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शुक्रवार, 11 जून 2010

धार्मिक दीवाने

मेरा दोस्त मैट एक भोज में आमंत्रित था। जब वह वहां गया तो उसके साथ एक ऐसा व्यक्ति बैठा जो अविश्वासी तो था, साथ ही मसीहियों का उपहास करने में आनन्द पाता था।

सारी शाम वह व्यक्ति बड़े तीखे रूप में मैट को मसीहीयों के संबंध में ताने मारता रहा और मसीहीयों का मज़ाक उड़ाता रहा। हर कटाक्ष पर मैट बड़े शांत स्वरूप में बस इतना ही कहता, " यह एक रोचक विचार है।" अन्तत: मैट ने उससे एक ऐसा प्रश्न पूछा जो मैट की उस व्यक्ति में वास्त्विक रुचि को दर्शाता था और उस प्रश्न से उनकी बातचीत विपरीत विचारधाराओं से हट सकी।

वे दोनो जब जाने के लिये दरवाज़े की ओर बढ़ रहे थे तो उस व्यक्ति ने फिर से मैट की तरफ एक ताना मारा, जिसे सुनकर मैट ने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा और मुसकुराकर उससे कहा, "मेरे दोस्त, सारी शाम तुम मुझसे धर्म के बारे में ही बातें करते रहे हो। क्या तुम एक धार्मिक दीवाने हो?"

यह सुनकर उस व्यक्ति का सारा विरोध एक ज़ोर के ठहाके में जाता रहा और फिर वह कुछ गंभीर हो गया, उसमें वास्तव में धार्मिक दीवानगी थी - सब मनुष्यों में होती है, क्योंकि हम परमेश्वर से चाहे कितना भी दूर रहना चाहें, उसका प्रेम निरंतर हमारा पीछा करता रहता है। मैट की नम्रता और विनोदप्रीयता ने उस अविश्वासी को प्रभावित किया और उसके मन को सुसमाचार ग्रहण करने के लिये तैयार किया।

जब हम गैर मसीहीयों से व्यवहार करते हैं तो हमें "सांपों की नाई बुद्धिमान" (मत्ती १०:१६) होना है और उनसे हमारी बात-चीत अनुग्रह सहित और सलोनी हो (कुलुस्सियों ४:६)। - डेविड रोपर


"पृथ्वी के नमक" होने के कारण मसीही दुसरों को "जीवन के जल" के लिए प्यासा बना सकते हैं।


बाइबल पाठ: मत्ती १०:१६-२२


तुम्हारा वचन सदा अनुग्रह सहित और सलोना हो, कि तुम्हें हर मनुष्य को उचित रीति से उत्तर देना आ जाए। - कुलुस्सियों ४:६


एक साल में बाइबल:
  • एज़रा १, २
  • यूहन्ना १९:२३-४२

गुरुवार, 10 जून 2010

अनन्त वसन्त का देश

दक्षिण कैरोलिना के कोलंबिया बाइबल कॉलेज के एक भूतपूर्व अधिपति श्री जे. रॉबर्टसन ने दर्शाया कि हमारे बूढे और बुढ़ापे में कमज़ोर होने में भी परमेश्वर का एक बुद्धिमतापूर्ण उद्देश्य है। उनका कहना है, "मेरा विचार है कि परमेश्वर की योजना में जवानी का बल और सुन्दरता शरीर का है और बुढ़ापे का बल और सुन्दरता आत्मा का है। हम धीरे धीरे अपने क्षणिक और नाशवान बल और सौन्दर्य को खोते जाते हैं ताकि हम अपने अविनाशी बल और सौन्दर्य की तरफ ध्यान लगा सकें। तब ही हम नाशवान को छोड़कर अपने अविनाशी घर को जाने के लिये आतुर होंगे। यदि हम सदा जवान, बलवान और सुन्दर रहेंगे तो कभी संसार छोड़कर जाना नहीं चाहेंगे।"

