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बुधवार, 25 मई 2016

गति


   कुछ समय पहले मुझे एक शारीरिक व्याधि हो गई - मेरे बांएँ कन्धे और भुजा में दर्द होने लगा, मेरे अँगूठे तथा उससे ऊपर के भाग में पीड़ादायक छाले हो गए, और मैं थका हुआ रहने लगा। जब मैं डॉक्टर के पास गया, तो उसने बाताया कि मुझे शिंगल्स अर्थात हर्पीस हो गया है। डॉक्टर ने मुझे दवाईयाँ दीं और बताया कि इस बीमारी को ठीक होने में कुछ हफ्तों का समय लगेगा। बीमारी के कारण मुझे अपनी दिनचर्या परिवर्तित करनी पड़ी; मुझे सुबह तथा दोपहर में नींद की एक झपकी लेनी पड़ती थी जिससे मैं अपने कार्य करने की सामर्थ बनाए रख सकूँ। जब तक मैं बीमारी से ठीक नहीं हो गया, मुझे अपने कार्य और दिनचर्या की गति को निर्धारित करके विश्राम का समय बीच में डालना पड़ा।

   एक बार जब प्रभु यीशु ने अपने चेलों को उसके नाम में सेवकाई करने के लिए भेजा, तो उस सामर्थ तथा अद्भुत परिणामों के कारण जो उन्होंने अपने जीवनों में कार्यकारी होते देखी, वे इतने उत्साहित हो गए कि लौटने पर वे ठीक से भोजन और विश्राम के लिए समय निकाल नहीं पा रहे थे। प्रभु यीशु ने उन से कहा, "...तुम आप अलग किसी जंगली स्थान में आकर थोड़ा विश्राम करो; क्योंकि बहुत लोग आते जाते थे, और उन्हें खाने का अवसर भी नहीं मिलता था" (मरकुस 6:31)।

   सभी को कभी ना कभी विश्राम की आवश्यकता होती है, और यदि हम उचित समय पर ऐसा नहीं करते हैं तो फिर हमें इसके शारीरिक और मानसिक दुषप्रभाव झेलने पड़ते हैं। तब हम अपनी ज़िम्मेदारियों को भी जितना हमें निभाना चहिए, उतनी अच्छी तरह से नहीं निभा पाते, हमारी कार्य क्षमता और कुशलता दोनों प्रभावित होती हैं।

   क्या प्रभु आप से कह रहा है कि कुछ समय के लिए अलग होकर विश्राम कर लें? अपने कार्य और जीवन की गति को निर्धारित करें, उसे उचित रखें, आवश्यक विश्राम को लेने से ना कतराएं। इस से ना केवल आप शारीरिक और मानसिक रीति से स्वस्थ रहेंगे, वरन आपकी कार्य क्षमता और गुणवन्ता भी बेहतर रहेगी। - डेनिस फिशर


टूट कर बिखर जाने से बचने के लिए परमेश्वर के साथ प्रार्थना में संगति के लिए 
तथा विश्राम के लिए समय अवश्य निकालें।

[प्रभु यीशु ने कहा:] मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। - मत्ती 11:29

बाइबल पाठ: मरकुस 6:30-36
Mark 6:30 प्रेरितों ने यीशु के पास इकट्ठे हो कर, जो कुछ उन्होंने किया, और सिखाया था, सब उसको बता दिया। 
Mark 6:31 उसने उन से कहा; तुम आप अलग किसी जंगली स्थान में आकर थोड़ा विश्राम करो; क्योंकि बहुत लोग आते जाते थे, और उन्हें खाने का अवसर भी नहीं मिलता था। 
Mark 6:32 इसलिये वे नाव पर चढ़कर, सुनसान जगह में अलग चले गए। 
Mark 6:33 और बहुतों ने उन्हें जाते देखकर पहिचान लिया, और सब नगरों से इकट्ठे हो कर वहां पैदल दौड़े और उन से पहिले जा पहुंचे। 
Mark 6:34 उसने निकलकर बड़ी भीड़ देखी, और उन पर तरस खाया, क्योंकि वे उन भेड़ों के समान थे, जिन का कोई रखवाला न हो; और वह उन्हें बहुत सी बातें सिखाने लगा। 
Mark 6:35 जब दिन बहुत ढल गया, तो उसके चेले उसके पास आकर कहने लगे; यह सुनसान जगह है, और दिन बहुत ढल गया है। 
Mark 6:36 उन्हें विदा कर, कि चारों ओर के गांवों और बस्‍तियों में जा कर, अपने लिये कुछ खाने को मोल लें।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 इतिहास 25-27
  • यूहन्ना 9:1-23


