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शनिवार, 13 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 13

       

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा का प्रमाण - धार्मिकता के लिए कायल करना (यूहन्ना 16:10).

पिछले लेखों में हमने देखा है कि मसीही सेवकाई में, परमेश्वर पवित्र आत्मा अपने कार्य और सामर्थ्य को प्रभु यीशु के शिष्यों, अर्थात मसीही विश्वासियों में होकर करता है, और उनमें होकर संसार के लोगों के समक्ष मसीही जीवन के उदाहरण तथा वचन की शिक्षाओं को प्रत्यक्ष करता है। इस प्रकार से परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी यानि कि प्रभु यीशु के शिष्य बनने वालों के जीवनों, मनोदशा, और विचारधारा में आए परिवर्तन का प्रत्यक्ष एवं व्यावहारिक प्रमाण प्रदान करता है। साथ ही यह प्रत्यक्ष एवं व्यावहारिक प्रमाण औरों को भी प्रोत्साहित करता है कि जैसा औरों के जीवन में हुआ है, वैसे ही मेरे भी जीवन में भी इसी प्रकार का परिवर्तन और परमेश्वर के लिए उपयोगिता संभव है। यूहन्ना 16:8 में पवित्र आत्मा ने तीन बातें लिखवाई हैं, जिनके विषय वह प्रभु यीशु के शिष्यों में होकर संसार को दोषी ठहराता है। ये तीन बातें हैं - पाप, धार्मिकता, और न्याय। और फिर पद 9, 10, और 11 में इन तीनों के विषय टिप्पणी दी है। इनमें से पहली बात, पाप के विषय कायल करना को हम यूहन्ना 16:9 से पिछले लेख में देख चुके हैं। आज हम दूसरी बात, धार्मिकता के बारे में कायल करने के बारे में हम यूहन्ना 16:10 से कुछ शिक्षाएं लेंगे।

मूल यूनानी भाषा के लेख में जिस शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसे यहाँधार्मिकताअनुवाद किया गया है, उसका अर्थ होता है चरित्र एवं व्यवहार में दोष रहित होना। अर्थात, यहाँ पर धार्मिकता का अर्थ धार्मिक बातों, प्रथाओं, और रीति-रिवाजों का निर्वाह तथा धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्ति के आधार पर व्यक्ति काधर्मीसमझा जाना नहीं है। यह एक बहुत आम बात है, जिससे सभी भली-भांति अवगत हैं, कि बाहरी रीति से सब कुछ करने के बावजूद, सामान्यतः व्यक्ति अंदर से और व्यवहार से फिर भी पापमय लालसाएँ और गुप्त में पापमय व्यवहार रखते हैं। उनकी यह बाहरीधार्मिकताएक दिखावा है, उनके मन अभी भी पाप के विचार और व्यवहार के दोषी हैं। बाइबल के अनुसार इसीलिए मसीही विश्वास की शिक्षा धर्म परिवर्तन की नहीं, बल्कि मन परिवर्तन करने की है। यह मन परिवर्तन मनुष्य अपने किसी धर्म के कामों से नहीं करने पाता है, नहीं तो संसार भर में इतने धर्मों और धार्मिक अनुष्ठानों, और कार्यों के द्वारा, अब तक संसार से पाप की समस्या कब की मिट चुकी होती। यह मन परिवर्तन केवल प्रभु यीशु मसीह में लाए गए विश्वास और पापों के पश्चाताप के द्वारा ही संभव है।

बाइबल यह भी सिखाती है कि मन की इस पवित्रता के बिना, जब कोई भी प्रभु को देख भी नहीं सकता हैसब से मेल मिलाप रखने, और उस पवित्रता के खोजी हो जिस के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14), तो फिर उसके साथ संगति और निवास कैसे करेगा? किन्तु प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास लाने के द्वारा, प्रभु यीशु मसीह के द्वारा समस्त मानव जाति के उद्धार के लिए क्रूस पर बहाए गए लहू के द्वारा मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी ठहरता है, उसका मेल-मिलाप परमेश्वर के साथ हो जाता है, और वह पाप के दण्ड से बच जाता है :सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें” (रोमियों 5:1); “सो जब कि हम, अब उसके लहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा क्रोध से क्यों न बचेंगे? क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे?” (रोमियों 5:9-10) 

प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास लाना, और ईसाई धर्म का निर्वाह करना, दो बिलकुल भिन्न बातें हैं; और ईसाई धर्म का निर्वाह व्यक्ति को परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी नहीं बनाता है। व्यक्ति किसी भी धर्म को माने, किसी भी परिवार में जन्म ले, सभी के लिए परमेश्वर की आज्ञा पापों से पश्चाताप करने की हैइसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में आनाकानी कर के, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है। क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है, जिस में वह उस मनुष्य के द्वारा धर्म से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रमाणित कर दी है” (प्रेरितों 17:30-31)। प्रेरितों 2 अध्याय में, पतरस का पहला प्रचार यरूशलेम में धार्मिक रीतियों और अनुष्ठानों को निभाने आए हुएभक्त यहूदियोंके मध्य किया गया था (प्रेरितों 2:5)। पतरस द्वारा उनभक्त यहूदियोंको किए गए प्रचार को सुनकरतब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें? पतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे” (प्रेरितों के काम 2:37-38)। जैसे तब उनभक्त यहूदियोंके लिए धार्मिकता और व्यवस्था के निर्वाह के बावजूद पश्चाताप और समर्पण अनिवार्य था, उसी प्रकार आज ईसाई धर्म का निर्वाह करने वालों के लिए भी अनिवार्य है। 

प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास लाने के द्वारा धर्मी ठहरने, परमेश्वर से मेल-मिलाप हो जाने, पाप के दण्ड से बच जाने की इस पूरी प्रक्रिया को समझने; तथा परमेश्वर की दृष्टि में पाप क्या है, और पाप और उसके निवारण तथा समाधान किस प्रकार संभव है, आदि के विषयों पर बाइबल में दी गई शिक्षाओं पर एक विस्तृत चर्चा पहले प्रस्तुत की जा चुकी है। इस विस्तृत चर्चा की शृंखला का आरंभपाप और उद्धारपर लेख के साथ हुआ था; और जिन पाठकों ने इसे नहीं देखा है, वे इस लेख के लिंक से उसे देख सकते हैं, अध्ययन कर सकते हैं।

प्रभु यीशु मसीह द्वारा सभी मनुष्यों के पापों के लिए कलवरी के क्रूस पर दिए गए बलिदान को स्वीकार करने, अपने पापों से पश्चाताप करने, और अपने पापों के लिए प्रभु से क्षमा मांगने से ही व्यक्ति परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी ठहरता है; क्योंकि वह अपने इस विश्वास में आने के द्वारा प्रभु यीशु मसीह कोपहनलेता हैऔर तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है उन्होंने मसीह को पहिन लिया है” (गलतियों 3:27)। इसलिए अब मसीह यीशु में उस व्यक्ति के सभी पाप ढाँप दिए गए हैं, और मसीह यीशु में होकर वह धर्मी है। प्रभु यीशु ने यूहन्ना 16:10 में कहा कि वह अब सभी मनुष्यों के उद्धार के लिए अपना कार्य पूरा करके पिता के पास जाता है। जैसे प्रभु यीशु मसीह अपनी धर्मी दशा में परमेश्वर के पास जा सकता था, उसी प्रकार, जो विश्वास में आने के द्वारा प्रभु यीशु मसीह में धर्मी ठहराए गए हैं, वे भी परमेश्वर के पास जा सकते हैं। किन्तु यह आदर संसार के उन लोगों को उपलब्ध नहीं है जो अभी भी अपनीधर्म-कर्म-रस्मके निर्वाह की धार्मिकता के आधार पर परमेश्वर के पास आना चाहते हैं। जैसे ऊपर कहा गया, प्रभु यीशु मसीह से मिली इस पवित्रता के बिना तो वे परमेश्वर को देख भी नहीं सकते हैं, उसके पास जाएंगे कैसे?

