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रविवार, 20 फ़रवरी 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (8)

 


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - प्रभु यीशु के विषय गलत शिक्षाएं (2)


पिछले कुछ लेखों से हम इफिसियों 4:14 में दी गई बातों में से, बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों और कलीसियाओं को प्रभावित करने वाले तीसरे दुष्प्रभाव, भ्रामक या गलत उपदेशों के बारे में देखते आ रहे हैं। इन गलत या भ्रामक शिक्षाओं के मुख्य स्वरूपों के बारे में परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है कि इन भ्रामक शिक्षाओं के, गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन स्वरूप होते हैं, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, जिन्हें शैतान और उसके लोग प्रभु यीशु के झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं। सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए इन तीनों स्वरूपों के साथ इस पद में एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है। इस पद में लिखा है कि शैतान की युक्तियों के तीनों विषयों, प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार के बारे में जो यथार्थ और सत्य है वह वचन में पहले से ही बता दिया गया है। इन तीनों प्रकार की गलत शिक्षाओं में से इस पद में सबसे पहली है कि शैतान और उस के जन, प्रभु यीशु के विषय ऐसी शिक्षाएं देते हैं जो वचन में नहीं दी गई हैं। 

पिछले लेख में हमने प्रभु यीशु मसीह के विषय प्रेरितों और प्रभु के शिष्यों के द्वारा आरंभिक कलीसिया में जो बातें प्रचार की गईं, जो नए नियम की प्रेरितों के काम पुस्तक में संकलित हैं, उनमें से कुछ महत्वपूर्ण शिक्षाएं और तथ्य सूचीबद्ध किए थे, जिससे हर भ्रामक शिक्षा को उन शिक्षाओं और तथ्यों से मिलाकर देखा जाए, और जो उस सूची में नहीं है, उस की बारीकी से वचन की अन्य बातों के आधार पर जाँच-पड़ताल की जाए, यह निश्चित करने के लिए कि वह स्वीकार्य करने योग्य है अथवा अस्वीकार करने के योग्य। स्वीकार्य पाए जाने के बाद ही उसे ग्रहण किया जाना चाहिए अन्यथा उसका तिरस्कार कर देना चाहिए। शैतान और उसके लोगों ने प्रभु यीशु मसीह के विषय कई गलत धारणाएं, बातें और शिक्षाएं संसार में फैला रखी हैं। हमने पहले देखा है कि 2 कुरिन्थियों 11:13-15 के अनुसार, ये लोग झूठे प्रेरित और प्रभु के सेवक बन कर इन गलत बातों और शिक्षाओं को फैलाते हैं। इसीलिए उनकी ये गलत बातें सामान्यतः बड़ी धार्मिक, प्रभु और परमेश्वर के प्रति आदरणीय, श्रद्धा-पूर्ण प्रतीत होती हैं। किन्तु उन्हें जाँचने की कसौटी एक ही है - क्या वे शिक्षाएं प्रभु यीशु के विषय पहले से वचन में लिखी गई बातों के अनुसार, उनके अनुरूप हैं, अथवा उन से भिन्न हैं? यदि भिन्न हैं, तो स्वीकार्य कदापि नहीं हैं; उनसे बच कर रहना चाहिए, उन बातों के और उन्हें फैलाने वालों के झांसे में नहीं आना चाहिए। आज हम इन्हीं धार्मिक, आदरणीय श्रद्धा-पूर्ण, किन्तु बिलकुल अनुचित और गलत शिक्षाओं के कुछ उदाहरण देखेंगे। 


एक गलत शिक्षा यह है कि प्रभु यीशु मानवीय देह में आया ही नहीं। परमेश्वर इतना पवित्र और परिशुद्ध है कि वह न तो पापमय देह में, और न ही पापी मनुष्यों के साथ वास कर सकता है; उनके समान बनकर रह सकता है। जब कि बाइबल स्पष्ट कहती है कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर है, जिसे हम पिछले लेख में देख चुके हैं; साथ ही थोमा द्वारा पुनरुत्थान हुए प्रभु को किए गए संबोधन को देखिए, “यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर!” (यूहन्ना 20:28); और प्रभु ने उसकी इस बात को गलत नहीं कहा, न ही किसी अन्य शिष्य ने इसके बारे में कोई एतराज़ उठाया। यह सभी को स्वीकार्य थी, सत्य थी। साथ ही यूहन्ना 1:1-2, 14 को भी देखिए: “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था। यही आदि में परमेश्वर के साथ था।”; “और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण हो कर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।” स्पष्ट है कि जो वचन परमेश्वर है, आदि से था, वही देहधारी हुआ, और प्रेरित यूहन्ना तथा उसके साथियों ने उसकी महिमा देखी, उसे जाना और पहचाना, जैसा वह 1 यूहन्ना 1:1-3 में भी कहता है। और प्रेरित यूहन्ना द्वारा अपनी पहली पत्री में इसके संबंध में लिखी गई बात पर भी ध्यान कीजिए: “परमेश्वर का आत्मा तुम इसी रीति से पहचान सकते हो, कि जो कोई आत्मा मान लेती है, कि यीशु मसीह शरीर में हो कर आया है वह परमेश्वर की ओर से है। और जो कोई आत्मा यीशु को नहीं मानती, वह परमेश्वर की ओर से नहीं; और वही तो मसीह के विरोधी की आत्मा है; जिस की चर्चा तुम सुन चुके हो, कि वह आने वाला है: और अब भी जगत में है” (1 यूहन्ना 4:2-3)। इसी गलत शिक्षा का एक अन्य स्वरूप है कि प्रभु यीशु परमेश्वर नहीं, वरन एक अति उच्च-कोटि के स्वर्गदूत थे, उन्हें परमेश्वर द्वारा बहुत असाधारण सामर्थ्य प्रदान की गई थी, और अपना कार्य करने के बाद वे परमेश्वर के पास लौट गए, किन्तु लोगों ने उन्हें ही परमेश्वर समझ लिया। उपरोक्त पद इन बातों के गलत होने को दिखा देते हैं।


एक और गलत शिक्षा है कि यीशु एक भला व्यक्ति था, जो लोगों की सहायता करता था, धर्मी था; किन्तु न तो अवतरित परमेश्वर था और न ही उद्धारकर्ता। किन्तु उसके मरने के बाद कुछ लोगों ने उसके विषय ये कहानियाँ बनाकर लोगों में फैला दीं। इसे नकारने के लिए उपरोक्त पदों के साथ परमेश्वर पवित्र आत्मा की प्रेरणा से प्रेरित यूहन्ना द्वारा लिखी गई बात पर ध्यान कीजिए: “मैं ने तुम्हें इसलिये नहीं लिखा, कि तुम सत्य को नहीं जानते, पर इसलिये, कि उसे जानते हो, और इसलिये कि कोई झूठ, सत्य की ओर से नहीं। झूठा कौन है? केवल वह, जो यीशु के मसीह होने का इनकार करता है; और मसीह का विरोधी वही है, जो पिता का और पुत्र का इनकार करता है। जो कोई पुत्र का इनकार करता है उसके पास पिता भी नहीं: जो पुत्र को मान लेता है, उसके पास पिता भी है। जो कुछ तुम ने आरम्भ से सुना है वही तुम में बना रहे: जो तुम ने आरम्भ से सुना है, यदि वह तुम में बना रहे, तो तुम भी पुत्र में, और पिता में बने रहोगे। और जिस की उसने हम से प्रतिज्ञा की वह अनन्त जीवन है। मैं ने ये बातें तुम्हें उन के विषय में लिखी हैं, जो तुम्हें भरमाते हैं” (1 यूहन्ना 2:21-26)।


एक और गलत शिक्षा है कि प्रभु यीशु मसीह अपने लड़कपन में भारत आए थे, यहाँ पर शिक्षाएं प्राप्त कीं, और फिर वापस जाकर उन्हीं शिक्षाओं के आधार पर प्रचार किया, ख्याति पाई। यह इस आधार पर कहा जाता है क्योंकि लगभग बारह वर्ष की आयु (लूका 2:42) से लेकर तीस वर्ष की आयु में उनकी सेवकाई के आरंभ होने के समय (लूका 3:23) तक का कोई विस्तृत वृतांत बाइबल में नहीं पाया जाता है। किन्तु वचन से इससे संबंधित कुछ बातें देखिए:

  • लूका 2:51 देखिए: “तब वह उन के साथ गया, और नासरत में आया, और उन के वश में रहा; और उस की माता ने ये सब बातें अपने मन में रखीं।” अर्थात प्रभु यीशु अपने परिवार के साथ ही था, कहीं नहीं गया था। 

  • उसके उपदेश और कार्यों को देखकर लोगों ने अचंभा किया और कहा, “सबत के दिन वह आराधनालय में उपदेश करने लगा; और बहुत लोग सुनकर चकित हुए और कहने लगे, इस को ये बातें कहां से आ गईं? और यह कौन सा ज्ञान है जो उसको दिया गया है? और कैसे सामर्थ्य के काम इसके हाथों से प्रगट होते हैं?” (मरकुस 6:2)। यदि प्रभु यीशु भारत या किसी अन्य स्थान से कुछ सीख कर आए होते तो लोगों में यह असमंजस नहीं होता। 

  • उनकी सेवकाई का आरंभ उनके इस प्रचार से हुआ: “उस समय से यीशु प्रचार करना और यह कहना आरम्भ किया, कि मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है” (मत्ती 4:17)। और उनके जीवन तथा कार्यों को संक्षिप्त करके एक ही पद में इस प्रकार लिखा गया है, “कि परमेश्वर ने किस रीति से यीशु नासरी को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से अभिषेक किया: वह भलाई करता, और सब को जो शैतान के सताए हुए थे, अच्छा करता फिरा; क्योंकि परमेश्वर उसके साथ था” (प्रेरितों 10:38)। प्रभु की ये शिक्षाएं, उनका जीवन, उनका कार्य, उनकी सभी बातें, भारत क्या संसार के अन्य किसी भी स्थान की किसी भी शिक्षा या सभ्यता के बातों से मेल नहीं खाता है। यदि उन्होंने कहीं जा कर शिक्षा पाई थी, तो वह शिक्षा उनके जीवन और प्रचार में दिखनी तो चाहिए। किन्तु ऐसा है ही नहीं।   


अधिकांश गलत शिक्षाएं प्रभु यीशु मसीह के मृतकों में से पुनरुत्थान से संबंधित हैं, उसे नकारने और बिगाड़ने के प्रयास हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान ही मसीही विश्वास का आधार है – यदि मसीही विश्वास में से पुनरुत्थान को हटा दें, या उसे झूठा प्रमाणित कर दें, तो फिर मसीही जीवन और शिक्षाएँ किसी भी अन्य धर्म की शिक्षाओं से भिन्न नहीं रह जाती हैं। 1 कुरिन्थियों 15 – पूरा अध्याय इसी विषय – पुनरुत्थान के महत्व, पर है, और पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस लिखता है कि यदि पुनरुत्थान नहीं है, यदि मसीह का पुनरुत्थान नहीं हुआ, तो मसीही विश्वास से संबंधित सभी प्रचार और शिक्षा व्यर्थ है (1 कुरिन्थियों 15:12-18)। इसीलिए, जैसा 1 कुरिन्थियों 15:12 में पूछे गए प्रश्न से प्रकट है, कलीसिया के आरंभ के साथ ही प्रभु यीशु के पुनरुत्थान की वास्तविकता पर हमले होने, उसका इनकार करने के प्रयास आरंभ हो गए थे। पुनरुत्थान को झुठलाने के शैतान के ये प्रयास दिखाते हैं कि यह तथ्य उसके तथा उसके राज्य के लिए कितना खतरनाक है। पुनरुत्थान से संबंधित सामान्यतः देखी और कही जाने वाली ये गलत शिक्षाएं हैं:

  • पुनरुत्थान को झूठा ठहराने का पहला प्रयास तो पुनरुत्थान के दिन ही किया गया था – मत्ती 28:11-15 – लोगों में यह बात फैला दी गई कि प्रभु जी नहीं उठा, वरन उसकी लोथ उसके चेलों ने चुरा ली – किन्तु कोई भी, कभी भी, उन भयभीत और प्रभु को छोड़ कर भागे हुए, अपनी जान बचाकर छुपे हुए शिष्यों के पास से उस लोथ को निकलवाकर उनके प्रभु के पुनरुत्थान के प्रचार को झूठ प्रमाणित नहीं कर सका।

  • प्रभु की लोथ चुराने से संबंधित कुछ अन्य कहानियाँ यह भी हैं:

    • अरिमथिया के यूसुफ ने, जिसने निकुदेमुस के साथ मिलाकर प्रभु यीशु को दफनाया था (यूहन्ना 19:38-42), उसी ने प्रभु को किसी और स्थान पर ले जाकर दफना दिया, क्योंकि उस दिन सबत आरंभ होने वाला था, इसलिए उसे यह कार्य शीघ्रता से करना पड़ा था। इसीलिए जहाँ यीशु को पहले दफनाया गया, वह कब्र खाली पाई गई। किन्तु, यूसुफ क्योंकि एक गुप्त शिष्य था, इसलिए उसके द्वारा बिना अन्य शिष्यों को इसके विषय बताए, किसी और स्थान पर ले जाकर दफनाना उचित नहीं लगता है; और ऐसा करने से क्या लाभ होने वाला था? और फिर यदि वे जानते थे कि यीशु जी नहीं उठा है तो फिर शिष्यों में इतनी हिम्मत कैसे आ गई कि वे हर सताव और दुःख सहते हुए भी प्रभु के पुनरुत्थान और सुसमाचार का प्रचार करने से रोके नहीं जा सके?

    • रोमियों ने लोथ ले जाकर कहीं और दफना दी – पिलातुस यरूशलेम में शान्ति रखना चाहता था – ऐसा करने से तो अशांति फैलने की संभावना अधिक थी।

    • यहूदियों ने ही लोथ निकालकर कही और दफना दी – तो फिर जब शिष्य उसके पुनरुत्थान का प्रचार करने लगे, तो उन्होंने वह लोथ निकालकर क्यों नहीं दिखाई?

  • एक कहानी यह भी कही जाती है कि प्रभु यीशु मसीह को क्रूस पर नहीं चढ़ाया गया, वरन उसके स्थान पर उसके जैसा दिखने वाला कोई व्यक्ति चढ़ा दिया गया। किन्तु ध्यान कीजिए कि जिसे यहूदियों ने पूरे लश्कर के साथ जाकर पकड़ा; सारी रात से एक से दूसरी कचहरी में घसीटते रहे, मारते-पीटते रहे, फिर उसे दिन चढ़े छोड़ क्यों दिया गया? रोमी अधिकारी पिलातूस ने भी यीशु को जाँचा, पहचाना, उसे छोड़ने के भरसक प्रयास किए, अन्ततः फिर कोड़े लगाने के लिए अपने सैनिकों को सौंप दिया। तो प्रभु उनके हाथों से कैसे बच निकला? और जिस व्यक्ति को उसके स्थान पर क्रूस पर चढ़ाया गया, वह व्यक्ति अकारण ही क्यों चुपचाप क्रूस पर चढ़ गया, और सब कुछ चुपचाप क्यों सहता रहा? और फिर क्रूस पर से कहे गए सात वचनों के साथ कैसे इस बात का तालमेल बैठा सकते हैं – प्रभु द्वारा अपने सताने वालों को क्षमा करने, यूहन्ना को अपनी माता को सौंपने, साथ टंगे हुए डाकू को क्षमा और स्वर्ग का आश्वासन देने, वचन में लिखी उसके विषय की भविष्यवाणियों पर ध्यान करके उन्हें पूरा करने, परमेश्वर को पिता कहने, आदि बातें कोई साधारण मनुष्य कैसे पूरा कर सकता था? साथ ही यीशु की माता मरियम वहाँ थी, सब देख रही थी, वह कैसे धोखा कहा सकती थी? प्रभु यीशु ने उसे यूहन्ना के हाथों में सौंपा था, यही क्रूस पर यीशु ही के होने की पुष्टि करता है (यूहन्ना 19:25-27)। 