मंगलवार, 24 मई 2016

उपयुक्त नाम


   दक्षिण-पूर्व एशिया के देश इंडोनेशिया का नाम यूनानी भाषा के दो शब्दों को मिलाने से बना है, जिनक मिला-जुला अर्थ होता है "द्वीप"। उस देश के लिए यह नाम बिलकुल उपयुक्त है क्योंकि इंडोनेशिया 750,000 वर्ग मील में फैले 17,500 द्वीपों का देश है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में हम पाते हैं कि लोगों के नाम, जो चाहे उन्हें जन्म के समय मिले हों या फिर बाद में, अकसर उनके और उनके चरित्र के बारे में बताते हैं। उदाहरणस्वरूप, बरनबास का अर्थ होता है ’प्रोत्साहन का पुत्र’ और बरनबास सदा जो उसके संपर्क में आते रहे उनको प्रोत्साहित करता रहा; ऐसे ही याकूब का अर्थ है ’अड़ंगीमार’, और हम पाते हैं कि परमेश्वर से हुए साक्षात्कार से पहले याकूब अपने जीवन में लोगों को, यहाँ तक कि अपने भाई और अपने पिता को भी, अपनी स्वार्थ-सिद्धी, अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करता रहा, धोखे देता रहा।

   बाइबल का सबसे उप्युक्त नाम है "यीशु"। प्रभु यीशु के जन्म से पहले जब स्वर्गदूत ने प्रभु के सांसारिक पिता यूसुफ से उसके बारे में बातचीत करी तो यूसुफ से कहा, "वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा" (मत्ती 1:21)। यीशु शब्द का अर्थ है ’प्रभु बचाता है’ और यह प्रभु यीशु के संसार में आने के उद्देश्य और उसके कार्य, दोनों को ही परिभाषित करता है। प्रभु यीशु का एक और नाम है - इम्मानुएल, अर्थात ’परमेश्वर हमारे साथ’ (यशायाह 1:23; मत्ती 1:23); और यह नाम उसमें होकर हमें मिलने वाली अनन्त आशा और शांति को दिखाता है। हमारे उद्धार और पाप क्षमा के लिए प्रभु यीशु के अलावा और कोई उपयुक्त नाम नहीं है। - बिल क्राउडर


यीशु नाम ही हमारे विश्वास और आशा का आधार है।

और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें। - प्रेरितों 4:12

बाइबल पाठ: मत्ती 1:18-25
Matthew 1:18 अब यीशु मसीह का जन्म इस प्रकार से हुआ, कि जब उस की माता मरियम की मंगनी यूसुफ के साथ हो गई, तो उन के इकट्ठे होने के पहिले से वह पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती पाई गई। 
Matthew 1:19 सो उसके पति यूसुफ ने जो धर्मी था और उसे बदनाम करना नहीं चाहता था, उसे चुपके से त्याग देने की मनसा की। 
Matthew 1:20 जब वह इन बातों के सोच ही में था तो प्रभु का स्वर्गदूत उसे स्‍वप्‍न में दिखाई देकर कहने लगा; हे यूसुफ दाऊद की सन्तान, तू अपनी पत्‍नी मरियम को अपने यहां ले आने से मत डर; क्योंकि जो उसके गर्भ में है, वह पवित्र आत्मा की ओर से है। 
Matthew 1:21 वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा। 
Matthew 1:22 यह सब कुछ इसलिये हुआ कि जो वचन प्रभु ने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा था; वह पूरा हो। 
Matthew 1:23 कि, देखो एक कुंवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा जिस का अर्थ यह है “परमेश्वर हमारे साथ”। 
Matthew 1:24 सो यूसुफ नींद से जागकर प्रभु के दूत की आज्ञा अनुसार अपनी पत्‍नी को अपने यहां ले आया। 
Matthew 1:25 और जब तक वह पुत्र न जनी तब तक वह उसके पास न गया: और उसने उसका नाम यीशु रखा।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 इतिहास 22-24
  • यूहन्ना 8:28-59


सोमवार, 23 मई 2016

अधिक


   जब लोग मुझ से पूछते हैं कि "मैं कैसा हूँ" तो कभी-कभी मेरा उत्तर होता है, "जैसा होना चाहिए उससे अधिक अच्छा हूँ!" मुझे स्मरण है कि यह सुनकर एक नेकनीयत व्यक्ति ने प्रत्युत्तर में कहा, "अरे नहीं जो; आप तो बहुत अधिक के योग्य हैं" और मेरा उत्तर था, "वास्तव में ऐसा नहीं है।" यह सब उत्तर-प्रत्युत्तर के पीछे मेरा संकेत तथा विचार उसकी ओर होता है जो मुझे परमेश्वर से मिलना चाहिए - उसका न्याय और मेरे पापों का दण्ड।

   हम बड़ी सरलता से यह भूल जाते हैं कि अपने अन्दर से, अपने मन-ध्यान-विचारों में हम कैसे घोर पापी हैं। अपने बारे में आवश्यकता से अधिक बढ़कर राय रखने से, हमारे प्रति दिखाए उसके महान अनुग्रह के लिए परमेश्वर के प्रति हमारी कृतज्ञता घट जाती है। हमारे पापों की क्षमा और उद्धार के लिए जो कीमत परमेश्वर ने चुकाई है, उसका महत्व हमारे लिए कुछ हलका हो जाता है।