सच्चे और वास्तविक मसीही विश्वासी के जीवन जीने वालों में, और संसार के मानकों के अनुसारधार्मिकताका जीवन जीने वालों में परमेश्वर पवित्र आत्माधार्मिकताकी यह तुलना प्रस्तुत करता है। मसीही विश्वास की धार्मिकता की तुलना में, सांसारिक धार्मिकता के विषय सांसारिक लोगों को दोषी ठहराता है। यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो आपकीधार्मिकताका आधार क्या है - आपका पापों से पश्चाताप, मसीह यीशु में लाया गया विश्वास, मसीह यीशु को पूर्णतः समर्पित और उसके वचन की आज्ञाकारिता का जीवन; या, किसी परिवार विशेष में जन्म तथाधर्म-कर्म-रस्मके निर्वाह की धार्मिकता? आपके मसीही विश्वास की वास्तविकता, और आप में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति की पुष्टि आपकी मसीही सेवकाई के द्वारा होती है। यदि आपकी धार्मिकता, मसीही विश्वास की धार्मिकता है, तो फिर आप में होकर पवित्र आत्मा संसार के लोगों को उनकी सांसारिक धार्मिकता के विषय कायल करेगा, उन्हें उसकी अपूर्णता का एहसास करवाएगा।  

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको धर्मी बनाए; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को तथा अपनी धार्मिकता को औरों पर प्रकट करे, तथा आप में होकर पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • विलापगीत 1-2 
  • इब्रानियों 10:1-18  

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 12

       

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा का प्रमाण - पाप के लिए कायल करना (यूहन्ना 16:9).

पिछले लेख में हमने देखा था कि मसीही की सेवकाई में, परमेश्वर पवित्र आत्मा अपने कार्य और सामर्थ्य को प्रभु यीशु के शिष्यों, अर्थात मसीही विश्वासियों में होकर करता है, और उनमें होकर संसार के लोगों के समक्ष उदाहरण तथा शिक्षाओं को रखता है। न केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा इस प्रकार से अपना कार्य करना मसीही विश्वासी यानि कि प्रभु यीशु के शिष्य बनने वालों के जीवनों, मनोदशा, और विचारधारा में आए परिवर्तन का प्रत्यक्ष एवं व्यावहारिक प्रमाण होता है, वरन साथ ही यह औरों को भी प्रोत्साहित करता है कि जैसा एक मनुष्य के जीवन में हुआ है, वैसे ही मेरे भी तथा औरों के जीवनों में भी इसी प्रकार का परिवर्तन और परमेश्वर के लिए उपयोगिता संभव है। यूहन्ना 16:8 में पवित्र आत्मा ने तीन बातें लिखवाई हैं, जिनके विषय वह प्रभु यीशु के शिष्यों में होकर संसार को दोषी ठहराता है। ये तीन बातें हैं - पाप, धार्मिकता, और न्याय। और फिर पद 9, 10, और 11 में इन तीनों के विषय टिप्पणी दी है। 

यदि हम थोड़ा सा विचार करें, तो मानव जाति और संसार की सभी समस्याओं की जड़, संसार के लोगों, विशेषकर पदाधिकारियों द्वारा, इन्हीं तीन बातों का अनुचित एवं अनुपयुक्त निर्वाह अथवा अवहेलना करना है। सारे संसार के विभिन्न लोगों और धर्मों के निर्वाह, रीति-रिवाजों की पूर्ति, अनुष्ठानों के किए जाने, आदि के बावजूद, लोगों में से इन तीनों समस्याओं को मिटा पाना संभव नहीं होने पाया है, वरन इनके विषय स्थिति सुधारने की बजाए और बिगड़ती ही जा रही है। यही अपने आप में एक जग-विदित प्रमाण है कि धर्म-कर्म-रस्म का निर्वाह इस समस्या का समाधान नहीं है। इस बढ़ती हुई समस्या का कारण, इस पद में प्रभु के कथन में निहित है - क्योंकि संसार के लोग अपने आप को इन तीनों के विषय दोषी नहीं समझते अथवा स्वीकारते हैं। और परमेश्वर पवित्र आत्मा, प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों के परिवर्तित जीवन और व्यवहार में होकर संसार के लोगों को इन बातों के विषय दोषी ठहराता है - प्रभु के वास्तविक और सच्चे शिष्यों के जीवनों से तुलना के द्वारा संसार के लोगों को उनकी वास्तविक दशा दिखाता है। आज हम यूहन्ना 16:9 से इन तीनों में से पहली बात, पाप के विषय दोषी ठहराए जाने के बारे में थोड़ा सा देखेंगे। 

यूहन्ना 16:9 पाप के विषय में इसलिये कि वे मुझ पर विश्वास नहीं करते। प्रभु यीशु ने कहा कि पवित्र आत्मा सबसे पहले संसार के लोगों को उनके पाप के विषय दोषी ठहराएगा - क्योंकि संसार के लोग प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास नहीं करते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में पाप क्या है, और बाइबल में पाप और उसके निवारण तथा समाधान के विषय दी गई शिक्षाओं पर एक विस्तृत चर्चा पहले प्रस्तुत की जा चुकी है; इस विस्तृत चर्चा की शृंखला का आरंभ इस लेख के साथ हुआ था : http://rozkiroti.blogspot.com/2021/08/Bible-Word-Sin-1-Fellowship-Heart-Problem-Root.html ; और जिन पाठकों ने इसे नहीं देखा है, वे इस लेख के लिंक से उसे देख सकते हैं, अध्ययन कर सकते हैं। संक्षेप में, परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार, पाप, मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में किया गया परमेश्वर की आज्ञाओं और निर्देशों का उल्लंघन अथवा अवहेलना है (1 यूहन्ना 3:4)। हमारे आदि माता-पिता, आदम और हव्वा के द्वारा किए गए प्रथम पाप के साथ ही पाप ने सृष्टि में प्रवेश किया, और आदम की संतानों में फैल गया (रोमियों 5:12-14)। मनुष्यों में आनुवंशिक रीति से विद्यमान पाप करने की इस प्रवृत्ति का निवारण और समाधान, उस व्यक्ति द्वारा किए गए अपने पापों के अंगीकार तथा उन से पश्चाताप, प्रभु यीशु मसीह द्वारा मिली पापों की क्षमा और उद्धार, तथा उसे स्वेच्छा से अपना जीवन समर्पण करने वाले व्यक्ति में प्रभु के द्वारा किया गया मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आधारभूत परिवर्तन, के द्वारा होता है। 

जब इस प्रकार पापों से पश्चाताप और प्रभु यीशु को किए गए जीवन समर्पण के द्वारा प्राप्त हुए परिवर्तित एवं आशीषित जीवन की गवाही उद्धार पाने वाला व्यक्ति संसार के सामने रखता है, और अपने प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन में उस परिवर्तन को जी कर संसार के समक्ष प्रत्यक्ष दिखाता है, तो स्वतः ही वह संसार के लोगों के सामने, उनके तथा उस उद्धार पाए हुए व्यक्ति के जीवन और व्यवहार में एक तुलना ले आता है, संसार के लोगों को उनके जीवन और व्यवहार के लिए स्वतः ही दोषी ठहरा देता है। जिन्हें अपने पापों के दोष का बोध होता है, फिर वे अपनी समस्तधार्मिकताके प्रयासों के बावजूद अपने में विद्यमान पापों की समस्या का निवारण और समाधान ढूँढते हैं, और वह समाधान प्रभु यीशु मसीह है:तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें? पतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे” (प्रेरितों के काम 2:37-38)। इसीलिए शैतान और उसके दूत, लोगों तक सुसमाचार पहुँचने नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि उस सुसमाचार में जीवन बदलने की सामर्थ्य है; उन्होंने लोगों के मनों को अंधा कर रखा है कि सुसमाचार की जीवन दायक ज्योति उन पर न चमकने पाएऔर उन अविश्वासियों के लिये, जिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्‍धी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके” (2 कुरिन्थियों 4:4)। प्रभु यीशु मसीह ने धर्म के अगुवों और पवित्र शास्त्र के विद्वानों से कहातुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है। फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते” (यूहन्ना 5:39-40)

