर नहीं। साथ ही यह भी साधारण और स्पष्ट बात है कि पश्चाताप हमेशा ही हर व्यक्ति के द्वारा व्यक्तिगत रीति से अपने ही पापों के लिए किया जाता है। माता-पिता या पूर्वजों का किया गया पश्चाताप उनकी संतानों के लिए कार्यकारी नहीं होता है; और न ही परिवार के किसी सदस्य का उद्धार पाना और परमेश्वर की निकटता में बढ़ना, परिवार के अन्य सदस्यों को उद्धार प्रदान करता है।  

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं में न पड़े हों या पड़ जाएं; न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाले ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर भी ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें। यदि आप इन गलत शिक्षाओं में पड़ चुके हैं, तो अभी वचन के अध्ययन और बात को जाँच-परख कर, सही शिक्षा को, उसी के पालन को अपना लें।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • गिनती 31-33         
  • मरकुस 9:1-29

गुरुवार, 3 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (19)

 


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - पवित्र आत्मा के विषय गलत शिक्षाएं (9) - पवित्र आत्मा की निन्दा करने का पाप (3) 

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखने के बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखना आरंभ किया है। हम देख चुके हैं कि प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के नया जन्म या उद्धार पाते ही, तुरंत उसके उद्धार पाने के पल से ही परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी संपूर्णता में आकर उसके अंदर निवास करने लगता है, और उसी में बना रहता है, उसे कभी छोड़ कर नहीं जाता है; और इसी को पवित्र आत्मा से भरना या पवित्र आत्मा से बपतिस्मा पाना भी कहते हैं। वचन स्पष्ट है कि पवित्र आत्मा से भरना या उससे बपतिस्मा पाना कोई दूसरा या अतिरिक्त अनुभव नहीं है, वरन उद्धार के साथ ही सच्चे मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा का आकर निवास करना ही है। इन गलत शिक्षकों की एक और बहुत प्रचलित और बल पूर्वक कही जाने वाले बात है “अन्य-भाषाओं” में बोलना, और उन लोगों के द्वारा “अन्य-भाषाओं” को अलौकिक भाषाएं बताना, और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग के द्वारा इससे संबंधित कई और गलत शिक्षाओं को सिखाना। इसके बारे में भी हम देख चुके हैं कि यह भी एक ऐसी गलत शिक्षा है जिसका वचन से कोई समर्थन या आधार नहीं है। प्रेरितों 2 अध्याय में जो अन्य भाषाएं बोली गईं, वे पृथ्वी ही की भाषाएं और उनकी बोलियाँ थीं; कोई अलौकिक भाषा नहीं। हमने यह भी देखा था कि वचन में इस शिक्षा का भी कोई आधार या समर्थन नहीं है कि “अन्य-भाषाएं” प्रार्थना की भाषाएं हैं। इस गलत शिक्षा के साथ जुड़ी हुई इन लोगों की एक और गलत शिक्षा है कि “अन्य-भाषाएं” बोलना ही पवित्र आत्मा प्राप्त करने का प्रमाण है, जिसके भी झूठ होने और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग पर आधारित होने को हमने पिछले लेख में देखा है। पिछले लेख में हमने यह भी देखा था कि उन लोगों के सभी दावों के विपरीत, न तो प्रेरितों 2:3-11 का प्रभु के शिष्यों द्वारा अन्य-भाषाओं में बोलना कोई “सुनने” का आश्चर्यकर्म था, न ही अन्य भाषाएं प्रार्थना करने की गुप्त भाषाएँ हैं, और न ही ये किसी को भी यूं ही दे दी जाती हैं, जब तक कि व्यक्ति की उस स्थान पर सेवकाई न हो, जहाँ की भाषा बोलने की सामर्थ्य उसे प्रदान की गई है। एक और दावा जो ये पवित्र आत्मा और अन्य-भाषाएँ बोलने से संबंधित गलत शिक्षाएं देने वाले करते हैं, है कि व्यक्ति अन्य-भाषा बोलने के द्वारा सीधे परमेश्वर से बात करता है। इसके तथा कुछ संबंधित और बहुत महत्वपूर्ण बातों के बारे में हम पिछले दो लेखों में देख चुके हैं कि उनका यह दावा भी वचन की कसौटी पर बिलकुल गलत है, अस्वीकार्य है।