   जैसा परमेश्वर के वचन बाइबल में भजनकार ने किया, वैसे ही यदि हम भी अपने जीवनों के लिए करें, तो हम भी भजनकार के समान यही कहेंगे, "उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया, और न हमारे अधर्म के कामों के अनुसार हम को बदला दिया है" (भजन 103:10)। जब हम अपने आप को परमेश्वर की पवित्रता और खराई के सामने रखते हैं, तो हमारी अपनी सारी धार्मिकता जाती रहती है और हम यह एहसास करने पाते है कि सिवाए परमेश्वर के न्याय और नर्क के हमारे लिए और कोई विकल्प नहीं है; और स्वर्ग की तो कोई संभावना ही नहीं है। यदि हम स्वर्ग के भागी हो सकते हैं तो वह केवल एक आधार पर - यदि वहाँ जाना किसी की दया से हमें भेंट में मिल सके; और यही प्रभु यीशु ने हमारे लिए किया है। प्रभु यीशु ने हमारे सारे पाप अपने ऊपर लेकर हमारे लिए उनका दण्ड सह लिया और अपनी दया में होकर अपनी धार्मिकता तथा स्वर्ग जाने का अधिकार हमें भेंट में दे दिया। अब जो कोई स्वेच्छा से प्रभु यीशु की यह भेंट स्वीकार करता है, वह उसकी इस दया और अनुग्रह का पात्र बन जाता है, स्वर्ग जाने का हकदार बन जाता है - अपने किन्ही कर्मों से नहीं, वरन केवल प्रभु के अनुग्रह के कारण। इसीलिए भजनकार आगे कहता है, "जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊंचा है, वैसे ही उसकी करूणा उसके डरवैयों के ऊपर प्रबल है" (भजन 103:11)।

   जब हम इस बात का एहसास करते हैं कि वास्तव में हम अन्दर से कैसे हैं, और इस बात का भी कि परमेश्वर हमारी इस वास्तविकता को हम से भी अधिक विस्तार से जानता है, और फिर भी वह हम से प्रेम करता है, हमारी भलाई के लिए योजनाएं बनाता है, हमें सदा अपने साथ बनाए रखना चाहता है, तो हम उसके प्रति कृतज्ञता, धन्यवाद और अराधना में नतमस्तक हो जाते हैं।

   प्रभु परमेश्वर ने वास्त्व में हमें जैसे के हम हकदार थे, हमें उससे कहीं बेहतर और कहीं अधिक दिया है। - जो स्टोवैल


इस महान छुटकारे के अलावा यदि अब परमेश्वर हमारे लिए और कुछ ना भी करे, 
तो भी उसने हमारे लिए बहुत कुछ कर दिया है।

परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उसने हम से प्रेम किया। जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया; (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।) और मसीह यीशु में उसके साथ उठाया, और स्‍वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया। - इफिसियों 2:4-6

बाइबल पाठ: भजन 103:1-14
Psalms 103:1 हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे! 
Psalms 103:2 हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी उपकार को न भूलना। 
Psalms 103:3 वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है, 
Psalms 103:4 वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है, और तेरे सिर पर करूणा और दया का मुकुट बान्धता है, 
Psalms 103:5 वही तो तेरी लालसा को उत्तम पदार्थों से तृप्त करता है, जिस से तेरी जवानी उकाब की नाईं नई हो जाती है।
Psalms 103:6 यहोवा सब पिसे हुओं के लिये धर्म और न्याय के काम करता है। 
Psalms 103:7 उसने मूसा को अपनी गति, और इस्राएलियों पर अपने काम प्रगट किए। 
Psalms 103:8 यहोवा दयालु और अनुग्रहकरी, विलम्ब से कोप करने वाला और अति करूणामय है। 
Psalms 103:9 वह सर्वदा वादविवाद करता न रहेगा, न उसका क्रोध सदा के लिये भड़का रहेगा। 
Psalms 103:10 उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया, और न हमारे अधर्म के कामों के अनुसार हम को बदला दिया है। 
Psalms 103:11 जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊंचा है, वैसे ही उसकी करूणा उसके डरवैयों के ऊपर प्रबल है। 
Psalms 103:12 उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उसने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है। 
Psalms 103:13 जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है। 
Psalms 103:14 क्योंकि वह हमारी सृष्टि जानता है; और उसको स्मरण रहता है कि मनुष्य मिट्टी ही है।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 इतिहास 19-21
  • यूहन्ना 8:1-27