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, अर्थात किसी धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह के अंतर्गत नहीं, वरन आप ने अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु यीशु से क्षमा याचना करके, और स्वेच्छा तथा सच्चे मन से अपना जीवन प्रभु यीशु को समर्पित किया है, तो क्या आपके जीवन में प्रभु की ओर, उसके वचन और आज्ञाकारिता की ओर परिवर्तन आया है? क्या परमेश्वर का वचन और उसकी आज्ञाकारिता आपके जीवन में प्राथमिक स्थान पाते हैं (यूहन्ना 14:15, 21, 23)? क्या पवित्र आत्मा के फलों (गलातीयों 5:22-23) से आपका जीवन सुसज्जित है? आपका परिवर्तित जीवन, परमेश्वर के वचन बाइबल के नियमित एवं गंभीर अध्ययन के प्रति आपकी लालसा, जीवन में पवित्र आत्मा के फलों की उपस्थिति, और लगन तथा गंभीरता से प्रेरितों 2:42 का पालन करते रहने की लालसा ही प्रमाणित करेगी कि आप में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति है। और यदि आपका जीवन पवित्र आत्मा की अगुवाई और आज्ञाकारिता में जिया जाएगा (गलातीयों 5:18, 25), तो फिर आपके जीवन के द्वारा संसार के लोग, यूहन्ना 16:9 के अनुसार, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास न करने के कारण दोषी भी ठहराए जाएंगे, कायल किए जाएंगे, उनमें उनके पापों के प्रति संवेदनशीलता तथा बोध उत्पन्न होगा, और फिर वे भी आपके परिवर्तित जीवन से आकर्षित होकर प्रभु की ओर आकर्षित होंगे, आप से उद्धार का मार्ग जानने के लिए लालायित होंगे। ध्यान रखिए, परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों में, आप में, होकर ही कार्य करता है। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।   

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 51-52 
  • इब्रानियों

गुरुवार, 11 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 11


मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा का प्रमाण - यूहन्ना 16:8.

हम देख चुके हैं कि मसीही सेवकाई के निर्वाह के लिए मसीही विश्वासी के जीवन में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति कितनी आवश्यक है, सहायक के रूप में पवित्र आत्मा की भूमिका मसीही सेवकाई के लिए अनिवार्य है, और बिना उसमें परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति के कोई यीशु को प्रभु भी नहीं कह सकता है (1 कुरिन्थियों 12:3)। इसीलिए स्वयं प्रभु परमेश्वर अपने प्रत्येक सच्चे विश्वासी, अपने प्रत्येक वास्तविक शिष्य को स्वतः ही, उसके उद्धार पाने के साथ ही तुरंत ही पवित्र आत्मा भी प्रदान कर देता है। प्रभु के किसी भी वास्तविक शिष्य को पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए न तो किसी मनुष्य की किसी सहायता की आवश्यकता है, और न ही वह मनुष्यों के द्वारा बताई अथवा बनाई गई किसी विधि या अनुष्ठान आदि के द्वारा पवित्र आत्मा को प्राप्त कर सकता है। 

किन्तु साथ ही प्रत्येक जन, विश्वासी अथवा अविश्वासी, को यह भी समझ लेना चाहिए कि पवित्र आत्मा परमेश्वर है। वह हमारा सहायक अवश्य है, किन्तु न हमारा सेवक है, न हमारे हाथों की कठपुतली है जिसके साथ और जिसके नाम में मनुष्य अपनी इच्छा और समझ के अनुसार कुछ भी कहते और करते रहें। परमेश्वर पवित्र आत्मा को भी हमें वही आदर और श्रद्धा प्रदान करनी है जो पिता परमेश्वर को, प्रभु यीशु को, और उनके नाम के प्रयोग को देते हैं। हमें पवित्र आत्मा के नाम से अपनी समझ और इच्छा के अनुसार कुछ भी, कैसा भी बर्ताव, बात, और व्यवहार करने की स्वतंत्रता नहीं दी गई है। जैसा व्यवहार परमेश्वर पिता तथा परमेश्वर पुत्र के प्रति आवश्यक एवं उचित है, बिलकुल वैसा ही परमेश्वर पवित्र आत्मा के लिए भी है। इसलिए वचन में कही गई और पहले से लिखवा दी गई बातों के अतिरिक्त परमेश्वर या पवित्र आत्मा के नाम से अन्य जो कुछ भी किया, बताया, और सिखाया जाता है, वह परमेश्वर की ओर से नहीं है; वह सब मनुष्य द्वारा वचन में जोड़ना है - जो परमेश्वर द्वारा वर्जित किया गया है। वचन के बाहर की बातों को परमेश्वर पवित्र आत्मा पर थोप कर उनके नाम में विचित्र हाव-भाव एवं अनुचित व्यवहार करना और सिखाना, लोगों को ऐसी शिक्षाएं देना जिनका वचन में कोई समर्थन, उल्लेख, या उदाहरण नहीं है, वह सब परमेश्वर के वचन और बातों में मिलावट करना है, अस्वीकार्य है, दण्डनीय है।

व्यक्तिगत जीवन में पवित्र आत्मा की भूमिका से संबंधित बातों को अपने शिष्यों को बताने के बाद, प्रभु यीशु ने उनकी सुसमाचार प्रचार और मसीही सेवकाई से संबंधित बातों में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका को बताना आरंभ किया। इस सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका से संबंधित जो पहली शिक्षा प्रभु ने शिष्यों को दी, वह है, “और वह आकर संसार को पाप और धामिर्कता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा” (यूहन्ना 16:8) प्रभु के इस कथन को समझने के लिए प्रभु द्वारा यूहन्ना 14 अध्याय में प्रभु द्वारा कही गई इस बात को ध्यान रखना अति आवश्यक है, कि परमेश्वर पवित्र आत्मा ने मसीही विश्वासियों में होकर ही अपनी सामर्थ्य को प्रकट करना था, उनमें होकर ही संसार के समक्ष कार्य करना था। क्योंकि प्रभु के इस कथन में यह निहित है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा, मसीही विश्वासियों में होकर इस कार्य को करेगा; इसलिए यह स्वाभाविक निष्कर्ष है कि जो भी मसीही संसार से यूहन्ना 16:8 की बातों के बारे में बात करे, परमेश्वर के नाम से लोगों के सामने इन बातों का प्रचार करे, तो उसका अपना जीवन भी पाप, धार्मिकता, और न्याय के विषय में परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुरूप हो। अन्यथा उस मसीही का प्रचार और गवाही झूठी ठहरेगी, अप्रभावी होगी, उसके अपने तथा साथ ही परमेश्वर के भी उपहास और निन्दा का कारण ठहरेगी। यह बात एक बार फिर मसीही विश्वासी के जीवन में पहले पवित्र आत्मा की भूमिका और कार्य (यूहन्ना 14) द्वारा उचित सुधार और सही व्यवहार कर लेने, और तब सार्वजनिक सेवकाई (यूहन्ना 16) का निर्वाह करने की अनिवार्यता पर बल देता है, उसके महत्व को प्रमुख करता है।