अपनी जवानी में जब हम अपने रिश्तों, मित्रों और कार्यों में मग्न और आनन्दित रहते हैं तो अपने स्वर्गीय घर जाने की लालसा नहीं रखते। परन्तु समय के साथ जब हम अपने आप को परिवार और मित्रों से वंचित पाते हैं, हमारा देखना और सुनना धूमिल हो जाता है, भोजन का स्वाद नहीं रहता, ठीक से नींद नहीं आती, तो हमें अपने स्वर्गीय घर की लालसा होने लगती है।

अपने आप को मैं यह सलाह देता हूँ: जीवन की ग्रीष्म ॠतु हो या पतझड़, सदा कृतज्ञ रहो क्योंकि, जैसा प्रेरित पौलुस ने लिखा है, "परमेश्वर... हमारे सुख के लिये सब कुछ बहुतायत से देता है" (१ तिमुथियुस ६:१७)। साथ ही, जब जीवन की शरद ऋतु आरंभ होती है तब आनन्दित भी रहो क्योंकि तब उम्मीद कर सकते हैं कि शीघ्र ही हम अनन्त वसन्त के देश में होंगे। - वर्नन ग्राउंड्स


स्वर्ग की प्रतिज्ञा हमारी अनन्त आशा है।


बाइबल पाठ: सभोपदेशक १२:१-७


मैं लड़कपन से लेकर बुढ़ापे तक देखता आया हूं, परन्तु न तो कभी धर्मी को त्यागा हुआ, और न उसके वंश को टुकड़े मांगते देखा है। - भजन ३७:२५


एक साल में बाइबल:
  • २ इतिहास ३४-३६
  • यूहन्ना १९:१-२२

बुधवार, 9 जून 2010

घमंड का जोखिम

जब हमारे बच्चे छोटे थे, तो हमारा एक प्रीय पारिवारिक खेल था RISK (जोखिम) । इस खेल का लक्ष्य संसार पर कब्ज़ा करना था। प्रत्येक खिलाड़ी अपनी सेना को, देशों और महाद्वीपों को जीतने के लिये, एक से दूसरे स्थान पर ले बढ़ाता था। इस खेल को खेलते हुए मुझे सदा एक बात दिल्चस्प लगती थी कि आरंभ में जो खिलाड़ी जीतना शुरु करता था, अन्त में वह शायद ही कभी जीत पाता था। इसका कारण स्पष्ट था - जब बाकी खिलाड़ी जीतने वाले के बढ़ते हुए घमंड को देखते थे तो स्वाभाविक प्रतिक्रीया से उसके विरुद्ध एक हो जाते थे।

जानबूझकर या अवचेतना से, घमंडी तथा ताकतवर लोगों को पसन्द न करना स्वाभाविक होता है। ऐसे लोगों के हाव-भाव ही दूसरों को उनके रास्तों में बाधाएं डालने या उनका विरोध करने को प्रोत्साहित करते हैं।

आज के बाइबल पाठ में हम पाते हैं कि परमेश्वर सात बातों से घृणा करता है, जिनमें पहली है घमंड। जब कोई दूसरों को नीचा दिखाकर अपने आप को महान जताना चाहता है, तो यह उसकी घमंडी नज़रों से प्रकट हो जाता है। अपने अहंकार में फूलकर वह बुराई की योजनाएं बनाने लगता है और लोगों में फूट बोता है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर घमंडीयों से घृणा करता है।

घमंडी तथा ताकतवर लोग ये सोचकर चल सकते हैं कि उन्हें दूसरों की अप्रसन्नता की परवाह करने की आवश्यक्ता नहीं है, किंतु वे परमेश्वर के विरोध को नज़रंदाज़ नहीं कर सकते। पतरस हमें स्मरण दिलाता है कि हम अपने पर नहीं वरन उस परमेश्वर पर भरोसा रखें जो उचित समय पर हमें बढ़ाएगा (१ पतरस ५:६)। जब हम उसपर भरोसा रखकर उसके आधीन हो जाते हैं तो हम घमंड द्वारा चरित्र बिगड़ने के ज़ोखिम से बच जाते हैं और परमेश्वर के धन्यवादी तथा नम्र सेवक हो जाते हैं। - एल्बर्ट ली