रविवार, 22 मई 2016

सुनना


   अपनी पुस्तक Listening to Others में लेखिका जॉयस हगेट सुनने के महत्व तथा जो कठिन परिस्थितियों में हैं उन्हें उचित प्रतिक्रिया देने के बारे में बताती हैं। इन बातों को वे अपने अनुभवों के आधार पर बताती हैं, जब दुःखों और कठिनाईयों में पड़े लोगों के साथ बैठकर उन्होंने उनकी बातें सुनने में समय बिताया। वे बताती हैं कि अनेकों लोगों ने उनका बहुत धन्यवाद किया उस सहायता के लिए जो उन्होंने उन लोगों के लिए करी, जबकि जॉयस का कहना है कि बहुत बार तो उन्होंने कुछ भी नहीं किया था, केवल शांत बैठकर उन लोगों की बात सुनी थी, उन्हें अपने मन की व्यथा निर्बाधित उंडेल लेने दी थी। जॉयस का निषकर्ष था कि दुःखी लोगों की सहायता करने का एक प्रभावी तरीका, ध्यान लगाकर उनकी बात सुनना भी है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल के एक पात्र अय्युब के साथ भी हम यही बात पाते हैं। अय्युब के परमेश्वर में विश्वास को गिराने के लिए शैतान उसकी घोर परीक्षा लेता है, उसका घर-बार, परिवार, संपत्ति और सेहत सब पर शैतान हमला करके सब ले लेता है, किंतु अय्युब का विश्वास परमेश्वर पर से नहीं हटता। उसके इस घोर दुःख के समय में उसके मित्र उससे मिलने और उसे सांत्वना देने आते हैं। उसकी दशा देखकर वे मित्र सात दिन तक चुपचाप उसके साथ बैठे तो रहते हैं (अय्युब 2:13), लेकिन जब अय्युब अपनी व्यथा उनके सामने कहना आरंभ करता है तो उसकी व्यथा का वर्णन सुनने की बजाए वे उस से अपने ही विचार कहने लगते हैं, उस पर दोषारोपण करते हैं, और उसके जीवन में किसी पाप के कारण ही इन दुःखों के आने का इलज़ाम उस पर लगाते हैं। उनकी उपस्थिति अय्युब के लिए सांत्वना का नहीं वरन कष्ट का कारण हो जाती है और वह कहता है, "भला होता कि मेरा कोई सुनने वाला होता! (सर्वशक्तिमान अभी मेरा न्याय चुकाए! देखो मेरा दस्तखत यही है)। भला होता कि जो शिकायतनामा मेरे मुद्दई ने लिखा है वह मेरे पास होता!" (अय्युब 31:35)।

   जब हम किसी की बात ध्यान से सुनते हैं, तो हम उस पर प्रगट करते हैं कि तुम्हारे संदर्भ में जो तुम्हारी चिंताएं है, वे मेरी भी है; जो तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण है, वह मेरे लिए भी है। अवश्य ही कठिनाई में पड़े लोगों को नेक और भली सलाह की आवश्यकता होती है; लेकिन इससे भी बढ़कर अनेकों बार लोगों को ऐसे साथियों की आवश्यकता होती है जो उनसे प्रेम करते हैं, उनकी चिंता करते हैं, उनकी बात ध्यान से सुनने के लिए समय देते हैं। ऐसे ध्यान से किसी की बात सुनना सरल कार्य नहीं है; किसी के मन की बात को सुन कर समझ पाना और फिर उसे एक सही एवं उचित प्रतिक्रीया दे पाने के लिए समय, नम्रता और लगन की आवश्यकता होती है जो उसके प्रति हमारी सच्ची सहानुभूति का सूचक है।

   हे प्रभु हमें प्रेम से भरा मन और दूसरों की सुनने वाले कान दे। - डेविड रोपर


जब कोई बोल रहा हो, और हम उसकी बात का उत्तर सोचना आरंभ कर दें, 
तो वास्तव में हम उसकी बात को सुन नहीं रहे होते।

हे बुद्धिमानों! मेरी बातें सुनो, और हे ज्ञानियो! मेरी बातों पर कान लगाओ; क्योंकि जैसे जीभ से चखा जाता है, वैसे ही वचन कान से परखे जाते हैं। - अय्युब 34:2-3

बाइबल पाठ: अय्युब 2:11-13
Job 2:11 जब तेमानी एलीपज, और शूही बिलदद, और नामाती सोपर, अय्यूब के इन तीन मित्रों ने इस सब विपत्ति का समाचार पाया जो उस पर पड़ी थीं, तब वे आपस में यह ठान कर कि हम अय्यूब के पास जा कर उसके संग विलाप करेंगे, और उसको शान्ति देंगे, अपने अपने यहां से उसके पास चले। 
Job 2:12 जब उन्होंने दूर से आंख उठा कर अय्यूब को देखा और उसे न चीन्ह सके, तब चिल्लाकर रो उठे; और अपना अपना बागा फाड़ा, और आकाश की ओर धूलि उड़ाकर अपने अपने सिर पर डाली। 
Job 2:13 तब वे सात दिन और सात रात उसके संग भूमि पर बैठे रहे, परन्तु उसका दु:ख बहुत ही बड़ा जान कर किसी ने उस से एक भी बात न कही।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 इतिहास 16-18
  • यूहन्ना 7:28-53


शनिवार, 21 मई 2016

लंगर


   समुद्री तूफान सैन्डी ने फ्लोरिडा के तट पर प्रहार किया था, और उससे बचने के लिए मैट तथा जेसिका अपनी नाव को सुरक्षित स्थान पर लाने का प्रयास कर रहे थे कि उनकी नाव पानी के नीचे की मिट्टी में फंस गई। नाव वहीं फंसी इधर-उधर हिचकोले लेने लगी, लेकिन वे उसे बाहर नहीं निकाल पा रहे थे। इसलिए मैट तथा जेसिका ने वहीं नाव का लंगर पानी में डाल दिया। ऐसा करने से नाव एक स्थान पर स्थिर हो गई, हिचकोले आने बन्द हो गए और जब तक बचाव दल उन्हें लेने नहीं आ गया वे नाव में सुरक्षित रहे। बाद में मैट तथा जेसिका ने बताया कि यदि वे लंगर ना डालते तो तूफान और ऊंची लहरों के प्रहार उस नाव को किनारे पर पटक देते, चकनाचूर कर देते।