आज मसीही विश्वास के प्रति लोगों के अविश्वास, लोगों की आलोचना, और संसार द्वारा मसीहियों से दुर्व्यवहार का एक बहुत बड़ा कारण मसीही या ईसाई कहलाने वाले लोगों के जीवनों में व्याप्त यही दोगलापन - उनके प्रचार और व्यक्तिगत व्यवहार में विद्यमान एवं सर्व-विदित भिन्नता है। वे संसार से जिस बात, बर्ताव, और व्यवहार का निर्वाह करने का प्रचार करते हैं, वह उनके अपने जीवनों में लोगों को दिखाई नहीं देता है। पवित्र आत्मा की जिस जीवन और मन बदलने वाली सामर्थ्य के बारे में लोगों को बताकर उन्हें प्रभु यीशु की ओर आने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं, व्यक्ति के विचार और व्यवहार बदलने वाली वह सामर्थ्य उनके स्वयं के जीवन में लोगों को दिखाई नहीं देती है। आज संसार के लोगों को मसीही या विश्वासी कहलाए जाने वाले बहुत से लोगों में पवित्र आत्मा के नाम से बहुत शोर-शराबा, उछल-कूद, विचित्र व्यवहार और शारीरिक क्रियाएं तथा हाव-भाव, शारीरिक चंगाइयों के दावे आदि तो दिखते हैं; किन्तु सांसारिकता और संसार की बातों तथा वस्तुओं के मोह को त्याग कर प्रभु की आज्ञाकारिता में जिया जाने वाला विनम्र, प्रेमपूर्ण, आत्मा के फलों से भरा व्यावहारिक जीवन दिखाई नहीं देता है। वरन, विडंबना तो यह है कि लोगों ने पवित्र आत्मा के नाम और काम को व्यक्तिगत कमाई का साधन बना लिया है; पवित्र आत्मा के नाम पर सांसारिक धन-संपत्ति, ज़मीन-जायदाद, विलासिता की बातों से भरे महल बना लिए हैं। फिर भी लोग ऐसे भ्रामक प्रचारकों के पीछे भागते हैं, उनकी बातों को बिना जाँचे-परखे ऐसे स्वीकार करते हैं, मानों स्वयं परमेश्वर बोल रहा हो। यदि उन ढोंगी प्रचारकों के ढोंग को लोगों के सामने लाने के प्रयास किए जाएं, तो प्रतिक्रिया अपमान और क्रोध होता है यद्यपि उन प्रचारकों के जीवनों और कार्यों में वचन से संगत और उचित कुछ भी देख पाना लगभग असंभव होता है; और उनके प्रचार में वचन की बातों को संदर्भ से बाहर लेकर, तोड़-मरोड़ कर, उनकी अपनी ही धारणाओं के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है। उनकी शिक्षाएं पापों की क्षमा, उद्धार, और आत्मिक उत्थान की बजाए भौतिक लाभ, शारीरिक बातों, सांसारिक उपलब्धियों आदि की प्राप्ति से संबंधित होती हैं; फिर भी लोग अंधे और निर्बुद्धि होकर प्रभु और उसके वचन का नहीं परंतु उन सांसारिक प्रचारकों का और उनकी गलत शिक्षाओं का बड़ी लगन और आदर के साथ अनुसरण करते हैं। 

प्रभु ने कहा कि परमेश्वर पवित्र आत्मा आकर संसार कोनिरुत्तरकरेगा। मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का हिन्दी अनुवादनिरुत्तरकिया गया, मूल भाषा का उसका अर्थ हैडाँट लगाएगा”, याउलाहना देगा; और अँग्रेज़ी में इस शब्द का अनुवाद convict अर्थात दोषी ठहराना किया गया है, जो मूल यूनानी भाषा के अर्थ के साथ अधिक मेल रखता है। जिन बातों के विषय वह ऐसा करेगा, उनके बारे में आगे पद 8 से 11 में और विस्तार से लिखा गया है, और उन्हें हम उन पदों के अध्ययन के साथ ही देखेंगे। किन्तु यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा, मसीही विश्वासियों में निवास एवं उनमें होकर कार्य करने के द्वारामसीही विश्वासियों के जीवन, व्यवहार और बर्ताव, उनके जीवन में आए परिवर्तनों के द्वारा संसार के लोगों को उनके जीवन, उनके व्यवहार और बर्ताव, उनके अपरिवर्तित जीवनों के लिए दोषी ठहराएगा। 

यदि आप सच में मसीही विश्वासी हैं, वास्तविकता में प्रभु यीशु मसीह के शिष्य हैं, तो क्या आप में निवास करने वाला पवित्र आत्मा, आपके व्यवहार, बर्ताव, और बदले हुए जीवन के द्वारा, संसार के लोगों को उनके जीवन और व्यवहार के लिए दोषी ठहराता है? क्या आपके जीवन के साथ अपने जीवन की तुलना करने पर वे परमेश्वर की बातों और कार्यों को आपके जीवन में विद्यमान, और अपने जीवन से अनुपस्थित देखने या समझने पाते हैं? क्या आपकी उपस्थिति में लोग छिछोरी बातें और भद्दे मज़ाक करने, सांसारिकता की व्यर्थ बातें करने से हिचकिचाते हैं? या फिर संसार के लोग आप में भी वही बातें, विचार, व्यवहार, और बर्ताव देखते हैं जो उनमें विद्यमान है? क्या आपके मसीही विश्वासी होने के नाते, परमेश्वर पवित्र आत्मा आप में होकर यूहन्ना 16:8 की बात को पूरा करने पाता है? यदि नहीं, तो मसीही सेवकाई में हाथ डालने से पहले, अभी आप को पहले अपने आप में वह आवश्यक परिवर्तन करने और व्यक्तिगत जीवन में पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्रमाणित करने वाले कार्य दिखाने अनिवार्य हैं, जो पवित्र आत्मा को आप में होकर संसार के समक्ष सार्वजनिक मसीही सेवकाई के कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 50 
  • इब्रानियों 8

बुधवार, 10 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 10

     

मसीही जीवन में पवित्र आत्मा की उपस्थिति - यूहन्ना 16:7.

मसीही सेवकाई के लिए मसीही विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका को हमने पिछले लेखों में देखा है, कि वह कैसे प्रभु के शिष्य को उसकी सेवकाई के लिए सिखाता है, तैयार करता है, प्रभु की बातें स्मरण करवाता है, और उसे सुरक्षा प्रदान करता है। शिष्य तब ही संसार का औरसंसार के सरदार’, अर्थात शैतान, उसकी युक्तियों, उसके दूतों का सामना कर सकता है, मसीही सेवकाई में प्रभावी हो सकता है, जब वह स्वयं इस कार्य के लिए तैयार हो गया हो - और उसकी यह तैयारी उसे केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा ही करवा कर देता है। उस शिष्य की अपनी कोई योग्यता, कोई गुण, कोई शिक्षा, कोई प्रशिक्षण, कोई अनुभव, आदि तब तक किसी उपयोगिता का नहीं है, जब तक परमेश्वर पवित्र आत्मा उसके जीवन में कार्य करके उसे अपनी रीति से सक्षम न कर दे; तब ही उस शिष्य के अन्य कोई भी गुण, योग्यता, शिक्षा, प्रशिक्षण, और अनुभव आदि प्रभु के लिए उपयोगी और प्रभावी किए जा सकते हैं - जैसा हम पौलुस के जीवन से देखते हैं। परमेश्वर के वचन की बातों में सर्वोत्तम गुरु, गमलिएल, से वचन की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त करने, और फरीसी होने के लिए प्रशिक्षित किए जाने के बाद भी, वह प्रभु परमेश्वर के लिए उपयोगी नहीं था, वरन प्रभु के कार्य का विरोधी और नाशक था। किन्तु प्रभु यीशु में विश्वास लाने के बाद ही उसका वह सब प्रशिक्षण, अध्ययन, अनुभव, आदि पवित्र आत्मा के द्वारा प्रभु के लिए उपयोगी बनाया जा सका। प्रभु यीशु की वास्तविकता को समझने के बाद वह अपने पहले के सभी ज्ञान, समझ, प्रशिक्षण, अनुभव, कार्य आदि कोकूड़ाकहता है, और उसकी लालसा वचन के मानवीय ज्ञान में नहीं, वरन प्रभु यीशु मसीह की मृत्युंजय की सामर्थ्य को जानने और उसमें बढ़ने की हो जाती है (फिलिप्पियों 3:4-11)। इसी प्रकार से मूसा को भी मिस्र से मिला वहाँ का सर्वोत्तम मानवीय ज्ञान-बुद्धि-सामर्थ्य और योग्यता इस्राएलियों का कुछ भला करने के लिए उसके किसी काम नहीं आए। उसे वह सब छोड़ कर भागना पड़ा। जब वह जंगल में मूक और मूर्ख भेड़ों की देखभाल करते रहने से परमेश्वर के द्वारा प्रशिक्षित कर लिया गया, तब ही परमेश्वर ने उसे अपने लोगों की चरवाही करने के लिए सक्षम करके वापस मिस्र में भेजा, और उसमें होकर अभूतपूर्व कार्य किए, संसार के लोगों के लिए अपने वचन तथा व्यवस्था को दिया।