  • कुछ अन्य कहते हैं कि प्रभु मरा नहीं था, केवल बेहोश हुआ था, फिर कब्र में ठण्डे में विश्राम करने के बाद वह होश में आया, और कब्र में से बाहर आ गया। विचार कीजिए, जिस बेरहमी से प्रभु को क्रूस पर चढ़ाने से पहले उसे मारा-पीटा गया था, फिर हाथों-पैरों में कील ठोंके गए, छाती में भाला मारा गया (यूहन्ना 19:34), और सैनिकों ने पुष्टि की, कि वह मर गया है, इसलिए उसकी टांगें नहीं तोड़ीं (यूहन्ना 19:32-33) – इन सभी प्रमाणों के होते हुए, यह कैसे मान लिया जाए कि यीशु मरा नहीं था, केवल बेहोश हुआ था? प्रकट है कि यह कहानी पूर्णतः निराधार है। और फिर तीन दिन कब्र में लहूलुहान और बिना भोजन या पानी के पड़े रहने के बाद किस मनुष्य के शरीर में यह शक्ति बचेगी कि वह 50 सेर मसालों के लेप और लपेटे हुए कपड़े (यूहन्ना 19:39-40) को खोल कर, अपने कीलों से छेदे हुए हाथों और पैरों तथा बेधी हुई छाती के साथ कब्र के मुँह पर लुढ़काए गए भारी पत्थर को हटा कर बाहर आ जाए, पहरेदारों को भी भगा दे, और चलकर वहाँ से चला जाए। 

  • एक अन्य कहानी है कि शिष्यों ने अपनी मनःस्थिति के कारण, प्रभु की आत्मा को देखा था न कि उसके जी उठे शरीर को। प्रभु ने स्वयं ही इस धारणा का खण्डन प्रदान किया – लूका 24:38-43; और थोमा को भी आमंत्रित किया कि वह अपनी रखी गई शर्त के अनुसार उसके घावों को छू कर देख ले (यूहन्ना 20:26-27)। और प्रभु चालीस दिन तक अलग-अलग लोगों को अलग-अलग स्थानों पर दिखाई देता रहा, उनके साथ बात करता रहा; एक साथ पाँच सौ से अधिक शिष्यों को भी दिखाई दिया (1 कुरिन्थियों 15:5-8) – क्या सभी एक ही भ्रम के शिकार थे; और इस भ्रम के कारण अपनी जान पर भी खेलकर प्रचार करने से नहीं रुके? क्या एक भ्रम के लिए वे शिष्य अपने उस अनुभव के बाद उसके लिए दुःख उठाने और मारे जाने को भी तैयार हो गए। जिसने प्रभु का अनुभव कर लिया है, वह उससे पलट नहीं सकता है। 


प्रभु यीशु के विषय इन गलत शिक्षाओं के अतिरिक्त भी अन्य गलत शिक्षाएं और बातें होंगी। पाठकों से निवेदन है कि कृपया उन्हें अपने comments/टिप्पणी के रूप में भेजें, उनके बारे में बताएं जिससे उनके गलत होने की बातों और आधार को सामने लाया जा सके। 


यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो कृपया ध्यान कर लीजिए कि कहीं आप प्रभु यीशु से संबंधित किसी गलत शिक्षा द्वारा भरमा तो नहीं दिए गए हैं? वचन के आधा पर गलत शिक्षाओं को ताड़ लेना, और सही शिक्षा में बने रहना हम सभी मसीही विश्वासियों के लिए अनिवार्य है। हमें अभी समय और अवसर रहते अपने आप को जाँचने और सुधारने के कार्य को कर लेना है। 


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • लैव्यव्यवस्था 26-27         

  • मरकुस 2


शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (7)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - प्रभु यीशु के विषय गलत शिक्षाएं (1)


पिछले कुछ लेखों से हम इफिसियों 4:14 में दी गई बातों में से, बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों और कलीसियाओं को प्रभावित करने वाले तीसरे दुष्प्रभाव, भ्रामक या गलत उपदेशों के बारे में देखते आ रहे हैं। इन गलत या भ्रामक शिक्षाओं के मुख्य स्वरूपों के बारे में परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है कि इन भ्रामक शिक्षाओं के, गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन स्वरूप होते हैं, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, जिन्हें शैतान और उसके लोग प्रभु यीशु के झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं। सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए इन तीनों स्वरूपों के साथ इस पद में एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है। इस पद में लिखा है कि शैतान की युक्तियों के तीनों विषयों, प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार के बारे में जो यथार्थ और सत्य है वह वचन में पहले से ही बता दिया गया है। इसलिए, स्वाभाविक है कि जो भी व्यक्ति वचन में दृढ़ और स्थापित होगा, जो भी वचन में इन तीनों के विषय दी गई बातों से भली-भांति अवगत होगा, वह इनके विषय शैतान की युक्तियों में नहीं फँसेगा, गलती में नहीं पड़ेगा, वरन उन शिक्षाओं के गलत होने को पहचान जाएगा, क्योंकि वे गलत शिक्षाएं वचन में पहले से लिखवाई गई बातों से भिन्न होंगी, उनके अतिरिक्त होंगी। 

इन तीनों प्रकार की गलत शिक्षाओं में से इस पद में सबसे पहली है कि शैतान और उस के जन, प्रभु यीशु के विषय ऐसी शिक्षाएं देते हैं जो वचन में नहीं दी गई हैं। इस पद में इस विषय में लिखे गए वाक्ययदि कोई तुम्हारे पास आकर,, जिस का प्रचार हम ने नहीं कियापर ध्यान कीजिए। अर्थात, प्रभु यीशु के बारे में पौलुस, अन्य प्रेरितों, और प्रभु के शिष्यों द्वारा जो प्रचार किया गया है, जो बताया गया है, वही सच्ची शिक्षा है; अन्य सभी मिथ्या हैं। इसलिए यदि हम यह देख और संकलित कर लें कि वचन में इन प्रेरितों और प्रभु के शिष्यों ने क्या सिखाया है, तो उसके अतिरिक्त प्रभु यीशु के विषय जो कुछ भी सिखाया है, वह गलत शिक्षा है। पौलुस, अन्य प्रेरितों, और प्रभु के शिष्यों द्वारा जो प्रचार किया गया है, उसका संकलन प्रेरितों के काम नामक पुस्तक है। आज हम इसी पुस्तक से, प्रभु के इन अनुयायियों द्वारा किए गए प्रचार में से, प्रभु यीशु के विषय कही गई बातों को देखते और सूचीबद्ध करते हैं। यह सूची प्रभु यीशु के विषय गलत शिक्षाओं को पहचानने के लिए हमारी सहायता करेगी। हमें अपनी इस सूची के साथ मिलाकर, यीशु होने का दावा करने वाले व्यक्ति में, या लोगों द्वारा यीशु के विषय बताई जा रही बातों को जाँच कर देखना होगा कि वे सच्चे यीशु के विषय वचन में दी गई इस सूची की बातों से मेल खाती हैं कि नहीं, उनके अनुसार हैं कि नहीं। जो भी शिक्षा इस सूची में प्रभु यीशु के विषय पाई जाने वाली बातों से मेल नहीं खाती है, उसे तुरंत ही स्वीकार नहीं करना होगा, वरन उसे वचन से भली-भांति जाँच-परख कर, उसकी वास्तविकता और खराई की वचन से पुष्टि करने के बाद ही स्वीकार किया जाए, अन्यथा उसका तिरस्कार कर दिया जाए। 

नए नियम में प्रेरितों के काम पुस्तक में प्रेरितों और शिष्यों द्वारा दी गई प्रभु यीशु के विषय सही शिक्षाएं हैं :