कोई भी परमेश्वर और स्वयं, दोनो को एक साथ महिमा नहीं दे सकता।


बाइबल पाठ: नीतिवचन ६:१६-१९


इसलिये परमेश्वर के बलवन्‍त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिस से वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए। - १ पतरस ५:६


एक साल में बाइबल:
  • २ इतिहास ३२, ३३
  • यूहन्ना १८:१९-४०

मंगलवार, 8 जून 2010

एक जीवन की यादें

"डैडी, मेरी मदद कीजिए" - ये वे आखिरी शब्द थे जो डायेन और गैरी क्रोनिन ने सांस लेने के लिये ज़ोर लगाती अपनी बेटी के मुंह से सुने। क्रिस्टिन, १४ वर्ष की आयु में अचानक ही चल बसी। केवल दो दिन पहले उसने कहा कि वह कुछ ठीक महसूस नहीं कर रही है; गुरुवार को उसके शरीर में संक्रमण हुआ और शनिवार को वह अपने पिता से मदद की गुहार करती हुई चल बसी।

क्रिस्टिन की मृत्यु होने से पहले ही मेरा उसके पारिवारिक चर्च में बोलना निर्धारित हो चुका था। परमेश्वर के समय निर्धारण में, उसकी मृत्यु और अन्तिम संस्कार के एक दिन बाद मुझे उस मण्डली के सामने खड़े होकर सन्देश देना पड़ा।

क्रिस्टिन एक सजीव और सदा प्रफुल्लित रहने वाली किशोर थी, वह यीशु से प्रेम रखती थी और उसी के लिये जीती थी इसलिये उसकी अचानक मृत्यु हमारे सामने अनगिनित प्रश्न उठाती है। क्योंकि मैं भी कुछ वर्ष पहले अपनी किशोर बेटी की अचानक म्रुत्यु की ऐसी ही दुखःदायी परिस्थिति से निकला था, मैं उस स्तब्ध और दुखी मण्डली को संबोधित कर सका और उन्हें समझा सका। मैंने उन से कहा, सबसे पहले हमें परमेश्वर के सर्वाधिकारी होने को नहीं भूलना है; भजन १३९:१६ हमें स्मरण दिलाता है कि क्रिस्टिन का जीवन काल परमेश्वर द्वारा निर्धारित था। दूसरी बात जिसे सदा याद रखना है वह है उसका परिवार। चाहे २ महीने बीतें या ५ साल, वह परिवार उसकी मृत्यु को कभी भुला नहीं पाएगा। उन्हें सदा ऐसे मसीहीयों की आवश्यक्ता रहेगी जो उनकी सुधी रखें और उन्हें सांत्वना दें।

ऐसे कठिन समयों में हम कभी यह न भूलें कि परमेश्वर हर परिस्थिति पर अधिकार रखता है और उसकी इच्छा हमें अपने शान्तिवाहक बनाकर दूसरों तक शान्ति पहुंचाना है। - डेव ब्रैनन


निराशा की हर मरुभूमि में परमेश्वर ने सांत्वना की हरियाली प्रदान की है।


बाइबल पाठ: भजन १३९:१-१६


वह हमारे सब क्‍लेशों में शान्‍ति देता है, ताकि हम उस शान्‍ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्‍हें भी शान्‍ति दे सकें, जो किसी प्रकार के क्‍लेश में हों। - २ कुरिन्थियों १:४