व्यक्तिगत रीति से तैयार करने के बाद, अब यूहन्ना 16 अध्याय में सार्वजनिक मसीही सेवकाई से संबंधित बातें प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों के सामने रखीं। इन बातों का आरंभ यूहन्ना 16:7 “तौभी मैं तुम से सच कहता हूं, कि मेरा जाना तुम्हारे लिये अच्छा है, क्योंकि यदि मैं न जाऊं, तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा, परन्तु यदि मैं जाऊंगा, तो उसे तुम्हारे पास भेज दूंगासे होता है, जहाँ फिर यूहन्ना 13 अध्याय से आरंभ हुए इस वार्तालाप में चौथी बार प्रभु शिष्यों से कहता है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा उनके पास और उनमें रहने के लिए प्रभु के भेजे जाने के द्वारा ही आएगा; अर्थात प्रभु के शिष्यों के लिए प्रभु परमेश्वर के अतिरिक्त परमेश्वर पवित्र आत्मा को उपलब्ध करवाने का और कोई तरीका नहीं है। पवित्र आत्मा परमेश्वर है, और सार्वभौमिक, सर्वसामर्थी, सर्वज्ञानी, सृजनहार है; वह मनुष्य के वश या अधीनता में नहीं है कि मनुष्य के कहे के अनुसार कार्य और व्यवहार करे। प्रभु ने अपने महान अनुग्रह और प्रेम में होकर अपने शिष्यों की सहायता के लिए उसे अवश्य प्रदान किया है, किन्तु उसे शिष्यों का सेवक या दास नहीं बना दिया है कि वे अपनी ही इच्छा और समझ के अनुसार उससे, और उसके नाम में लोगों से कुछ भी उलटा-सीधा कार्य तथा व्यवहार करें। जिस दिन प्रभु हिसाब लेगा, उस दिन पवित्र आत्मा के नाम से किया जाने वाला यह सब बाइबल के वचनों से बाहर का व्यर्थ का और अनुचित व्यवहार, ऐसा करने और सिखाने वालों के लिए बहुत भारी पड़ेगा (मत्ती 12:36-37), किन्तु तब उनके पास बचने का कोई मार्ग नहीं होगा। उन्हें अपने द्वारा परमेश्वर पवित्र आत्मा के प्रति किए गए अपमानजनक व्यवहार और व्यर्थ बातों के लिए दण्ड भोगना ही होगा।

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, आपने अपने पापों से वास्तविक पश्चाताप करके प्रभु यीशु से उनके लिए सच्चे मन से क्षमा माँगी है, अपना जीवन प्रभु को समर्पित किया है, प्रभु की आज्ञाकारिता में जीवन जीने का निर्णय किया है, तो यह ध्यान रखिए कि आप अपने इस निर्णय के उचित और सही निर्वाह के लिए प्रभु के प्रति व्यक्तिगत रीति से उत्तरदायी हैं। और मसीही विश्वासी होने के नाते आप से भी स्वर्ग में आपके अनन्तकालीन प्रतिफल निर्धारित करने के लिए आपके व्यवहार, कार्य और बातों का सारा हिसाब अवश्य ही लिया जाएगा (1 कुरिन्थियों 3:13-15; 2 कुरिन्थियों 5:10; 1 पतरस 4:17)। उस समय आप अपने अनुचित, वचन की शिक्षाओं से अलग, वचन के उदाहरणों और बातों से भिन्न व्यवहार के लिए किसी अन्य मनुष्य, या मानवीय मत-समुदायों-डिनॉमिनेशंस के नियमों और रीतियों आदि पर बात नहीं टाल सकेंगे। परमेश्वर का वचन बाइबल आपके हाथ में होते हुए भी, और उसे सिखाने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा आपके साथ होते हुए भी, तथा परमेश्वर द्वारा अन्य विभिन्न साधन उपलब्ध करवाए जाने के बावजूद, क्यों आपने मनुष्यों की शिक्षाओं, व्यवहारों, बातों को वचन की शिक्षाओं और उदाहरणों से बढ़कर महत्व दिया - इसका उत्तर आप ही को देना होगा। प्रभु ने आपके लिए सब कुछ करके दिया है, उसके द्वारा दिए गए इन अद्भुत प्रयोजनों का सदुपयोग करना तो आपके हाथों में है। उसने आपके लिए उत्तम भोज सजा कर दिया है, सेंत-मेंत उपलब्ध करवा दिया है; फिर भी यदि आप व्यर्थ और हानिकारक भोजन खाकर हानि उठाएं, तो प्रभु को तो उसके लिए दोषी नहीं ठहरा सकते हैं। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।   

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 48-49 
  • इब्रानियों 7

मंगलवार, 9 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 9

       

मसीही जीवन में पवित्र आत्मा की उपस्थिति - यूहन्ना 15:26; 16:7 

मसीही सेवकाई और मसीही विश्वासी के जीवन में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका की बातों से संबंधित हमारे इस अध्ययन में अभी तक हमने देखा और सीखा है कि किस प्रकार परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रत्येक मसीही विश्वासी के जीवन कार्य करता है जिससे उसे उस सेवकाई के लिए जो परमेश्वर ने उसके लिए निर्धारित की है (इफिसियों 2:10) तैयार करे तथा प्रभावी बनाए। इस संदर्भ में हमने देखा था कि पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी को प्रभु यीशु मसीह की बातों को स्मरण करवाता है, सिखाता है, और उसे वह सुरक्षा तथा सहायता प्रदान करता है जिसकी सहायता से प्रभु का विश्वासी और उपयोगी जनसंसार का सरदार” (यूहन्ना 14:30), अर्थात शैतान का सामना कर सके। 

यूहन्ना रचित सुसमाचार के अध्याय 13 से 17 तक प्रभु यीशु मसीह के पकड़वाए जाने से ठीक पहले, फसह के पर्व का भोज खाते समय, अपने शिष्यों से किया गया अंतिम वार्तालाप है। प्रभु इस वार्तालाप और इसमें दी गई शिक्षाओं के द्वारा उन्हें आते समयों और परिस्थितियों के लिए तैयार कर रहा था। इसी वार्तालाप के दौरान प्रभु अपने शिष्यों से उन्हें आते समय में पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त होने की बात समझाता है, जिसके बारे में 14 और 16 अध्याय में लिखा है। इन अध्यायों का अध्ययन करते समय, शिष्यों द्वारा पवित्र आत्मा प्राप्त करने से संबंधित एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य हमारे सामने आता है - अध्याय 14-16 में, चार बार लिखा गया है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा केवल प्रभु परमेश्वर की ओर से तथा उसके द्वारा ही, और प्रभु के शिष्यों को ही प्रदान किया जाता है (14:16-17, 26; 15:26; 16:7)। प्रभु क्यों शिष्यों से बारंबार यह बात कह रहा था? यह एक सामान्य व्यवहार और समझ की बात है कि यदि कोई शिक्षक अथवा अगुवा किसी एक ही बात को बारंबार दोहराए, बल देकर विभिन्न प्रकार से कहे, तो तात्पर्य यही है कि वह बात महत्वपूर्ण है, ध्यान रखने योग्य है, उसकी उपयोगिता है, और उसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए। आज के अध्ययन के दोनों पदों को देखिए:

  • यूहन्ना 15:26 “परन्तु जब वह सहायक आएगा, जिसे मैं तुम्हारे पास पिता की ओर से भेजूंगा, अर्थात सत्य का आत्मा जो पिता की ओर से निकलता है, तो वह मेरी गवाही देगा
  • यूहन्ना 16:7 “तौभी मैं तुम से सच कहता हूं, कि मेरा जाना तुम्हारे लिये अच्छा है, क्योंकि यदि मैं न जाऊं, तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा, परन्तु यदि मैं जाऊंगा, तो उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा

 

प्रभु ने उस समय के मौखिक वार्तालाप में तो पवित्र आत्मा को भेजने की बात दोहराई ही, साथ ही जब इस सुसमाचार को भावी विश्व-व्यापी मसीही विश्वासियों के लिए लिखा गया, तो उसमें भी लिखवा दिया; अर्थात, यह बात सारे संसार के सभी स्थानों और समयों के उन सभी विश्वासियों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी, जितनी कि तब प्रभु के साथ उपस्थित उन शिष्यों के लिए थी। प्रभु ने संसार के सभी मसीही विश्वासियों से, वे चाहे किसी भी समय या स्थान के क्यों न हों, इस बात को बल देकर कहा है, जिससे कि वे कभी भी भरमाए न जाएं, गलत शिक्षा में न पड़ जाएं, वचन के सत्य से बहकाए न जाएं (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15)। आज सारे संसार भर में ऐसे मत, समुदायों, और डिनॉमिनेशंस का बोल-बाला है जो परमेश्वर पवित्र आत्मा के नाम से और उन से संबंधित बहुत सी गलत शिक्षाएं लोगों को सिखाने में लगे हुए हैं। वे बाइबल के पदों, वाक्यांशों, शब्दों, और बातों को उनके संदर्भ से बाहर लेकर, उन्हें अपनी धारणाओं के अनुसार तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं, उनपर अपनी उन्हीं गलत धारणाओं से संबंधित अर्थ बैठाते हैं। ऐसे लोगों की गलत शिक्षाओं में एक प्रमुख शिक्षा मसीह यीशु पर विश्वास करने के बाद, अलग से पवित्र आत्मा को प्राप्त करने के प्रयत्न करने के संबंध में होती है। वे लोगों के मनों में यह गलत शिक्षा बैठा देने के प्रयास करते हैं कि मनुष्य अपनी युक्तियों, विधियों, और प्रयासों से, या किसी व्यक्ति विशेष अथवा उनके मत के लोगों या उनके अगुवे द्वारा दिखाए और बताए गए निर्देशों का पालन करने से पवित्र आत्मा प्राप्त कर सकता है। और साथ ही वे मरकुस 16:18 का दुरुपयोग करते हुए बल देकर एक और गलत शिक्षा भी जोड़ देते हैं कि पवित्र आत्मा मिलने का प्रमाणअन्य भाषाएं बोलनातथा आश्चर्यकर्म करना है।

 ये लोग अपनी धारणाओं को बहुत बल देकर प्रस्तुत करते हैं। वे बहुत शोर-शराबे तथा विचित्र शारीरिक हाव-भाव और क्रियाओं के साथ अपनी बातों को यह कहकर प्रस्तुत करते हैं कि उनका यह शोर-शराबा, विचित्र शारीरिक क्रियाएं और हाव-भाव पवित्र आत्मा पा लेने और उनमें पवित्र आत्मा की सामर्थ्य विद्यमान होने के प्रमाण हैं। किन्तु उपरोक्त यूहन्ना 15:26 में देखिए, प्रभु यीशु मसीह ने पवित्र आत्मा के प्रभु के शिष्यों में आने के विषय क्या कहा, क्या प्रमाण दिया -वह मेरी गवाही देगा”; अर्थात शिष्य में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति, उस शिष्य के जीवन में प्रभु यीशु मसीह की गवाही विद्यमान होने से प्रमाणित होगी, न कि बाइबल से बाहर की बातों के द्वारा! वह शिष्य मसीह के समान जीना आरंभ कर देगा, प्रभु का गवाह होकर कार्य करने लगेगा, प्रभु यीशु की आज्ञाकारिता में किसी मनुष्य-मत-समुदाय-डिनॉमिनेशन को नहीं वरन परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन व्यतीत करेगा (1 कुरिन्थियों 11:1; 1 थिस्सलुनीकियों 4:1-2, 11)। शिष्यों को पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त होने से संबंधित प्रभु यीशु की शिक्षाओं के इन चारों हवालों में (यूहन्ना 14:16-17, 26; 15:26; 16:7) प्रभु ने अपने शिष्यों से ऐसी कोई बात नहीं कही जैसी ये पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाएं देने वाले बताते और सिखाते हैं। वरन प्रभु यीशु ने आते समय की इन गलत शिक्षाओं से सचेत रहने के लिए ही पहले से ही अपने शिष्यों को समझा दिया, उनके लिए लिखवा दिया कि परमेश्वर पवित्र आत्मा किसी मनुष्य के तरीकों से नहीं, केवल और केवल प्रभु परमेश्वर की ओर से ही मिलता है, और प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी में, उसके उद्धार पाते ही तुरंत ही आकर निवास करने लगता है, जैसा कि हम पहले देख चुके हैं (लिंक: उद्धार के साथ पवित्र आत्मा की प्राप्ति)। जिसका वास्तव में उद्धार नहीं हुआ है, उसमें परमेश्वर पवित्र आत्मा भी निवास नहीं करेगा, वह व्यक्ति चाहे जितने प्रयास, प्रार्थना, उपवास, आदि क्यों न कर ले। व्यक्ति में पवित्र आत्मा की उपस्थिति, उस व्यक्ति के प्रभु यीशु द्वारा ही उद्धार के सुसमाचार का गवाह होने से, प्रभु यीशु मसीह की गवाही रखने (यूहन्ना 15:26) और उस व्यक्ति के द्वारा शरीर की लालसाओं को त्याग कर जीवन में पवित्र आत्मा के फल दर्शाने (गलातीयों 5:22-24) के द्वारा प्रमाणित होती है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो ध्यान रखिए कि परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रत्येक मसीही विश्वासी का सहायक है, और केवल प्रभु यीशु मसीह तथा पिता परमेश्वर की ओर से आता है। वह मनुष्य के हाथ की कठपुतली नहीं है जिसे मनुष्य अपने प्रयासों और मन के अनुसार लेता-देता रहे, एक-दूसरे पर उतारता रहे, किसी पर उतर आने के लिए बाध्य करता रहे, और फिर उस से कुछ-कुछ तमाशे करवाता रहे। ऐसी भावना रखने वाले लोग शमौन जादूगर, जिसको दुष्टता से भरा हुआ कहा गया है, के समान हैं क्योंकि वह परमेश्वर पवित्र आत्मा को अपने वश में रखकर अपनी इच्छा के अनुसार प्रयोग करना चाहता था (प्रेरितों 8:18-23)। ऐसे लोगों और उनकी भ्रामक शिक्षाओं से बचकर रहिए; उनके बहकावे में न पड़िए।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 46-47 
  • इब्रानियों 6