  • प्रेरितों 2:22 हे इस्राएलियों, ये बातें सुनो: कि यीशु नासरी एक मनुष्य था जिस का परमेश्वर की ओर से होने का प्रमाण उन सामर्थ्य के कामों और आश्चर्य के कामों और चिह्नों से प्रगट है, जो परमेश्वर ने तुम्हारे बीच उसके द्वारा कर दिखलाए जिसे तुम आप ही जानते हो। प्रभु यीशु न केवल पूर्णतः परमेश्वर था, वरन पूर्णतः मनुष्य भी था। उसे परमेश्वर ने भेजा था, जिसका प्रमाण और पुष्टि परमेश्वर ने उसके द्वारा उन लोगों के मध्य सामर्थ्य के कार्यों और आश्चर्यकर्मों के द्वारा की थी। 
  • प्रेरितों 2:32 इसी यीशु को परमेश्वर ने जिलाया, जिस के हम सब गवाह हैं। प्रभु यीशु मृतकों में से जी उठा था। यह केवल सुनी-सुनाई बात नहीं थी, वरन उसके मारे जाने, गाड़े जाने, और पुनरुत्थान होने के गवाह भी थे (प्रेरितों 4:33; 5:30; 13:33) 
  • प्रेरितों 2:36 सो अब इस्राएल का सारा घराना निश्चय जान ले कि परमेश्वर ने उसी यीशु को जिसे तुम ने क्रूस पर चढ़ाया, प्रभु भी ठहराया और मसीह भी। सच्चा यीशु क्रूस पर चढ़ाया गया था; और उसे जो आदर एवं महिमा मिली वह परमेश्वर ने दी, किसी मनुष्य, मत, या समुदाय ने नहीं। 
  • प्रेरितों 3:6 तब पतरस ने कहा, चान्दी और सोना तो मेरे पास है नहीं; परन्तु जो मेरे पास है, वह तुझे देता हूं: यीशु मसीह नासरी के नाम से चल फिर। सच्चे यीशु के नाम में आश्चर्यकर्म होते हैं (मरकुस 16:17-20; प्रेरितों 4:30; 9:34; 16:18) 
  • प्रेरितों 3:20 और वह उस मसीह यीशु को भेजे जो तुम्हारे लिये पहिले ही से ठहराया गया है। सच्चे यीशु के विषय में पुराने नियम की सभी पुस्तकों में लिखा गया है (लूका 24:27; प्रेरितों 8:35)  
  • प्रेरितों 4:12 और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें। पृथ्वी पर, मनुष्यों के उद्धार के लिए और कोई अन्य नाम दिया ही नहीं गया है; और किसी में उद्धार है ही नहीं (प्रेरितों 9:22; 15:11; 16:31; 17:3; 18:5; 18:28) 
  • प्रेरितों 4:13 जब उन्होंने पतरस और यूहन्ना का हियाव देखा, ओर यह जाना कि ये अनपढ़ और साधारण मनुष्य हैं, तो अचम्भा किया; फिर उन को पहचाना, कि ये यीशु के साथ रहे हैं। सच्चे यीशु के साथ बने रहने से जीवन बदल जाते हैं, डरपोक लोग निडर हो जाते हैं, साधारण और अनपढ़ मनुष्य भी परमेश्वर के वचन के प्रभावी प्रचारक और ज्ञानी बन जाते हैं। 
  • प्रेरितों 7:55-56 परन्तु उसने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो कर स्वर्ग की ओर देखा और परमेश्वर की महिमा को और यीशु को परमेश्वर की दाहिनी ओर खड़ा देखकर कहा; देखो, मैं स्वर्ग को खुला हुआ, और मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर के दाहिनी ओर खड़ा हुआ देखता हूं। सच्चे यीशु के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के बाद से वे स्वर्ग में परमेश्वर के साथ हैं (1 यूहन्ना 2:1) 
  • प्रेरितों 9:5 उसने पूछा; हे प्रभु, तू कौन है? उसने कहा; मैं यीशु हूं; जिसे तू सताता है। सच्चा यीशु अपने अनुयायियों के साथ बना रहता है; उनके दुख और सताव को अपना व्यक्तिगत दुख और सताव मानता है (प्रेरितों 22:8; 26:15) 
  • प्रेरितों 10:36 जो वचन उसने इस्राएलियों के पास भेजा, जब कि उसने यीशु मसीह के द्वारा (जो सब का प्रभु है) शान्ति का सुसमाचार सुनाया। सच्चे यीशु का सुसमाचार शांति का सुसमाचार है, वह मतभेद, अलगाव, और अशान्ति नहीं प्रेम और मेल-मिलाप के साथ मिलकर रहना सिखाता है; यीशु ही के प्रभु होने को बताता है। 
  • प्रेरितों 17:30-31 इसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में आनाकानी कर के, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है। क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है, जिस में वह उस मनुष्य के द्वारा धर्म से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रमाणित कर दी है। सच्चा यीशु ही जगत के अंत में, अपने सुसमाचार के अनुसार सभी मनुष्यों का उनकी सभी बातों के विषय न्याय करेगा (रोमियों 1:3) 

यह सूची अंतिम या पूर्ण नहीं है। हम अपने अगले लेखों में वचन के अन्य स्थानों पर प्रभु यीशु के विषय पाई जाने वाली बातों को भी देखेंगे, तथा उन गलत शिक्षाओं को भी देखेंगे जिन्हें उस प्रथम, आरंभिक कलीसिया के समय से ही शैतान ने मसीहियों और अन्य लोगों में फैलाना आरंभ कर दिया था, जिससे लोग प्रभु यीशु में विश्वास न लाएं। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं तो प्रभु यीशु के विषय जिन शिक्षाओं को आप जानते और मानते हैं, या जिन्हें औरों को बताते हैं, उन्हें उपरोक्त सूची के समक्ष जाँच-परख लीजिए, और जो सही हों केवल उन्हें थामे रहिए (1 थिस्सलुनीकियों 5:21)। अन्य सभी बातों या शिक्षाओं के आधार और सामग्री की, प्रभु यीशु के विषय वचन की अन्य बातों के साथ बारीकी से जाँच-पड़ताल करने के बाद ही निर्णय लें के वे स्वीकार्य हैं अथवा अस्वीकार्य। वचन से असंगत किसी भी बात या शिक्षा से बचकर रहें। प्रचार करने वाले व्यक्ति की वाक्पटुता, उसके ज्ञान, बोलने के आकर्षक ढंग, शिक्षा की रोचक बातों, और मनुष्यों में उसके आदर और प्रशंसा के स्तर पर मत जाइए। केवल परमेश्वर के वचन की सत्यता के आधार पर ही उसकी बातों और शिक्षाओं के विषय निर्णय कीजिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • लैव्यव्यवस्था 25         
  • मरकुस 1:23-45

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (6)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप

पिछले लेखों में हमने इफिसियों 4:14 में दी गई बातों में से, बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों और कलीसियाओं को प्रभावित करने वाले तीसरे दुष्प्रभाव, भ्रामक या गलत उपदेशों के बारे में देखना आरंभ किया था। इन गलत या भ्रामक शिक्षाओं के बारे में परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा कुरिन्थुस की मंडली को लिखी दूसरी पत्री में जो लिखवाया है, हम उससे देखेंगे और समझेंगे। इन भ्रामक शिक्षाओं के, गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन स्वरूप होते हैं, जिनके बारे में परमेश्वर पवित्र आत्मा ने 2 कुरिन्थियों 11:3-4 में उल्लेख किया हैपरन्तु मैं डरता हूं कि जैसे सांप ने अपनी चतुराई से हव्वा को बहकाया, वैसे ही तुम्हारे मन उस सिधाई और पवित्रता से जो मसीह के साथ होनी चाहिए कहीं भ्रष्‍ट न किए जाएं। यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता। यहाँ, पद 3 में पौलुस पहले अपनी आशंका को व्यक्त कर रहा है कि जैसे हव्वा शैतान की चतुराई से बहकाई गई और पाप में गिर गई, वैसे ही मसीही विश्वासियों के मन भी भ्रष्ट न कर दिए जाएं। शैतान की चतुराई और उसके द्वारा बहकाए जाने की पद 3 की इस बात को हम पिछले लेख में देख चुके हैं। आज से हम यहाँ पद 4 में दी गई बातों से, उन भ्रामक या गलत शिक्षाओं एवं संदेशों के तीन मुख्य स्वरूपों को देखना आरंभ करेंगे।

परमेश्वर पवित्र आत्मा ने 2 कुरिन्थियों 11:4 में, शैतान द्वारा लोगों को मसीही विश्वास के बारे में, तथा मसीही विश्वासियों और कलीसिया को परमेश्वर के मार्गों और वचन से बहकाने, भटकाने के लिए प्रयोग की जाने वाली तीन प्रकार की गलत शिक्षाओं की युक्तियों के बारे में सचेत किया है। ये तीन प्रकार की युक्तियाँ हैं:

  1. कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया;
  2. या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था;
  3. या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था

साथ ही इसी 2 कुरिन्थियों 11 अध्याय में पवित्र आत्मा ने इसके बारे में भी सचेत किया है कि यह गलत प्रचार, शैतान और उसके लोग प्रभु यीशु के झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के करते हैं, “क्योंकि ऐसे लोग झूठे प्रेरित, और छल से काम करने वाले, और मसीह के प्रेरितों का रूप धरने वाले हैं। और यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता है। सो यदि उसके सेवक भी धर्म के सेवकों का सा रूप धरें, तो कुछ बड़ी बात नहीं परन्तु उन का अन्त उन के कामों के अनुसार होगा” (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ध्यान कीजिए, पौलुस प्रेरित में होकर पवित्र आत्मा यह नहीं कह रहा कि ऐसा भविष्य में होगा, वरन इस बात के लिखे जाने के समय, उस आरंभिक कलीसिया के समय में ही जब अभी नए नियम की पत्रियां लिखी ही जा रही थीं, सभी लिखी भी नहीं गईं थीं, और न ही बाइबल की पुस्तकें संकलित होकर एक पुस्तक बनी थी, तब से ही शैतान और उसके दूतों का यह कार्य आरंभ हो चुका था। शैतान ने प्रभु के कार्य में अवरोध डालने, उसे भ्रष्ट करने, उसके लोगों को बहकाने में कोई विलंब नहीं किया। जैसा प्रभु यीशु ने मत्ती 13 अध्याय में कहे परमेश्वर के राज्य से संबंधित दृष्टांतों में से दूसरे दृष्टांत, खेत में जंगली बीजों के बोए जाने के दृष्टांत (मत्ती 13:24-30, 36-42) में कहा है, शैतान के ये लोग आरंभ से ही कलीसिया में घुसकर अपनी गलत शिक्षाएं डालते चले आ रहे हैं।

इसीलिए, नए नियम की पत्रियों को लिखे जाने के समय से ही परमेश्वर पवित्र आत्मा ने उन गलत शिक्षाओं को पहचानने की विधि और उन गलत शिक्षाओं के गुण भी लिखवा दिए हैं। शैतान द्वारा भरमाने भटकाने के लिए प्रयोग की जाने वाली युक्तियों के संबंध में 2 कुरिन्थियों 11:4 की उपरोक्त तीनों बातों पर ध्यान कीजिए। इस पद में लिखा है कि शैतान की युक्तियों के तीनों विषयों, प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार के बारे में जो यथार्थ और सत्य है वह वचन में पहले से ही बता दिया गया है। अर्थात सहीयीशुवही है जिसका प्रचार प्रभु के शिष्यों और प्रेरितों द्वारा किया गया है; पवित्र आत्मा से संबंधित सही शिक्षाएं वही हैं जो पहले दी जा चुकी हैं; सुसमाचार का सही स्वरूप वही है जिसे पहले दिया और माना गया। परमेश्वर के वचन में इन पहले से प्रचार की गई और सिखाई गई बातों के अतिरिक्त, अन्य जो कुछ भी है, वह परमेश्वर की ओर से नहीं है, शैतान की ओर से है; सत्य नहीं असत्य है; उसे स्वीकार नहीं, उसका तिरस्कार किया जाना है।   

इन तीनों युक्तियों का आधार वही है, जो पहले पाप को करवाने के लिए शैतान द्वारा हव्वा के विरुद्ध प्रयोग किया गया था - परमेश्वर के वचन, निर्देश, और बातों को लेकर, उनमें कुछ जोड़ना-घटाना; उनमें कुछ अपनी बातें मिलाना; और परमेश्वर तथा उसके वचन के सही और उचित होने के प्रति संदेह उत्पन्न करना, और मनुष्यों के प्रति परमेश्वर की योजनाओं और मनसाओं के भले एवं उत्तम होने पर प्रश्न-चिह्न लगाना। अपनी बातों के द्वारा शैतान, परमेश्वर द्वारा नियुक्त जगत के उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह पर, मनुष्यों को प्रदान किए गए परमेश्वरीय सहायक पवित्र आत्मा पर, और प्रभु यीशु में विश्वास लाने के द्वारा उद्धार प्राप्त करने के सुसमाचार पर, इन बातों और उनसे संबंधित शिक्षाओं पर तीखा हमला करता है। इन बातों की गलत समझ और भ्रष्ट शिक्षाओं के द्वारा शैतान का प्रयास रहता मनुष्यों के उद्धार पाने और फिर परमेश्वर को भावता हुआ जीवन जीने में बाधाएं उत्पन्न कर सके, मसीही विश्वास और विश्वासियों को निष्क्रिय एवं निष्फल कर सके। किन्तु जैसा पवित्र आत्मा ने पौलुस के द्वारा लिखवाया है, “कि शैतान का हम पर दांव न चले, क्योंकि हम उस की युक्तियों से अनजान नहीं” (2 कुरिन्थियों 2:11), यदि हम शैतान की इन युक्तियों को समझ लें, उसके द्वारा उन्हें अपने जीवन या कलीसिया में कार्यान्वित होते हुए देखने को ताड़ लें, तो शैतान के ये प्रयास व्यर्थ हो जाएंगे। अगले लेख से हम इन तीनों प्रकार की युक्तियों को बारी-बारी और विस्तार से देखेंगे।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए अभी अवसर और समय है कि आप अपने मसीही विश्वास के जीवन को, उस कलीसिया की बातों को जिसमें आप संगति करते हैं, ध्यान से देख-परख लें कि कहीं आपके जीवन में, या आपकी कलीसिया में शैतान द्वारा बोए गए जंगली दाने तो नहीं उग और पनप रहे हैं? यदि जंगली दाने हैं, तो उन्हें पहचान कर, उनसे बचकर रहिए; उनकी भ्रामक शिक्षाओं और गलत संदेशों में मत पड़िए। उन से मत उलझिए; प्रभु अपने समय में, अपनी विधि से उन्हें हटाएगा। तब तक आपको उनसे सचेत रहकर, उनसे दूरी बनाए रखनी है, और परमेश्वर के वचन और विश्वास में उन्नत होते जाना है। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • लैव्यव्यवस्था 23-24         
  • मरकुस 1:1-22

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (5)

 

भ्रामक शिक्षाओं में बहकाए जाने को समझें 

पिछले लेख से हमने इफिसियों 4:14 में दी गई बातों में से, बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों और कलीसियाओं को प्रभावित करने वाले तीसरे दुष्प्रभाव, भ्रामक या गलत उपदेशों के बारे में देखना आरंभ किया था। हमने देखा था कि यह परमेश्वर के वचन की शिक्षा है, परमेश्वर का निर्देश है कि कोई भी शिक्षा या शिक्षक बिना वचन से जाँचें और परखे स्वीकार न किया जाए। उपदेशकों और उनके उपदेशों को जाँचना और परखना वचन के अनुसार है, विरुद्ध नहीं। आरंभिक कलीसिया में भी, वचन के विषय हमारी तुलना में उनके पास बहुत ही सीमित संसाधनों के होते हुए भी, बेरिया के विश्वासियों के समान लोग थे जो पौलुस तक की शिक्षाओं को वचन से जाँचने के बाद ही स्वीकार करते थे, और इसके लिए परमेश्वर के वचन में उनकी सराहना की गई, उन्हें उत्तम कहा गया (प्रेरितों 17:11)। साथ ही हमने यह भी देखा था कि परमेश्वर पवित्र आत्मा ने पौलुस द्वारा पहले ही लिखवा दिया था कि ऐसा समय भी आएगा जब लोग ही स्वयं अपने लिए भ्रामक उपदेश और शिक्षाओं को देने वाले बटोर लेंगे। वे परमेश्वर के वचन की खराई की बातों पर नहीं, अपितु इधर-उधर की बातों, मन-गढ़ंत किस्से-कहानियों से संतुष्ट और प्रसन्न रहेंगे, उन्हें ही सुनना चाहेंगे। किन्तु वचन की सेवकाई करने वालों को ऐसों को भी खरा सुसमाचार सुनाना है, चाहे उसके लिए दुख ही क्यों न उठाने पड़ें (2 तिमुथियुस 4:1-5)