   हमारे आत्मिक जीवनों में भी हमें ऐसे ही लंगरों की आवश्यकता होती है जो हमें जीवन के तूफानों में स्थिर तथा सुरक्षित बनाए रखें। जब मूसा की मृत्यु के बाद परमेश्वर ने यहोशु को इस्त्राएल का अगुवा नियुक्त किया, तो साथ ही परमेश्वर ने यहोशु को अपनी प्रतिज्ञाओं के लंगर भी दिए जिससे कठिन समयों में वह स्थिर बना रह सके। परमेश्वर ने यहोशु से कहा: "तेरे जीवन भर कोई तेरे साम्हने ठहर न सकेगा; जैसे मैं मूसा के संग रहा वैसे ही तेरे संग भी रहूंगा; और न तो मैं तुझे धोखा दूंगा, और न तुझ को छोडूंगा" (यहोशु 1:5)। साथ ही परमेश्वर ने यहोशु तथा इस्त्राएलियों को अपना वचन भी दिया कि वे उसका अध्ययन तथा पालन करें: "इतना हो कि तू हियाव बान्धकर और बहुत दृढ़ हो कर जो व्यवस्था मेरे दास मूसा ने तुझे दी है उन सब के अनुसार करने में चौकसी करना; और उस से न तो दाहिने मुड़ना और न बांए, तब जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा काम सफल होगा। व्यवस्था की यह पुस्तक तेरे चित्त से कभी न उतरने पाए, इसी में दिन रात ध्यान दिए रहना, इसलिये कि जो कुछ उस में लिखा है उसके अनुसार करने की तू चौकसी करे; क्योंकि ऐसा ही करने से तेरे सब काम सफल होंगे, और तू प्रभावशाली होगा" (यहोशु 1:7-8)। परमेश्वर का वचन, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं और उनके साथ बनी रहने वाली परमेश्वर की उपस्थिति यहोशु तथा इस्त्राएलियों के लिए वे आत्मिक लंगर थे जो आने वाले कठिन समयों तथा चुनौतियों में उन्हें स्थिर बनाए रखने के लिए दिए गए थे।

   जब कभी हम दुःखों से होकर निकलें, या हमारे मसीही विश्वास को लेकर कोई शंका हमें परेशान अथवा विचलित करने लगे तो यही आत्मिक लंगर आज हमारी भी उसी प्रकार से सुरक्षा प्रदान करेंगे जैसे तब यहोशु और इस्त्राएलियों को प्रदान करी थी। हमारा विश्वास चाहे कितना भी कमज़ोर क्यों ना हो, किंतु यदि वह परमेश्वर के वचन बाइबल की बातों एवं प्रतिज्ञाओं तथा हमारे साथ परमेश्वर की लगातार बनी रहने वाली उपस्थिति पर आधारित है, तो संसार का कोई तूफान हम पर प्रबल नहीं हो सकता; परमेश्वर हर परिस्थिति से हमें सुरक्षित निकाल ले आएगा। - ऐनी सेटास


जब हम तूफान की प्रचण्डता का अनुभव करते हैं, 
तब ही हम अपने लंगर की सामर्थ पहचान पाते हैं।

परन्तु जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वे नया बल प्राप्त करते जाएंगे, वे उकाबों की नाईं उड़ेंगे, वे दौड़ेंगे और श्रमित न होंगे, चलेंगे और थकित न होंगे। - यशायाह 40:31