सोमवार, 8 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 8


व्यक्तिगत जीवन में भूमिका (4) - यूहन्ना 14:30

 हम पिछले लेखों में देखते आ रहे हैं कि एक मसीही विश्वासी के मसीही सेवकाई के जीवन में उसे व्यक्तिगत रीति से परमेश्वर पवित्र आत्मा किस प्रकार सहायता एवं मार्गदर्शन प्रदान करता है। पिछले लेख में हमने देखा था कि पवित्र आत्मा अपनी ओर से कभी कुछ नया नहीं कहता है; वह मसीहियों को मसीह यीशु के वचन, प्रभु की शिक्षाएं स्मरण करवाता है, और सेवकाई तथा मसीही जीवन से संबंधित सभी बातें सिखाता है। सीखने में व्यक्ति के परिश्रम, प्रयास, और पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता की आवश्यकता होती है। पवित्र आत्मा ने पतरस प्रेरित के द्वारा 2 पतरस 1:3-4 में लिखवाया है कि जीवन और भक्ति से संबंधित सभी बातें, प्रभु यीशु मसीह की पहचान में होकर हमें उपलब्ध करवा दी गई हैं; तथा साथ ही इस संसार की सड़ाहट से बचने और ईश्वरीय स्वभाव के संभागी होने का मार्ग भी दे दिया गया है। अर्थात पहली कलीसिया के उस युग में, जब परमेश्वर पवित्र आत्मा के अगुवाई में प्रेरित और प्रभु के जन उन पत्रियों की रचना कर रहे थे, जिन्हें संकलित करके नए नियम के रूप में बाइबल में रखा जाना था, उसी समय मसीही विश्वासी के लिए मसीही जीवन और सेवकाई से संबंधित जो कुछ भी आवश्यक था, वह उन्हें दे दिया गया था, लिखवा दिया गया था, और अब नए नियम के रूप में हमारे हाथों में विद्यमान है। तात्पर्य यह कि परमेश्वर का वचन आरंभिक कलीसिया के समय से ही पूर्ण हो चुका है, उसमें और कुछ जोड़ने, कुछ नया बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसा करना परमेश्वर के वचन की अनाज्ञाकारिता है, परमेश्वर द्वारा दण्डनीय है (व्यवस्थाविवरण 12:32; नीतिवचन 30:6; प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। परमेश्वर को स्वीकार्य और उसे प्रसन्न करने वाला जीवन जीने के लिए मानवजाति के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, वह सब परमेश्वर पवित्र आत्मा ने लिखवा दिया है, उपलब्ध करवा दिया है। 

इसलिए आज के उननएदर्शनों, भविष्यवाणियों, शिक्षाओं, चमत्कारिक बातों, आदि का कोई औचित्य अथवा आवश्यकता नहीं है; और न ही परमेश्वर के वचन बाइबल से उनके लिए कोई समर्थन है, जिन्हेंपवित्र आत्मा की ओर सेप्राप्त करने का दावा आज बहुत से मत और समुदाय, या डिनॉमिनेशन के अनुयायी करते हैं, जिनके बारे में औरों को भी सिखाते हैं, तथा औरों को भी करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यदि पवित्र आत्मा से संबंधित बाइबल की शिक्षाएं, प्रभु यीशु की कही बातें सही हैं, तो इन लोगों के ऐसे सभी दावे बेबुनियाद हैं, व्यर्थ हैं, झूठे हैं, और उनमें पड़ने या उन्हें स्वीकार करने का कोई आधार नहीं है। परमेश्वर पवित्र आत्मा सत्य का आत्मा है, वह न तो कभी झूठ कहेगा या करेगा, न झूठ बुलवाएगा या करवाएगा। वह वही कहेगा और करेगा जो परमेश्वर के वचन में उसने अपने विषय पहले ही लिखवा कर रखा है। इसलिए इन भ्रामक और वचन के विपरीत शिक्षाओं से बच कर रहें, उन्हें स्वीकार न करें। ऐसी सभी लुभावनी, चमत्कारिक, आकर्षक, किन्तु वचन से असंगत बातें परमेश्वर की ओर से कदापि नहीं हैं, और उनके निर्वाह से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता है। ऐसी बातों के संदर्भ में मत्ती 7:21-23 तथा 2 थिस्सलुनीकियों 2:9 को सदा स्मरण रखें और 1 थिस्सलुनीकियों 5:21 के अनुसार सभी शिक्षाओं को बारीकी से जाँच-परख कर ही स्वीकार करें। 

प्रभु ने यूहन्ना 14:30 में शिष्यों को इसी खतरे से सचेत किया, जब उन्होंने शिष्यों से कहा, “मैं अब से तुम्हारे साथ और बहुत बातें न करूंगा, क्योंकि इस संसार का सरदार आता है, और मुझ में उसका कुछ नहीं। प्रभु जानता था कि शिष्यों द्वारा मसीही सेवकाई पर निकलते ही, उनके द्वारा सुसमाचार प्रचार आरंभ होते ही, 'संसार का सरदार' अर्थात शैतान उन पर टूट कर पड़ने वाला था। और यूहन्ना ने अपनी पहली ही पत्री में अपने पाठकों को लिखा, “हे लड़कों, यह अन्तिम समय है, और जैसा तुम ने सुना है, कि मसीह का विरोधी आने वाला है, उसके अनुसार अब भी बहुत से मसीह के विरोधी उठे हैं; इस से हम जानते हैं, कि यह अन्तिम समय है” (1 यूहन्ना 2:18)। उस मसीह विरोधी का सामना करने और उसकी युक्तियों पर शिष्यों को जयवंत रखने के लिए (2 कुरिन्थियों 2:11), प्रभु ने शिष्यों के लिए उनमें व्यक्तिगत रीति से परमेश्वर पवित्र आत्मा के सर्वदा निवास करते रहने का यह अद्भुत और अभूतपूर्व इंतजाम कर के दिया था कि वे कभी अकेले, निःसहाय न हों; भरमाए या भटकाए न जाएं, वरन हमेशा ईश्वरीय सामर्थ्य के द्वारा सुरक्षित रह सकें। किन्तु यह तब ही संभव है जब हम पवित्र आत्मा द्वारा कहे के अनुसार करें (गलातीयों 5:16-18, 25)। किन्तु यदि हम परमेश्वर द्वारा हमारे लिए निर्धारित की गई सीमाओं के बाहर जाएंगे, तो उसकी सुरक्षा के बाड़े के बाहर आ जाएंगे, और तब शैतान हमें डस लेगा, हमें मुसीबतों में डाल देगा (अय्यूब 1:10; सभोपदेशक 10:8) 

इसीलिए, यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर के वचन, को जानने और मानने में अपना समय और ध्यान लगाइए; अपनी मन-मर्जी और पसंद के अनुसार नहीं, अपितु उसकी आज्ञाकारिता में जीवन व्यतीत करें। प्रत्येक मसीही विश्वासी को व्यक्तिगत रीति से पवित्र आत्मा की सामर्थ्य दिए जाने का उद्देश्य यही है कि वह शैतान की युक्तियों को समझे, उनके प्रति सचेत रहे, और परमेश्वर के वचन को सीख समझ कर अपनी मसीही सेवकाई के लिए सक्षम, तत्पर, और तैयार हो जाए, उस सेवकाई में लग जाए।  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 43-45
  • इब्रानियों 5

रविवार, 7 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 7

  

व्यक्तिगत जीवन में भूमिका (3) - यूहन्ना 14:26

हम प्रभु यीशु मसीह के सच्चे, आज्ञाकारी, और समर्पित शिष्य द्वारा उसकी मसीही सेवकाई में सहायता और मार्गदर्शन के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका का अध्ययन कर रहे हैं, जो कि प्रत्येक मसीही विश्वासी में, उसके उद्धार पाते ही, तुरंत ही आकर निवास करने लगता है। हमने देखा है कि पवित्र आत्मा की यह भूमिका दो प्रकार की है, विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन में, जो यूहन्ना 14 अध्याय में दी गई है; और उसकी सेवकाई के जीवन में, जो यूहन्ना 16 अध्याय में दी गई है। हम व्यक्तिगत जीवन में भूमिका को यूहन्ना 14:16-17 पदों से देख चुके हैं कि एक बार विश्वासी में आ जाने के बाद वह सर्वदा मसीही विश्वासियों के साथ आजीवन बना रहता है, मसीही जीवन के निर्वाह के लिए उनका सहायक होता है, सेवक नहीं। उसे किसी मनुष्य के प्रयास, विधियों, अथवा युक्तियों द्वारा प्राप्त नहीं किया जाता है, वरन परमेश्वर द्वारा स्वेच्छा से प्रदान किया जाता है। परमेश्वर पवित्र आत्मा सत्य का आत्मा है, कोई भी सांसारिक व्यक्ति, वह चाहे कितना भी “धर्मी” क्यों न हो, उसे ग्रहण नहीं कर सकता है; वह केवल वास्तविक मसीही विश्वासियों में ही रहता है। आज हम मसीही विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन में परमेश्वर का वचन सीखने से संबंधित परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका को देखेंगे। 