इन भ्रामक शिक्षाओं के, गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन स्वरूप होते हैं, जिनके बारे में परमेश्वर पवित्र आत्मा ने 2 कुरिन्थियों 11:3-4 में उल्लेख किया हैपरन्तु मैं डरता हूं कि जैसे सांप ने अपनी चतुराई से हव्वा को बहकाया, वैसे ही तुम्हारे मन उस सिधाई और पवित्रता से जो मसीह के साथ होनी चाहिए कहीं भ्रष्‍ट न किए जाएं। यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता। यहाँ, पद 3 में पौलुस पहले अपनी आशंका को व्यक्त कर रहा है कि जैसे हव्वा शैतान की चतुराई से बहकाई गई और पाप में गिर गई, वैसे ही मसीही विश्वासियों के मन भी भ्रष्ट न कर दिए जाएं। शैतान ने यह कार्य अपनी चतुराई के द्वारा किया, और इफिसियों 4:14 का पहला दुष्प्रभाव भी अपरिपक्व विश्वासियों के ठग विद्या तथा चतुराई की बातों में फँस जाने के लिए बताता है। अर्थात, जो मसीही विश्वासी परमेश्वर के वचन में दृढ़ और स्थापित, परमेश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित और उसकी आज्ञाकारी नहीं होंगे, वे शैतान की चतुराई की बातों, उसकी ठग विद्या का शिकार हो जाएंगे। 

यहाँ 2 कुरिन्थियों 11:3 की यह बात हम मसीही विश्वासियों के लिए ध्यान देने और समझने की बात है, क्योंकि इसमें शैतान की इस युक्ति को पहचानने और उसमें फँसने से बचने का मार्ग दिया गया है। शैतान की बातें चतुराई की बातें होती हैं, जो उसी प्रकार से मसीही विश्वासियों के मनों में भी परमेश्वर, उसके प्रेम, उसके वचन, उसकी योजनाओं, उसकी भलाई, आदि के विषय में संदेह उत्पन्न करती हैं, जैसे हव्वा में कीं। उसकी ये चतुराई की बातें लोगों को वचन के पालन के स्थान पर अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार कार्य करने को उकसाती हैं, चाहे उनके ये कार्य परमेश्वर के निर्देशों के विरुद्ध ही क्यों न हों, जैसा उसने हव्वा के साथ किया था। इसकी तुलना में, जो शिक्षा, जो उपदेश प्रभु यीशु मसीह के विषय खरा होगा, परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और मार्गदर्शन में दिया जाएगा, उसमें शांति, प्रेम, आपस में गठे रहने, मसीह की पहचान और परमेश्वर के भेदो की बातें होंगी, लुभाने वाली बातें नहीं (कुलुस्सियों 2:2-4)। पवित्र आत्मा की अगुवाई में संदेश देने वाला सच्चा मसीही शिक्षक या उपदेशक, अपने प्रचार और शिक्षाओं में कोई नई बात नहीं लाएगा। वरन वह वचन में दी गई बातों में ही बने रहने और चलते रहने के लिए सिखाएगा, उन बातों से किसी हाल न हटने की, विशेषकर सांसारिक बातों, परंपराओं, तत्व-ज्ञान की बातों से बचकर चलने की शिक्षा देगा (कुलुस्सियों 2:6-8)

अपनी इन 2 कुरिन्थियों 11:3 की धोखे और चतुराई की बातों को लोगों में फैलाने और उनके मध्य में बैठाने के लिए शैतान भ्रम और युक्तियों का प्रयोग करता है। वह अपने इस भ्रम और युक्ति का  प्रचार और प्रसार करने के लिए अपने आप को और अपने लोगों को मसीह-विरोधी नहीं, वरन मसीहियों के समान बनाता और दिखाता हैक्योंकि ऐसे लोग झूठे प्रेरित, और छल से काम करने वाले, और मसीह के प्रेरितों का रूप धरने वाले हैं। और यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करता है। सो यदि उसके सेवक भी धर्म के सेवकों का सा रूप धरें, तो कुछ बड़ी बात नहीं परन्तु उन का अन्त उन के कामों के अनुसार होगा” (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। इसलिए इन झूठे उपदेशकों और शिक्षकों और उनकी शिक्षाओं को पहचान लेने के लिए सभी शिक्षकों और वचन की सेवकाई करने वालों के संदेशों को वचन के अनुसार जाँचना, परखना, तथा पिछले लेख में दी गई पहचान करने की बातों के अनुसार उनका आँकलन करना और सही पहचान करने बाद ही स्वीकार करना अनिवार्य है। अन्यथा शैतान हव्वा के समान बहका और पाप में गिरा देगा। हम अगले लेख में 2 कुरिन्थियों 11:4 में उल्लेख किए गए गलत शिक्षाओं के तीन प्रकार के स्वरूपों पर विचार आरंभ करेंगे। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए प्रभु द्वारा यह समय और अवसर दिया गया है कि आप अपने मसीही जीवन, विश्वास, और परिपक्वता को जाँच लें, तथा आवश्यक सुधार कर लें। ध्यान करें कि जब हव्वा शैतान द्वारा बहकाई और पाप में गिराई गई, और उसके बाद आदम भी, तब पृथ्वी पर पाप नहीं था, कोई बुराई नहीं थी, आदम और हव्वा पवित्र थे और परमेश्वर से संगति रखते थे, उससे वार्तालाप करते थे। किन्तु फिर भी शैतान की चतुराई में फंस गए, उसके भ्रम की युक्ति में आ गए, पाप में गिर गए। ऐसा कोई मसीही विश्वासी नहीं है जो कह सके किमैं पाप नहीं करता हूँ” - जो यह कहता है, वह सत्य से अनभिज्ञ है और परमेश्वर को झूठा ठहराता है (1 यूहन्ना 1:8-10)। इसलिए अभी, समय और अवसर रहते, अपने आप को जाँच कर, ठीक करके, परमेश्वर द्वारा 1 यूहन्ना 1:9 में दिए गए आश्वासन को उससे माँग लीजिए और अपना लीजिए।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • लैव्यव्यवस्था 21-22         
  • मत्ती 28  

बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (4)


भ्रामक शिक्षाएं

 

हम पिछले लेखों से इफिसियों 4:14 से अपरिपक्व मसीही विश्वासियों और अपरिपक्व कलीसिया के बारे में देखते आ रहे हैं। उनकी इस बालकों समान अपरिपक्वता का कारण उनका परमेश्वर पर पूरा भरोसा न रखना, और अपने पर भरोसा रखते हुए, परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार नहीं वरन अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार निर्णय लेते और कार्य करते रहना है। उनकी यह अपने पर भरोसा रखने की प्रवृत्ति उन्हें परमेश्वर के वचन और संगति से दूर कर देती है, जिससे फिर उन्हें उनकी आत्मिक खुराक या तो कम मिलती है अथवा मिलती ही नहीं है, और वे अपने आत्मिक जीवन में, अपने मसीही जीवन, गवाही, और सेवकाई में दुर्बल एवं अप्रभावी हो जाते हैं। अपनी इस अपरिपक्वता के कारण वे फिर मनुष्यों की ठग विद्या, भ्रम और युक्तियों, और गलत शिक्षाओं वाले उपदेशों का शिकार हो जाते हैं, जिसका प्रमाण उनका अस्थिर और भटकता हुआ मसीही जीवन होता है। हम अपरिपक्वता के पहले दो दुष्प्रभावों, मसीही विश्वासियों के मनुष्यों की ठग विद्या तथा भ्रम और युक्तियों से प्रभावित होने के बारे में देख चुके हैं। आज तीसरे दुष्प्रभाव, गलत उपदेशों से प्रभावित होने के बारे में देखेंगे। 