एक साल में बाइबल: २ इतिहास ३०, ३१ यूहन्ना १८:१-१८

सोमवार, 7 जून 2010

वचन और संख्या

मेरे पति, जे, संख्याओं में निपुण हैं और मैं शब्दों अर्थात "वचन" में। यदि संख्याओं में मेरी कमज़ोरी कभी मेरे अहम् को ठेस पहुंचाती है तो अपने आप को बड़ा जताने के लिये मैं जे से कहती हूं कि "वचन" के लोग श्रेष्ठ होते हैं क्योंकि यीशु ने अपने आप को "वचन" कहा न कि "संख्या"।

अपने पक्ष में तर्क देने कि बजाए जे मेरी बात सुनकर बस मुस्कुरा देते हैं और मेरे बचकाने तर्कों से अधिक महत्वपूर्ण अपने काम को जारी रखते हैं। क्योंकि जे अपना बचाव नहीं करते इसलिये मुझे ही यह बचाव भी करना पड़ता है। यद्यपि मैं इस बात में सही हूं कि यीशु "वचन" है; किंतु मैं इस बात में गलत हूं कि उन्होंने अपने लिये किसी संख्या का प्रयोग नहीं किया। परमेश्वर के वचन का एक मर्मस्पर्शी भाग है प्रभु यीशु की प्रार्थना जो उन्होंने अपने बंदी बनाकर क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले करी। मृत्यु उनके सामने थी, ऐसे में उन्होंने न केवल अपने वरन अपने चेलों के लिये और हमारे लिये भी प्रार्थना करी। हमारे लिये उनकी प्रार्थना का सबसे महत्वपूर्ण भाग एक संख्या से सम्बंधित है। उन्होंने कहा: "मैं केवल इन्‍हीं के लिये बिनती नहीं करता, परन्‍तु उन के लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों। जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूं, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिये कि जगत प्रतीति करे, कि तू ही ने मुझे भेजा। और वह महिमा जो तू ने मुझे दी, मैं ने उन्‍हें दी है कि वे वैसे ही एक हों जैसे की हम एक हैं।" (यूहन्ना १७:२०-२२)

"वचन" के साथ जीवन जीने वाले लोग होने के कारण हमें स्मरण रखना है कि सही वचन भी संसार को निरर्थक लगेगा यदि मसीह में हम एक रहकर, एक मन और एक आवाज़ में परमेश्वर की महिमा न करें। - जूली ऐकैरमैन लिंक


परमेश्वर अपनी सन्तान को एकता में रहने के लिये बुलाता है।


बाइबल पाठ: यूहन्ना १७:२०-२६


मैं और पिता एक हैं। - यूहन्ना १०:३०


एक साल में बाइबल: २ इतिहास २८, २९ यूहन्ना १७

रविवार, 6 जून 2010

कठिन दिन

टेलिविज़न पर प्रसारित होने वाले एक सिरीयल कार्यक्रम "बैण्ड ऑफ ब्रदर्स" में योरप को नाट्ज़ी कबज़े से छुड़ाने के मुख्य प्रयास के दौरान सेना की एक टुकड़ी को वायुयानों द्वारा युद्ध के क्षेत्र के उपर से लेजा कर पैराशूट द्वारा वहां उतारा जाता है। सीरियल का मुख्य पात्र लैफटिनैंट रिचर्ड विनटर्स जब पैराशूट से उतर रहा होता है तब उनके विरुद्ध मशीन गन और तोपों की भारी गोलाबारी चल रही होती है।

विनटर्स बाद में युद्ध में अपने प्रथम दिन को याद करके कहता है, "उस रात मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया कि उसने मुझे उस सब से कठिन दिन में सुरक्षित रखा।....मैंने परमेश्वर से वायदा किया कि अगर मैं सुरक्षित घर लौटा तो मैं किसी शांत स्थान पर एक छोटा सा ज़मीन का टुकड़ा खरीदकर, वहां शांति से रहुंगा।" परन्तु विनटर्स यह भी जानता था कि ऐसा दिन के आने तक, उसे युद्ध में सब कुछ सहते रहना है।