प्रभु यीशु मसीह ने फसह के पर्व के भोज के समय में अपने शिष्यों से चर्चा करते समय उनसे परमेश्वर पवित्र आत्मा के विषय, जिसे वे निकट भविष्य में प्राप्त करने वाले थे, आगे कहा, “परन्तु सहायक अर्थात पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा” (यूहन्ना 14:26)। इस पद से हम परमेश्वर पवित्र आत्मा (जिसे, जैसा कि यहाँ भी लिखा गया है, कोई मनुष्य नहीं वरन पिता परमेश्वर ही प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों में भेजेगा), द्वारा मसीही विश्वासी को प्रभु का वचन सिखाने की कार्य-विधि को देखते हैं:

  • वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा” - पवित्र आत्मा ही 'तुम्हें' अर्थात प्रभु के शिष्यों को सब बातें सिखाता है। अर्थात वह बिना किसी भेदभाव या पक्षपात के सभी शिष्यों को समानता से प्रभु की सभी बातें सिखाने के लिए है। ध्यान कीजिए यहाँ यह नहीं कहा गया है कि जो शिष्य अलग से कोई कार्य करेंगे या कोई रीति पूरी करेंगे उन्हें सिखाएगा; या उससे मिलने वाली वचन की यह शिक्षा कुछ विशेष चुने हुए शिष्यों ही के लिए है, अन्य के लिए नहीं। परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रभु के हर शिष्य को सभी बातें सिखाएगा। सीखना परिश्रम से, बारंबार अध्ययन करने और परस्पर चर्चा करने से ही होता है; पुस्तक हाथ में पकड़ लेने या उसका सिरहाना बना लेने, या लापरवाही से कभी-कभार पढ़ लेने से सीखना नहीं हो सकता है। बारंबार पढ़ना, लिखी बातों का पालन करना, दिए गए अभ्यास को करके शिक्षक को दिखाना और उसकी जाँच करवाना होता है। सीखना एक प्रक्रिया है, जिसका निर्वाह करना आवश्यक है; और इसके लिए पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों का शिक्षक है। सीखने में विद्यार्थियों द्वारा गलतियाँ होती हैं, उनके कार्य में कमी रह जाती है। तब शिक्षक उन गलतियों को सुधार कर संबंधित अध्ययन और निर्धारित कार्य को पुनः करने को देता है। इसमें समय और सतत प्रयास की आवश्यकता होती है; किन्तु इस प्रक्रिया से निकले बिना सीखना नहीं होने पाता है। ठीक इसी प्रक्रिया का निर्वाह पवित्र आत्मा की अगुवाई और सामर्थ्य से परमेश्वर के वचन के अध्ययन और मसीही सेवकाई से संबंधित बाइबल में दिए गए परमेश्वर के निर्देशों के पालन करने में भी किया जाता है। परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी में निवास करता है, और जब तक वह विश्वासी उसके साथ सहयोग करता है, उसका आज्ञाकारी रहता है, पवित्र आत्मा उसका मार्गदर्शन करता है, उसे सिखाता है, सुधारता है, सक्षम तथा उन्नत करता रहता है। 

  • जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा” - आज बहुत से मत और डिनॉमिनेशंस में यह गलत शिक्षा और व्यवहार बहुत आम है कि उनके अनुयायी ये दावे करते हैं कि उन्हें पवित्र आत्मा ने कुछ विशिष्ट कहा है, या उन्हें कोई नई शिक्षा दी है, या उन्हें कोई नया दर्शन मिला है - ऐसी बातें और भविष्यवाणियाँ जो बाइबल में नहीं दी गई हैं, जिन्हें न प्रभु यीशु ने और न ही उनके शिष्यों अथवा प्रेरितों, या वचन की पुस्तकें लिखने वालों ने कहा और लिखा है। उनकी इन बातों से प्रभावित होकर बहुत से लोग भी ऐसे अनुभवों की लालसाएं करने लगते हैं, उनके समान करने के प्रयासों में लग जाते हैं। जबकि यह विचार, व्यवहार, और शिक्षा बाइबल के अनुसार सही नहीं है, सर्वथा अनुचित और गलत है। आज हमारे हाथों में जो परमेश्वर का वचन है वह अधूरा नहीं संपूर्ण है; हर स्थान, समय, और सभ्यता के लिए, सभी लोगों को जीवन और भक्ति से संबंधित सब कुछ सिखाने, संसार की सड़ाहट से बचाने, और ईश्वरीय स्वभाव का संभागी बनाने के लिए पर्याप्त है (2 पतरस 1:2-4)। उसमें और कुछ भी नया जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। वचन में चेतावनी है कि जो भी इसमें कुछ जोड़ेगा, या इस में से कुछ निकालेगा, उसे यह करने के लिए परमेश्वर के दंड का भागी होना पड़ेगा (व्यवस्थाविवरण 12:32; नीतिवचन 30:6; प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। इस पद में प्रभु यीशु मसीह ने स्पष्ट कहा है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा की शिक्षा का तरीका केवल प्रभु द्वारा कही गई बातों को स्मरण करवाने का; उनके आधार पर सिखाने का है; इससे अतिरिक्त या इससे पृथक नहीं। प्रभु यीशु ने यह नहीं कहा कि वह अपनी ओर से शिष्यों को कोई नई शिक्षाएं, कोई नए दर्शन देगा, स्थापित वचन में अपने द्वारा कोई नई बात जोड़ेगा। इसकी पुष्टि में, प्रभु यीशु मसीह ने अपनी महान आज्ञा में, अपने स्वर्गारोहण के समय शिष्यों से कहा कि वे जाकर और शिष्य बनाएं, तथा जो शिष्य बनते हैं उन्हें प्रभु यीशु की बातें सिखाएं (मत्ती 28:18-20); न कि उन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा नई शिक्षाएं, नए दर्शन और नई भविष्यवाणियाँ प्राप्त करने के लिए लालसा, परिश्रम, और प्रयास करने वाले बनना सिखाएं। 


तात्पर्य यह है कि पहले प्रभु की बातों को पढ़ो और मन में बसाओ (कुलुस्सियों 3:16)। जो और जितना मन में बसा हुआ है, पवित्र आत्मा उसे ही स्मरण करवाने के द्वारा सिखाएगा। इस पद से कुछ ऊपर यूहन्ना 14:21, 23 में प्रभु यीशु मसीह ने शिष्यों से कहा कि जो उसके वचन से प्रेम करता है, वही है जो वास्तविकता में प्रभु से प्रेम करता है, और प्रभु तथा पिता परमेश्वर ऐसे प्रेम करने वालों के साथ रहते हैं। यदि वचन अधिकाई से मन में बस हुआ होगा तो स्मरण करवाने और सिखाने के लिए अधिक सामग्री होगी, बेहतर सीखने पाएंगे। यदि वचन मन में कम होगा तो पवित्र आत्मा के पास स्मरण करवाने और सिखाने के लिए कम सामग्री होगी, और कम ही सीखने पाएंगे। जिस शिष्य ने वचन जितना अधिक अपने मन में बसा रखा है, समय, परिस्थिति, तथा आवश्यकता के अनुसार परमेश्वर पवित्र आत्मा को उसे उतना अधिक और अच्छा सिखाने, तथा उपयोग करवाने का अवसर रहेगा। 


इसीलिए, यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर के वचन, बाइबल को अपने जीवन में प्राथमिकता दीजिए। वचन को केवल औपचारिकता निभाते हुए पढ़ने वाले ही नहीं, वरन लगन एवं गंभीरता से वचन का अध्ययन तथा पालन करने वाले बनिए। मसीही विश्वासी के अंदर निवास करने वाला पवित्र आत्मा प्रत्येक विश्वासी को वचन सिखाने के लिए ही दिया गया है। यदि आप उसके साथ मिलकर प्रयास और परिश्रम करने के लिए तैयार हैं तो वह अवश्य ही आपको भी सिखाएगा क्योंकि वह तो सभी को सिखाना चाहता है और सभी मसीही विश्वासियों को सिखाता है (1 कुरिन्थियों 2:10-15; 2 तिमुथियुस 3:16-17)। 


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; फिर आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे आपको आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 40-41

  • इब्रानियों 4