आज हमारे हाथों में परमेश्वर का संपूर्ण वचन है, जो सुविधा उन आरंभिक मसीही विश्वासियों के पास नहीं थी। उनके पास, या उन्हें उपलब्ध केवल पुराने नियम की पुस्तकें, और प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों तथा प्रेरितों द्वारा दी गई मौखिक शिक्षाएं और लिखी गई पत्रियां ही होती थीं। किन्तु फिर भी ऐसे भी मसीही विश्वासी थे, जैसे कि बेरिया के विश्वासी, जो अपने इन सीमित संसाधनों के बावजूद उन्हें दी जाने वाली शिक्षाओं को उपलब्ध वचन से जाँच परख कर देखते थे, और तब ही उन्हें स्वीकार करते थे। उनके इस खराई में बने रहने के प्रयास के लिए परमेश्वर के वचन में उनकी प्रशंसा की गई है, उन्हें उदाहरण के समान रखा गया है (प्रेरितों 17:11)। परमेश्वर पवित्र आत्मा ने पौलुस प्रेरित द्वारा लिखवाया है किसब बातों को परखो: जो अच्छी है उसे पकड़े रहो” (1 थिस्स्लुनीकियों 5:21)। किसी भी प्रचारक, उपदेशक, या शिक्षक के द्वारा दिए जाने वाले संदेश की खराई और सच्चाई को जाँचना-परखना, और तब ही उसे स्वीकार करना, परमेश्वर के वचन के विरुद्ध नहीं, उसके अनुसार है। जो कलीसिया या मसीही विश्वासी यह करते हैं, इस जाँचने की प्रवृत्ति के लिए जाने जाते हैं, वे गलत शिक्षाओं से भी बचे रहेंगे, और कोई गलत शिक्षाओं का देने वाला उनके मध्य आकर कुछ भी कहने से सावधान रहेगा। यह न केवल प्रत्येक मसीही विश्वासी का व्यक्तिगत दायित्व है, वरन प्रत्येक कलीसिया में वचन की सेवकाई के लिए भी परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा यह जांचने का निर्देश बाइबल में लिखवाया गया हैभविष्यद्वक्ताओं में से दो या तीन बोलें, और शेष लोग उन के वचन को परखें” (1 कुरिन्थियों 14:29)। किन्तु आज वचन के इस निर्देश के विपरीत, हर प्रकार के शिक्षक या उपदेशक को सहज ही ग्रहण कर लेना और उसके प्रचार संदेश की सराहना अथवा प्रशंसा करना एक आम बात हो गई है। उसके प्रचार का विश्लेषण करने और जाँचने वाले लोग और कलीसियाएं कम ही मिलती हैं। इसीलिए भ्रामक और गलत उपदेशों की भरमार हो गई है, और शैतान का काम आसान हो गया है। 

आरंभिक कलीसिया के समय में गलत शिक्षाओं वाले ये प्रचारक, अपने साथ इस प्रकार की उनकी सराहना और प्रशंसा की पत्रियां लिए फिरते थे, जिससे उन्हें कलीसियाओं में प्रवेश पाना और प्रचार करना सहज हो जाए। प्रेरित पौलुस ने इस बात के संदर्भ में, कुरिन्थुस की मण्डली के लोगों से पूछा, “क्या हम फिर अपनी बड़ाई करने लगे? या हमें कितनों के समान सिफारिश की पत्रियां तुम्हारे पास लानी या तुम से लेनी हैं?” (2 कुरिन्थियों 3:1)। और अपने आप को इस कुप्रथा से दूर रखते हुए, उसने इन गलत उपदेश वालों की पहचान करने का एक चिह्न भी दिया - सच्चे मसीही प्रचारक का प्रचार और उसका प्रभाव, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से, केवल बाहरी या शारीरिक नहीं होता है, वरन हृदय या मन में होता है, और सभी लोगों के सामने बदले हुए हृदय में दिखाई देता है (2 कुरिन्थियों 3:2-3)। पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस ने तीमुथियुस को इस बात के लिए भी सचेत कियाक्योंकि ऐसा समय आएगा, कि लोग खरा उपदेश न सह सकेंगे पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिये बहुतेरे उपदेशक बटोर लेंगे। और अपने कान सत्य से फेरकर कथा-कहानियों पर लगाएंगे। पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर और अपनी सेवा को पूरा कर” (2 तीमुथियुस 4:3-5), अर्थात, लोग स्वयं ही अपने लिए गलत उपदेशक बटोर लेंगे और वचन की खरी शिक्षाओं पर नहीं, परंतु इधर-उधर की बातों, मन-गढ़ंत किस्से-कहानियों पर मन लगाएंगे। परन्तु तीमुथियुस को इन बातों से सावधान रहते हुए, सुसमाचार प्रचार की अपनी सेवकाई को पूरा करना था, चाहे उसके लिए दुख ही क्यों न उठाने पड़ें। 

अगले लेख में हम इन गलत शिक्षाओं के मुख्य स्वरूपों को देखेंगे। किन्तु यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो अपने विषय यह सुनिश्चित कर लीजिए कि: 

  • क्या आप हर उपदेश को ऐसे ही ग्रहण कर लेते हैं, अथवा उसे वचन से जाँच-परख कर ही स्वीकार करते हैं
  • क्या आपको वचन की खरी शिक्षाएं, जो दोधारी तलवार के समान अंदर तक काटती हैं और भीतरी स्थिति की वास्तविकता को प्रकट करती हैं (इब्रानियों 4:12), पसंद हैं; या फिर आप सुनने में अच्छी लगने वाली इधर-उधर की बातों, मन-गढ़ंत किस्से-कहानियों से संतुष्ट और प्रसन्न होते हैं?
  • क्या आपके हृदय में, मन में आए परिवर्तन को लोग देखने और पहचानने पाते हैं; आपको संसार के लोगों से भिन्न समझने पाते हैं; या आपके किसी भी दावे के विपरीत, आपके जीवन में उन्हें संसार के अन्य लोगों से कोई भिन्नता दिखाई नहीं देती है?

       अपने आप को जाँच-परख कर, जो भी आवश्यक सुधार हैं, उन्हें अभी समय रहते कर लीजिए, और अपने अनन्त जीवन तथा आशीषों को सुरक्षित कर लीजिए। लापरवाही या अनुचित विलंब कहीं बहुत भारी न पड़ जाए। 

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • लैव्यव्यवस्था 19-20        
  • मत्ती 27:51-66

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (3)

 

भ्रम की युक्तियों से प्रभावित मसीही विश्वासी   

पिछले लेख में हमने इफिसियों 4:14 से देखा था कि प्रभु परमेश्वर के प्रति अविश्वास और अनाज्ञाकारिता के कारण बालकों के समान अपरिपक्व रहने वाले मसीही विश्वासी, और उन से बनी अपरिपक्व कलीसिया, शैतान का शिकार रहते हैं। वे मनुष्यों की ठग विद्या और चतुराई द्वारा भटकाए और फंसे जाते हैं; भ्रम की युक्तियों से प्रभावित रहते हैं; गलत उपदेशों से गलत शिक्षाएं लेते और मानते रहते हैं, और अपरिपक्वता के इन दुष्प्रभावों के कारण इधर से उधर विभिन्न मतों, समुदायों, विचारों में उछले और घुमाए जाते हैं, भटकाए जाते हैं। इनमें से पहले दुष्प्रभाव को देखने के बाद, पिछले लेख में हमने दूसरे दुष्प्रभाव, भ्रम की युक्तियों में फँसने का एक उदाहरण, परमेश्वर के भक्त जनों, अय्यूब और उसके मित्रों की बातों से देखा था। अय्यूब के मित्र अपनी ओर से परमेश्वर के पक्ष में और अय्यूब को दोषी ठहराने के लिए तर्क-वितर्क करते रहे, और अय्यूब अपने आप को निर्दोष बताता रहा। अन्ततः परमेश्वर से सामना होने के बाद अय्यूब को अपनी वास्तविक दशा का, अपने भ्रम का, और शैतान द्वारा उसे स्व-धार्मिकता के पाप में फँसाए रहने का एहसास हुआ; उसने पश्चाताप किया, परमेश्वर से क्षमा माँगी, अपने मित्रों के लिए भी क्षमा याचना की, और अपनी आशीषों को बहाल किया, परमेश्वर से दोगुना प्राप्त किया, परमेश्वर से दोगुना प्राप्त किया, और अपने मित्रों को परमेश्वर के प्रकोप से बचाया। आज हम इसी भ्रम और युक्ति के एक अन्य उदाहरण को नए नियम से देखेंगे, कि किस प्रकार शैतान अपनी युक्ति के द्वारा प्रभु यीशु से मिलने वाली धार्मिकता के स्थान पर हमें अपने कर्मों और सांसारिक लोगों के समान व्यवहार के द्वारा एक गढ़ी हुई धार्मिकता के निर्वाह में फँसा देता है, हमें परमेश्वर के मार्गों से और उसकी संगति तथा निकटता से पथ-भ्रष्ट कर देता है, अप्रभावी बना देता है। कृपया पौलुस प्रेरित द्वारा कुलुस्से की मण्डली को लिखी पत्री - कुलुस्सियों 2 अध्याय को अपने सामने खोल कर रखें।