   इन गलत शिक्षा फैलाने वालों की एक और प्रमुख शिक्षा, जिसे वे अपने बचाव के लिए प्रयोग करते हैं, है “पवित्र आत्मा की निन्दा कभी क्षमा न होने वाला पाप है।” यह समझने के लिए कि यह “निरादर” या “निन्दा” वास्तव में है क्या, और यह क्यों केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा ही के विरुद्ध ही क्षमा नहीं हो सकता है, हमने पिछले लेख से परमेश्वर के वचन में से कुछ तथ्यों एवं शिक्षाओं को देखना आरंभ किया है, और पहले त्रिएक परमेश्वर के तीनों स्वरूपों, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के बारे में अपने इस विषय के संदर्भ से देखा है। फिर हमने देखा कि लूसिफर का पाप क्यों क्षमा नहीं हो सकता था; और यह भी समझा था कि वचन के अनुसार निन्दा (blasphemy) शब्द का वास्तव में क्या अर्थ और अभिप्राय होता है, और वचन के संदर्भ एवं प्रयोग के अनुसार क्यों जन-साधारण का हर संदेह, अविश्वास, अभद्र भाषा का प्रयोग, आदि, पवित्र आत्मा की निन्दा की श्रेणी में नहीं आता है। आज हम देखेंगे कि क्यों प्रभु यीशु ने “पवित्र आत्मा की निन्दा कभी क्षमा न होने वाला पाप है” केवल वचन के ज्ञानियों और शिक्षकों, फरीसियों के लिए ही क्यों कहा है (मरकुस 3:28-30 और लूका 12:10)। 

        यह समझने के लिए कि किस प्रकार से फरीसियों के लिए प्रभु यीशु का निरादर करना क्षमा न हो सकने वाले पाप ठहरा, इस संदर्भ में वचन के कुछ हवालों को देखिए:

           यूहन्ना 3:1-3 को देखिए: “फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। उसने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु हो कर आया है; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता। यीशु ने उसको उत्तर दिया; कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।” यहाँ, यह बिलकुल स्पष्ट है कि निकुदेमुस ने प्रभु से जो कहा - “हम जानते हैं”, उसके अनुसार न केवल वह स्वयं, वरन फरीसी समाज के सभी लोग भली-भांति जानते थे कि प्रभु यीशु परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आए हैं। तथा सभी फरीसी यह भी समझते थे कि प्रभु यीशु के कार्य यह प्रमाणित करते थे कि परमेश्वर उनके साथ है, और उन में होकर काम कर रहा है। 

धर्म के ये अगुवे प्रभु यीशु के, उस के सेवकाई से पहले के जीवन के बारे में, न तो अनभिज्ञ थे और न किसी संदेह में थे; वरन, वे उसके विषय सब बातों के बारे में अच्छे से जानते थे! इसीलिए जब प्रभु यीशु ने उन्हें चुनौती दी कि “तुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है? और यदि मैं सच बोलता हूं, तो तुम मेरी प्रतीति क्यों नहीं करते?” (यूहन्ना 8:46), तो उनमें से कोई भी प्रभु के जीवन में कोई पाप या बुराई को नहीं बता सका, कोई भी प्रभु को किसी भी बात में दोषी नहीं ठहरा सका।

 इसी प्रकार से जब “तब फरीसियों ने जा कर आपस में विचार किया, कि उसको किस प्रकार बातों में फंसाएं। सो उन्होंने अपने चेलों को हेरोदियों के साथ उसके पास यह कहने को भेजा, कि हे गुरु; हम जानते हैं, कि तू सच्चा है; और परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से सिखाता है; और किसी की परवाह नहीं करता, क्योंकि तू मनुष्यों का मुंह देखकर बातें नहीं करता” (मत्ती 22:15-16) तब भी उन्होंने उसे “हे गुरु” कहकर संबोधित किया, तथा इस तथ्य का अंगीकार किया कि प्रभु यीशु सच्चा है, परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से सिखाता है, और निष्पक्ष, निष्कपट व्यवहार करता है।

जब प्रभु यीशु मसीह को पकड़वाने वाले उनके शिष्य यहूदा इस्करियोती ने अपने किए पर दुख जताया और उन धर्म के अगुवों के पास आकर कहा, “जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चान्दी के सिक्के महायाजकों और पुरनियों के पास फेर लाया। और कहा, मैं ने निर्दोष को घात के लिये पकड़वाकर पाप किया है? उन्होंने कहा, हमें क्या? तू ही जान” (मत्ती 27:3-4), तब भी, यद्यपि उन्होंने यहूदा की बात को अनसुनी कर दिया, किन्तु उन्होंने प्रभु यीशु के निर्दोष होने की उसकी बात को अस्वीकार नहीं किया, उसके विषय कोई तर्क नहीं किया।    