बाइबल पाठ: यहोशु 1:1-9
Joshua 1:1 यहोवा के दास मूसा की मृत्यु के बाद यहोवा ने उसके सेवक यहोशू से जो नून का पुत्र था कहा, 
Joshua 1:2 मेरा दास मूसा मर गया है; सो अब तू उठ, कमर बान्ध, और इस सारी प्रजा समेत यरदन पार हो कर उस देश को जा जिसे मैं उन को अर्थात इस्राएलियों को देता हूं। 
Joshua 1:3 उस वचन के अनुसार जो मैं ने मूसा से कहा, अर्थात जिस जिस स्थान पर तुम पांव धरोगे वह सब मैं तुम्हें दे देता हूं। 
Joshua 1:4 जंगल और उस लबानोन से ले कर परात महानद तक, और सूर्यास्त की ओर महासमुद्र तक हित्तियों का सारा देश तुम्हारा भाग ठहरेगा। 
Joshua 1:5 तेरे जीवन भर कोई तेरे साम्हने ठहर न सकेगा; जैसे मैं मूसा के संग रहा वैसे ही तेरे संग भी रहूंगा; और न तो मैं तुझे धोखा दूंगा, और न तुझ को छोडूंगा। 
Joshua 1:6 इसलिये हियाव बान्धकर दृढ़ हो जा; क्योंकि जिस देश के देने की शपथ मैं ने इन लोगों के पूर्वजों से खाई थी उसका अधिकारी तू इन्हें करेगा। 
Joshua 1:7 इतना हो कि तू हियाव बान्धकर और बहुत दृढ़ हो कर जो व्यवस्था मेरे दास मूसा ने तुझे दी है उन सब के अनुसार करने में चौकसी करना; और उस से न तो दाहिने मुड़ना और न बांए, तब जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा काम सफल होगा। 
Joshua 1:8 व्यवस्था की यह पुस्तक तेरे चित्त से कभी न उतरने पाए, इसी में दिन रात ध्यान दिए रहना, इसलिये कि जो कुछ उस में लिखा है उसके अनुसार करने की तू चौकसी करे; क्योंकि ऐसा ही करने से तेरे सब काम सफल होंगे, और तू प्रभावशाली होगा। 
Joshua 1:9 क्या मैं ने तुझे आज्ञा नहीं दी? हियाव बान्धकर दृढ़ हो जा; भय न खा, और तेरा मन कच्चा न हो; क्योंकि जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे संग रहेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 इतिहास 13-15
  • यूहन्ना 7:1-27


शुक्रवार, 20 मई 2016

सत्य वचन


   बहुत से लोगों का मानना है कि परमेश्वर का वचन बाइबल केवल कालपनिक कहानियों का संकलन है - एक लड़के ने दैत्य को मारा; एक मनुष्य को बड़ी सी मछली ने निगल लिया; एक व्यक्ति ने पानी का जहाज़ बनाकर अपने परिवार तथा जानवरों को जलप्रलय से बचा लिया, आदि। यहाँ तक कि कुछ धार्मिक लोग भी यही मानते हैं कि बाइबल की बातें अच्छी नैतिक कहानियां हैं जो हमें कुछ आत्मिक बातों की शिक्षाएं प्रदान करने के लिए लिखी गई हैं।

   किंतु स्वयं प्रभु यीशु ने बाइबल की इन घटनाओं को सत्य घटनाएं कहकर लोगों के सामने इनकी पुष्टि करी। नूह द्वारा जलप्रलय से बचने के लिए जहाज़ बनाने के द्वारा प्रभु यीशु ने समझाया कि उसका पुनःआगमन भी ऐसे ही होगा, जब लोग उसकी आशा भी नहीं कर रहे होंगे: "जैसे नूह के दिन थे, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा। क्योंकि जैसे जल-प्रलय से पहिले के दिनों में, जिस दिन तक कि नूह जहाज पर न चढ़ा, उस दिन तक लोग खाते-पीते थे, और उन में ब्याह शादी होती थी। और जब तक जल-प्रलय आकर उन सब को बहा न ले गया, तब तक उन को कुछ भी मालूम न पड़ा; वैसे ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा" (मत्ती 24:37-39)।

   प्रभु यीशु ने मछली के पेट में काटे गए योना के तीन दिनों के उदाहरण के द्वारा कब्र में बिताए जाने वाले अपने तीन दिनों को समझाया "यूनुस तीन रात दिन जल-जन्‍तु के पेट में रहा, वैसे ही मनुष्य का पुत्र तीन रात दिन पृथ्वी के भीतर रहेगा" (मत्ती 12:40)। प्रेरित पतरस ने अपनी पत्री में नूह और जलप्रलय की घटना के द्वारा भविष्य में प्रभु यीशु के पुनःआगमन के विषय में सचेत किया (2 पतरस 2:4-9)।

   परमेश्वर ने हमें अपना वचन दिया है, जो सत्य है, यथार्थ है और प्रमाणित है; ना कि कालपनिक कहानियों का संकलन है। अनेक प्रयासों के बावजूद आज तक बाइबल की कोई एक बात भी गलत प्रमाणित नहीं हो पाई है। परमेश्वर का यह अटल वचन हमें चिताता है कि प्रभु यीशु का पुनःआगमन होगा और वह अपने अनुयायियों को अनन्त काल तक अपने साथ सुख और शान्ति में रहने के लिए ले जाएगा तथा जगत न्याय में जाएगा। प्रभु यीशु ने जो चिन्ह उसके पुनःआगमन के समय के पूरा होने के सम्बंध में दिए हैं (मत्ती 24), वे आज के इस समय में हमारी आंखों के सामने पूरे हो रहे हैं; क्या आप उसके पुनःआगमन और अपने न्याय के लिए तैयार हैं? - सिंडी हैस कैस्पर

यदि हम प्रभु यीशु के पुनःआगमन की प्रतीक्षा में हैं 
तो हमारे पास आशावान रहने का उचित और भला कारण है।

आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था। - यूहन्ना 1:1

बाइबल पाठ: मत्ती 24:32-44
Matthew 24:32 अंजीर के पेड़ से यह दृष्‍टान्‍त सीखो: जब उस की डाली को मल हो जाती और पत्ते निकलने लगते हैं, तो तुम जान लेते हो, कि ग्रीष्म काल निकट है। 
Matthew 24:33 इसी रीति से जब तुम इन सब बातों को देखो, तो जान लो, कि वह निकट है, वरन द्वार ही पर है।
Matthew 24:34 मैं तुम से सच कहता हूं, कि जब तक ये सब बातें पूरी न हो लें, तब तक यह पीढ़ी जाती न रहेगी। 
Matthew 24:35 आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी। 
Matthew 24:36 उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत, और न पुत्र, परन्तु केवल पिता। 
Matthew 24:37 जैसे नूह के दिन थे, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा। 
Matthew 24:38 क्योंकि जैसे जल-प्रलय से पहिले के दिनों में, जिस दिन तक कि नूह जहाज पर न चढ़ा, उस दिन तक लोग खाते-पीते थे, और उन में ब्याह शादी होती थी। 
Matthew 24:39 और जब तक जल-प्रलय आकर उन सब को बहा न ले गया, तब तक उन को कुछ भी मालूम न पड़ा; वैसे ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा। 
Matthew 24:40 उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा। 
Matthew 24:41 दो स्‍त्रियां चक्की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी, और दूसरी छोड़ दी जाएगी। 
Matthew 24:42 इसलिये जागते रहो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारा प्रभु किस दिन आएगा। 
Matthew 24:43 परन्तु यह जान लो कि यदि घर का स्‍वामी जानता होता कि चोर किस पहर आएगा, तो जागता रहता; और अपने घर में सेंध लगने न देता। 
Matthew 24:44 इसलिये तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 इतिहास 10-12
  • यूहन्ना 6:45-71


गुरुवार, 19 मई 2016

निराशा


   मैं और मेरी बहिन, ताईवान में अपनी छुट्टियाँ मनाने जाने की उत्सुक्ता से प्रतीक्षा कर रहे थे। हमने अपने वायुयान के टिकिट खरीद लिए थे और होटल में कमरे भी आरक्षित कर लिए थे। लेकिन उस यात्रा के दो सप्ताह पहले, घर में आई एक आपात स्थिति के कारण मेरी बहिन को घर पर ही रुक जाना पड़ा। हमें बहुत निराशा हुई कि हमारी योजना तथा कार्यक्रम बाधित हो गए थे और हम अपेक्षित नहीं कर पा रहे थे।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में हम प्रभु यीशु के जीवन काल की एक घटना में देखते हैं कि प्रभु यीशु अपने चेलों के साथ एक आवश्यक उद्देश्य के अन्तर्गत जा रहे थे, परन्तु उनकी यह यात्रा बाधित हुई (मरकुस 5:21-42)। अराधनालय के मुख्या, याइर की बेटी बहुत बीमार थी और वह प्रभु यीशु के पास अपनी बेटी कि चंगाई के लिए याचना करने आया था। समय कीमती था, देर नहीं करी जा सकती थी इसलिए प्रभु यीशु तुरंत अपने चेलों के साथ याइर के घर की ओर चल पड़े। एक बड़ी भीड़ उनके साथ चल रही थी, उनपर गिरी पड़ती थी। अचानक ही प्रभु यीशु रुक गए और उन्होंने प्रश्न किया, "...मेरा वस्‍त्र किस ने छूआ" (मरकुस 5:30)?

   चेले यह प्रश्न सुनकर खिन्न हुए और बोले "...तू देखता है, कि भीड़ तुझ पर गिरी पड़ती है, और तू कहता है; कि किस ने मुझे छुआ" (मरकुस 5:31)? लेकिन प्रभु यीशु के लिए उद्देश्य में आई यह बाधा एक अन्य महिला को चंगा करने और अपनी सामर्थ को प्रगट करने का अवसर था। उस भीड़ में एक स्त्री भी थी जिसे 12 वर्ष से लहु बहने की बीमारी थी, और सभी प्रयास तथा इलाज करवा लेने के बावजूद उसका रोग गया नहीं था। यहूदी मान्यताओं के अनुसार इस बहते लहु के कारण वह अपवित्र थी और सामाजिक तथा धार्मिक संगति तथा कार्यों में सम्मिलित होने के अयोग्य थी (लैव्यवस्था 15:25-27)। प्रभु यीशु पर विश्वास करके इस स्त्री ने अपने मन में ठाना कि यदि वह उसका वस्त्र भर छू लेगी तो चंगी हो जाएगी, और इसीलिए उसने भीड़ में होकर चुपके से प्रभु यीशु को छू लिया और उसे अपने विश्वास के अनुसार तुरंत चंगाई मिल भी गई; किंतु प्रभु यीशु ने इस बात को तुरंत पहचान लिया और रुक कर प्रश्न किया, उस स्त्री से उसके विश्वास का अंगीकार करवाया।