इस अध्याय का आरंभ पौलुस द्वारा उस मण्डली के लोगों से किए गए आह्वान से होता है कि वे प्रभु यीशु मसीह और उसमें छिपेबुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डारको पहचान लें, जिससे कि मनुष्यों की लुभावनी बातों से धोखे में न आएं (पद 2-4)। पद 5 से ध्यान कीजिए कि वह उनके चरित्र और विश्वास की दृढ़ता की सराहना तो करता है, किन्तु साथ ही पवित्र आत्मा के द्वारा उसे आशंका है, और वह उन्हें चिताता है कि वे धोखे में आ सकते हैं। फिर पद 6-8 में वह उन्हें इस धोखे से बचने और झूठ तथा सत्य के बीच पहचान करने की विधि बताता है - मसीह में बने और चलते रहो, बढ़ते रहो; और  “चौकस रहो कि कोई तुम्हें उस तत्‍व-ज्ञान और व्यर्थ धोखे के द्वारा अहेर न करे ले, जो मनुष्यों के परंपराई मत और संसार की आदि शिक्षा के अनुसार हैं, पर मसीह के अनुसार नहीं” (“कुलुस्सियों 2:8)। फिर पौलुस पवित्र आत्मा के द्वारा, पद 9-15 में प्रभु यीशु मसीह के गुण, हमारे उद्धार तथा परमेश्वर से मेल-मिलाप के लिए किए गए उसके कार्य के महत्व, तथा उसके साथ मसीही विश्वासियों के संबंध और उससे विश्वासियों के जीवनों में होने वाले प्रभावों के बारे में लिखता है। यहाँ, पद 14-15 में दी गई बात को ध्यान रखना अनिवार्य है - प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए व्यवस्था और उसकी सभी मांगो को पूरा कर के हमारे सामने से हटा दिया है। जब हम मसीह यीशु में आ जाते हैं, तो उसमें होने के द्वारा, हम उसके द्वारा व्यवस्था के पालन की अनिवार्यता को पूरा करके हटा देने की आशीष में भी आ जाते हैं, उस आशीष के संभागी हो जाते हैं। अब हमारे मसीह में होने के कारण व्यवस्था की हम पर कोई माँग शेष नहीं रही है, जैसे मसीह पर व्यवस्था की कोई माँग नहीं है। मसीह यीशु में होने के कारण मसीही विश्वासी व्यवस्था की हर एक बात के पालन से मुक्त हो गया है; इसलिए अब उसका वापस व्यवस्था के पालन की ओर मुड़ना, मसीह के द्वारा दिए गए बलिदान और उद्धार के कार्य को नकारना, उसका तिरस्कार करना, और फिर से अपने कर्मों की स्व-धार्मिकता की बंधुवाई में लौटना है। 

शैतान मसीही विश्वासियों और उनसे बनी कलीसिया को इसी स्व-धार्मिकता के भ्रम की बंधुवाई में वापस लाने, और उन्हें प्रभु परमेश्वर और उसके कार्यों, तथा सुसमाचार प्रचार के लिए अप्रभावी बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के कर्मों की धार्मिकता में फँसाने की युक्तियों का प्रयास करता है, जैसा पद 16-18 में लिखा है। शैतान अपनी युक्तियों द्वारा विश्वासियों को स्व-धार्मिकता के भ्रम में फँसाने के लिए उन्हें खाने-पीने द्वारा धर्मी-अधर्मी होने; संसार के लोगों के पर्वों, दिनों, त्यौहारों को मनाने के द्वारा परमेश्वर को स्वीकार्य एवं प्रसन्न करने वाले होने; दीनता के व्यवहार को दिखाने, तथा परमेश्वर के दासों/सेवकों को आराधना और उपासना के योग्य समझने और मानने वाला होने, आदि बातों के भ्रम में फँसाने के प्रयास करता है और इन बातों के प्रभावी होने को दिखाने के लिए विभिन्न प्रकार की युक्तियों का प्रयोग करता है। किन्तु उसके इस भ्रम और युक्तियों से बचाव का मार्ग पहले ही दे दिया गया है - प्रभु यीशु मसीह में ही सारी बुद्धि, समझ और धार्मिकता है; जो प्रभु यीशु में है, उसे और किसी बात की कोई आवश्यकता नहीं है, जिसे फिर से पद 19 में दोहराया गया है।

फिर पद 20-23 में पवित्र आत्मा, पौलुस के द्वारा इस कर्मों के द्वारा धर्मी होने के भ्रम की व्यर्थता पर बल देते हुए, मण्डली के लोगों से अपने आप से प्रश्न करने और अपने आप को जाँचने के लिए कहता है। पद 23 में निष्कर्ष के साथ शैतान की इस गढ़ी हुई धार्मिकता, शैतान के भ्रम और युक्तियों के व्यर्थ होने एक व्यावहारिक प्रमाण भी दिया गया हैइन विधियों में अपनी इच्छा के अनुसार गढ़ी हुई भक्ति की रीति, और दीनता, और शारीरिक योगाभ्यास के भाव से ज्ञान का नाम तो है, परन्तु शारीरिक लालसाओं को रोकने में इन से कुछ भी लाभ नहीं होता” (कुलुस्सियों 2:23)। परमेश्वर पवित्र आत्मा ने यहाँ स्पष्ट लिखवाया है कि पद 16-18, 20 में दी गई धार्मिकता के लिए विभिन्न कर्मों के निर्वाह करने वालों के जीवनों में स्पष्ट देखा जाता है कि यह सब करने के बाद भीशारीरिक योगाभ्यास के भाव से ज्ञान का नाम तो है, परन्तु शारीरिक लालसाओं को रोकने में इन से कुछ भी लाभ नहीं होता” - अर्थात यह सब कर के भी वे लोग शारीरिक लालसाओं से फिर भी पराजित ही रहते हैं, किन्तु अपने आप को बहुत धर्मी समझने के भ्रम में फंसे रहते हैं। अब मेरे और आपके लिए, प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए प्रश्न है कि जो बातें उन्हें शरीर पर ही जयवंत नहीं करने पाई हैं, वे उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी, उसे स्वीकार्य, और स्वर्ग में जाने के लिए पवित्र कैसे बनाने पाएंगी? यह सब आडंबर है, शैतान द्वारा फैलाया गया भ्रम, और इस भ्रम में फँसाए रखने के लिए वह विभिन्न प्रकार की युक्तियों का प्रयोग करता रहता है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो कुलुस्सियों 2 अध्याय के आधार पर अपने मसीही जीवन को जाँच-परख कर देख लें की कहीं आप पर भी तो शैतान के इस भ्रम और अपनी युक्तियों में फँसाने का दांव तो नहीं चल गया है? कहीं आप भी धर्म-कर्म-त्यौहार और पर्वों तथा दिनों को मनाने, परमेश्वर के लोगों और सेवकों को अस्वाभाविक तथा अनुचित आदर और आराध्य होने का दर्जा देने की व्यर्थ धार्मिकता में तो नहीं फंस गए हैं? शैतान के भ्रम और उसकी इन युक्तियों को पहचानने और उनसे बचने का एक ही उपाय है - कुलुस्सियों 2:6-8। यदि आप को अपने जीवन में कोई सुधार करना है, तो अभी समय और अवसर रहते हुए कर लीजिए, कहीं बाद में बहुत देर न हो जाए, और आप किसी बहुत बड़ी हानि में न पड़े रह जाएं।  

  यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • लैव्यव्यवस्था 17-18        
  • मत्ती 27:27-50