और न ही प्रभु ने अपने बारे में उन्हें किसी संदेह में छोड़ा था; अनेकों अवसरों पर, यहाँ तक कि उस समय तक भी जब उन्हें झूठे मुकद्दमों में दोषी ठहराने के प्रयास किए जा रहे थे, प्रभु ने यह बारंबार स्पष्ट बता दिया था की वे कौन हैं (यूहन्ना 5:17-43; 8:25; 10:24; 14:11; लूका 22:67-70)। परन्तु प्रभु यीशु के वास्तविकता को भली-भांति जानते हुए भी उन्होंने कभी भी प्रभु पर विश्वास नहीं किया (यूहन्ना 12:37)। उलटे, यह सब जानते हुए भी, बुरे उद्देश्यों एवं स्वार्थी भावनाओं के अंतर्गत, उन्होंने प्रभु को मार डालने का षड्यंत्र रचा (यूहन्ना 11:47-50)। 

दूसरे शब्दों में, यद्यपि यहूदियों के धार्मिक अगुवे यह भली-भांति जानते थे कि प्रभु यीशु वास्तव में कौन हैं, और यह भी कि परमेश्वर उनके साथ है, तथा उन में होकर कार्य कर रहा है। फिर भी जानबूझकर, स्वार्थी लाभ के लिए, उन्होंने प्रभु की अवहेलना की, उन पर अविश्वास किया, और सबसे बुरा यह कि जानबूझकर उनके बारे में लोगों का गलत मार्गदर्शन किया। उन्होंने सभी के समक्ष प्रभु के कार्यों और शिक्षाओं में होकर दिखाए जा रहे परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को शैतानों के सरदार की सामर्थ्य कहने के द्वारा न केवल प्रभु और परमेश्वर के विषय झूठ बोला, वरन प्रभु में होकर कार्य करने वाली पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को शैतानी शक्ति बताया। अब पिछले लेख में हमने जो “निन्दा” (blasphemy) शब्द का वचन के अनुसार वास्तविक अर्थ को और उसके अभिप्रायों के बारे में सीखा था, उसे स्मरण कीजिए या फिर से देख लीजिए। उन फरीसियों तथा धर्म के अगुवों की यह, प्रभु के विरोध में, और स्वार्थ के अंतर्गत जानबूझकर कही गई बात; प्रभु के बारे में जानकारी रखते हुए भी और यह जानते हुए भी कि प्रभु पर उनके द्वारा लगाए जाने वाले आरोप झूठे हैं, फिर भी झूठ बोलकर प्रभु का निरादर करना, उन्हें अपमानित करना, और उनमें होकर कार्य करने वाली पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को शैतानी सामर्थ्य कहना, केवल इसे ही प्रभु ने पवित्र आत्मा के विरुद्ध किया गया कभी क्षमा न हो सकने वाला पाप कहा है; अन्य किसी बात को नहीं।

इसलिए, पवित्र आत्मा के विरुद्ध कभी क्षमा न हो सकने वाले पाप वह नहीं हैं जो बहुधा वर्तमान के अनेकों धार्मिक अगुवों के द्वारा कहे और बताए जाते हैं; और जो वचन, विशेषकर पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाओं को देने वाले बताते और फैलाते हैं। बाइबल में यह वाक्यांश एक बहुत ही विशिष्ट अपराध के लिए प्रयोग किया गया है, और केवल उस अपराध को ही यह कहा जाना चाहिए। अपनी गलत शिक्षाओं के विषय प्रश्नों से बचने के लिए लोगों को “पवित्र आत्मा की निन्दा” का भय दिखाना या कहना झूठ है, अनुचित है, वचन का दुरुपयोग है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित इन गलत शिक्षाओं में न पड़ जाएं; न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाले ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर भी ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें। यदि आप इन गलत शिक्षाओं में पड़ चुके हैं, तो अभी वचन के अध्ययन और बात को जाँच-परख कर, सही शिक्षा को, उसी के पालन को अपना लें।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • गिनती 28-30         
  • मरकुस 8:22-38