   उस स्त्री को मिली यह चंगाई तथा संबंधित वार्तालाप में बीता समय याइर की बेटी के लिए भारी पड़ गया - उसका देहांत हो गया। सबको लगा कि अब कुछ नहीं हो सकता है, अब बहुत देर हो गई है। लेकिन याइर के उद्देश्य में आई उस स्त्री की चंगाई की बाधा, याइर तथा अन्य लोगों के लिए प्रभु यीशु को और बेहतर जानने का अवसर बन गई। प्रभु यीशु ने याइर को आश्वस्त किया, उसके घर जाकर उसकी बेटी को पुनः जीवित करके माता-पिता को सौंप दिया।

   सभी बाधाएं अन्ततः प्रभु यीशु की अद्वितीय सामर्थ को प्रगट करने और परमेश्वर की महिमा होने का कारण बन गईं। वह जो हमारे लिए निराशा का कारण है, यदि प्रभु परमेश्वर के हाथों में समर्पित हो, तो वही हमारे लिए आशीष और परमेश्वर की महिमा का कारण हो जाता है। - पो फैंग चिया


अपने सामने आने वाली हर बाधा में प्रभु परमेश्वर के उद्देश्यों को ढूंढ़ें।

और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं। - रोमियों 8:28

बाइबल पाठ: मरकुस 5:21-42
Mark 5:21 जब यीशु फिर नाव से पार गया, तो एक बड़ी भीड़ उसके पास इकट्ठी हो गई; और वह झील के किनारे था। 
Mark 5:22 और याईर नाम आराधनालय के सरदारों में से एक आया, और उसे देखकर, उसके पांवों पर गिरा। 
Mark 5:23 और उसने यह कहकर बहुत बिनती की, कि मेरी छोटी बेटी मरने पर है: तू आकर उस पर हाथ रख, कि वह चंगी हो कर जीवित रहे। 
Mark 5:24 तब वह उसके साथ चला; और बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली, यहां तक कि लोग उस पर गिरे पड़ते थे।
Mark 5:25 और एक स्त्री, जिस को बारह वर्ष से लोहू बहने का रोग था। 
Mark 5:26 और जिसने बहुत वैद्यों से बड़ा दुख उठाया और अपना सब माल व्यय करने पर भी कुछ लाभ न उठाया था, परन्तु और भी रोगी हो गई थी। 
Mark 5:27 यीशु की चर्चा सुनकर, भीड़ में उसके पीछे से आई, और उसके वस्‍त्र को छू लिया। 
Mark 5:28 क्योंकि वह कहती थी, यदि मैं उसके वस्‍त्र ही को छू लूंगी, तो चंगी हो जाऊंगी। 
Mark 5:29 और तुरन्त उसका लोहू बहना बन्‍द हो गया; और उसने अपनी देह में जान लिया, कि मैं उस बीमारी से अच्छी हो गई। 
Mark 5:30 यीशु ने तुरन्त अपने में जान लिया, कि मुझ में से सामर्थ निकली है, और भीड़ में पीछे फिरकर पूछा; मेरा वस्‍त्र किस ने छूआ? 
Mark 5:31 उसके चेलों ने उस से कहा; तू देखता है, कि भीड़ तुझ पर गिरी पड़ती है, और तू कहता है; कि किस ने मुझे छुआ? 
Mark 5:32 तब उसने उसे देखने के लिये जिसने यह काम किया था, चारों ओर दृष्टि की। 
Mark 5:33 तब वह स्त्री यह जानकर, कि मेरी कैसी भलाई हुई है, डरती और कांपती हुई आई, और उसके पांवों पर गिरकर, उस से सब हाल सच सच कह दिया। 
Mark 5:34 उसने उस से कहा; पुत्री तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है: कुशल से जा, और अपनी इस बीमारी से बची रह।
Mark 5:35 वह यह कह ही रहा था, कि आराधनालय के सरदार के घर से लोगों ने आकर कहा, कि तेरी बेटी तो मर गई; अब गुरू को क्यों दुख देता है? 
Mark 5:36 जो बात वे कह रहे थे, उसको यीशु ने अनसुनी कर के, आराधनालय के सरदार से कहा; मत डर; केवल विश्वास रख। 
Mark 5:37 और उसने पतरस और याकूब और याकूब के भाई यूहन्ना को छोड़, और किसी को अपने साथ आने न दिया। 
Mark 5:38 और अराधनालय के सरदार के घर में पहुंचकर, उसने लोगों को बहुत रोते और चिल्लाते देखा। 
Mark 5:39 तब उसने भीतर जा कर उस से कहा, तुम क्यों हल्ला मचाते और रोते हो? लड़की मरी नहीं, परन्तु सो रही है। 
Mark 5:40 वे उस की हंसी करने लगे, परन्तु उसने सब को निकाल कर लड़की के माता-पिता और अपने साथियों को ले कर, भीतर जहां लड़की पड़ी थी, गया। 
Mark 5:41 और लड़की का हाथ पकड़कर उस से कहा, ‘तलीता कूमी’; जिस का अर्थ यह है कि ‘हे लड़की, मैं तुझ से कहता हूं, उठ’। 
Mark 5:42 और लड़की तुरन्त उठ कर चलने फिरने लगी; क्योंकि वह बारह वर्ष की थी। और इस पर लोग बहुत चकित हो गए।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 इतिहास 7-9
  • यूहन्ना 6:22-44