बाइबल बताती है कि विश्वासी भी शैतान द्वारा परमेश्वर के विरोध में छेड़े गए युद्ध में फंसे हैं। इस कारण उन्हें "मसीह यीशु के अच्छे योद्धा के समान दुख उठाने" की चुनौती है (२ तिमुथियुस २:१०)। पौलुस के ज़माने में रोमी सम्राट के योद्धा अपने सम्राट के लिये तकलीफें उठाते थे। यीशु के अनुयायी होने के नाते, हमें भी उस ’राजाओं के राजा’ की सेवा के लिये दुख उठाने को तैयार रहना चाहिये।

स्वर्ग में हमें कोई भी कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा, वरन हम अपने उद्धारकर्ता के साथ अनन्त शांति में रहेंगे। परन्तु अभी हमें विश्वास के साथ उसके लिये स्थिर रहना और सब कुछ निभाना है। - डेनिस फिशर


जो दुख सहने को तैयार हैं उनकी जीत अवश्यंभावी है।


बाइबल पाठ: २ तिमुथियुस २:१-४


मसीह यीशु के अच्‍छे योद्धा की नाई मेरे साथ दुख उठा। - २ तिमुथियुस २:३


एक साल में बाइबल:
  • २ इतिहास २५-२७
  • यूहन्ना १६

शनिवार, 5 जून 2010

गोद लिया हुआ

प्राचीन रोमी साम्राज्य में सम्राट कभी कभी उत्तराधिकार के लिये किसी योग्य जन को गोद ले लेते थे। अगस्तुस कैसर को उसके बड़े काका जूलियस कैसर ने गोद लिया। सम्राट तिबिरयस, ट्रोज़न, हैड्रियन भी गोद लिये हुए थे। वे सब प्रतापि शासक हुए क्योंकि प्रत्येक अपने दत्तक पिता के समन जीया।

प्रत्येक मसीही विश्वासी राजाओं के राजा परमेश्वर का दत्तक पुत्र है। उसके इस उपकार के लिये हम उसके अति आभारी हैं। परन्तु परमेश्वर जिसके पास सब कुछ है, हम उसका प्रत्युप्कार नहीं कर सकते।

परमेश्वर हमसे क्या चाहता है? वह चाहता है कि हम ऐसा जीवन जियें जो उसकी सन्तान होने के अनुकूल हो। ऐसे सब कार्य और बातें जो हमारे परमेश्वर की सन्तान होने के अनुरूप नहीं हैं, उन्हें जीवन से हटा देना है (कुलुसियों ३:५)। स्वार्थी और नाशकारी मार्गों के स्थान पर ऐसे कार्य करने हैं जो परमेश्वर के प्रति हमारे प्रेम और आभार को और हमारे परमेश्वर की सन्तान होने को प्रदर्शित करते हैं। पौलुस ने लिखा, "इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो" (पद १२)।

क्या आपके आसपास के लोग कह सकते हैं कि आप वास्तव में परमेश्वर की सन्तान हैं? पवित्र आत्मा से पूछें कि आपके जीवन में ऐसा क्या है जिसे आप को छोड़ना है और क्या है जिसे धारण करना है, जिससे आप वास्तव में अपने परमेश्वर के पुत्र होने के औहदे को प्रदर्शित कर सकें। - सी. पी. हीया।


जब हम परमेश्वर को अपना पिता कहकर उसकी सन्तान के समान जीवन व्यतीत करते हैं तो उसके नाम को आदर देते हैं।


बाइबल पाठ: कुलुसियों ३:१-१२


इसलिये अपने उन अंगो को मार डालो, जो पृथ्वी पर हैं, अर्थात व्यभिचार, अशुद्धता, दुष्‍कामना, बुरी लालसा और लोभ को जो मूर्ति पूजा के बराबर है। - कुलुसियों ३:५


एक साल में बाइबल:
  • २ इतिहास २३, २४
  • यूहन्ना १५