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मंगलवार, 23 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - पुनः अवलोकन (5)


मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की कार्य-विधि - 2 (नवंबर 15 से 18 तक के लेखों का सारांश)

पिछले सारांश में हमने यूहन्ना 16:8-11 के आधार पर पुनःअवलोकन किया था कि मसीही विश्वासी, पवित्र आत्मा की सहायता और मार्गदर्शन द्वारा, संसार के लोगों पर पाप, धार्मिकता, और न्याय के बारे में उन लोगों के विचार, व्यवहार, और धारणाओं की तुलना में मसीही शिक्षाओं और जीवन को रखता है, अपने जीवन से उन्हें प्रदर्शित करता है। संसार और मसीही विश्वास के मध्य का यह तुलनात्मक प्रकटीकरण, स्वतः ही संसार के लोगों को कायल करने के लिए पर्याप्त है। बाइबल के अनुसार यही अपने आप में मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण है। इसके बाद प्रभु यीशु ने 12 पद में शिष्यों से कहा कि परमेश्वर पवित्र आत्मा आकर उन्हें उन बातों को बताएगा, जिन्हें वे अभी नहीं समझ सकते (जैसे कि प्रभु भोज से संबंधित यूहन्ना 6:60-66 की प्रभु की बात) किन्तु पवित्र आत्मा की उनमें उपस्थिति उन्हें उन बातों के ग्रहण करने और समझने के लिए सक्षम कर देगी।

फिर 13 पद में एक बार फिर प्रभु यीशु ने पवित्र आत्मा को 'सत्य का आत्मा' कहा; अर्थात उनकी हर बात सत्य है, और वे केवल सत्य ही का मार्ग बताएंगे; वे किसी भी असत्य के साथ कभी सम्मिलित नहीं होंगे। प्रभु ने कहा कि पवित्र आत्मातुम्हेंअर्थात प्रभु यीशु के शिष्यों की मसीही सेवकाई में तीन बातें और करेगा: 

(i) वह सब सत्य का मार्ग बताएगा

(ii) वह अपनी ओर से नहीं कहेगा, परंतु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा;

(iii) वह आने वाली बातें बताएगा।

 आज परमेश्वर पवित्र आत्मा के नाम से बहुतायत से किए जाने वाले भ्रामक प्रचार, गलत शिक्षाओं, और मन-गढ़न्त बातों के संदर्भ में, उन बातों और शिक्षाओं को जाँचने और परखने, उनकी सत्यता को जानने और पहचानने के लिए, ऐसी शिक्षाओं और उनके प्रचारकों को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने के लिए, ये तीनों बातें बहुत सहायक तथा महत्वपूर्ण हैं। 

इनमें से पहली बात है कि पवित्र आत्मा मसीह के शिष्यों अर्थात मसीही विश्वासियों कोसब सत्य का मार्ग बताएगा। आज पवित्र आत्मा के नाम पर गलत शिक्षाएं और व्यवहार सिखाने वाले सभी प्रचारक सामान्यतः परमेश्वर के वचन की शिक्षा (1 यूहन्ना 2:15-17) के विपरीत, सांसारिक सुख-समृद्धि-संपत्ति और शारीरिक चंगाई या लाभ प्राप्त करने ही की बातें करते हैं। उनके प्रचार में पापों के लिए पश्चाताप करने (प्रेरितों 2:38), प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास द्वारा उद्धार पाने का प्रोत्साहन एवं अनिवार्यता (प्रेरितों 15:11; 16:31), प्रभु यीशु के शिष्य बनने और उससे होने वाले मन-परिवर्तन के बारे में (रोमियों 12:1-2; 2 कुरिन्थियों 5:17), अपने आप को संसार में यात्री और परदेशी जानकर सांसारिक नहीं वरन स्वर्गीय वस्तुओं पर मन लगाने (1 पतरस 2:11; कुलुस्सियों 3:1-2), और मसीही विश्वास और सेवकाई में दुख आने और उठाने की अनिवार्यता (फिलिप्पियों 1:29; 2 तिमुथियुस 3:12), आदि, सुसमाचार की बातें या तो होती ही नहीं हैं, अथवा बहुत कम होती हैं। उनका प्रचार, और जीवन मुख्यतः पार्थिव, नश्वर, शारीरिक सुख-सुविधा की बातों से ही संबंधित होता है; और फिर भी वे यह सब पवित्र आत्मा की ओर से अथवा उनकी अगुवाई में होकर कहने का दावा करते हैं। जब कि पवित्र आत्मा के संबंध में ऐसी कोई शिक्षा, कोई बात परमेश्वर के वचन में कहीं नहीं दी गई है। तो फिर वहसत्य का आत्माजो केवल सत्य अर्थात परमेश्वर के वचन और प्रभु यीशु की बातों का मार्ग बताता है, वह यह सब कैसे कर सकता है?

यूहन्ना 16:13 में पवित्र आत्मा के कार्य से संबंधित प्रभु यीशु द्वारा कही गई दूसरी बात है कि वह अपनी ओर से नहीं कहेगा, परंतु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा। प्रभु की इस बात को तथा यह ध्यान रखते हुए कि परमेश्वर का वचन अपनी पूर्णता में लिखा जा चुका है, अनन्तकाल के लिए स्वर्ग में स्थापित हो चुका है (भजन 119:89), यह कैसे संभव है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा उस वचन के अतिरिक्त और कुछ नया किसी मनुष्य को बताए या सिखाए? यह तो उपरोक्त बातों के विरुद्ध होगा, उन्हें झूठ दिखाएगा - जोसत्य के आत्मापवित्र आत्मा के गुणों के विरुद्ध है। पवित्र आत्मा के द्वारा नई बातें, नए दर्शन, नई शिक्षाएं आदि पाने के सभी दावे प्रभु के इस वचन के अनुसार झूठे हैं; और मसीही विश्वासियों तथा सेवकों को झूठ के प्रचारकों से बच कर रहना है (2 यूहन्ना 1:10-11)। बाइबल से संबंधित किसी भी सिद्धांत को स्वीकार करने से पहले (1 थिस्सलुनीकियों 5:21), उसे तीन बातों के आधार पर जाँच लेना चाहिए; ये बातें हैं - i. उसे सुसमाचारों में प्रभु यीशु द्वारा प्रचार किया गया; ii. उसको प्रेरितों के काम में व्यावहारिक मसीही या मण्डली के जीवन में प्रदर्शित किया गया; iii. पत्रियों में उसकी व्याख्या की गई या उसके विषय सिखाया गया। जिस बात में ये तीनों गुण नहीं हैं, उसे तुरंत स्वीकार नहीं करना चाहिए; बेरिया के विश्वासियों के समान (प्रेरितों 17:11) वचन से यह देखना चाहिए कि जो कहा और बताया जा रहा है, वास्तव में पवित्र शास्त्र में वैसा ही लिखा है या नहीं - यह खरे आत्मिक व्यक्ति का चिह्न है 1 कुरिन्थियों 2:15 

       यूहन्ना 16:13 की पवित्र आत्मा के कार्य से संबंधित तीसरी बात है कि वहतुम्हेंअर्थात प्रभु के शिष्यों को आने वाली बातें बताएगा। प्रभु की यह बात पवित्र आत्मा के नाम पर कुछ भी कहने और उन्हें पवित्र आत्मा की ओर से दी गईभविष्यवाणीहोने का दावा करने की छूट नहीं है। यदि नए नियम की बातों के आधार पर इस बात को देखें, तो इस बात का जो अर्थ सामने आता है वह है कि पवित्र आत्मा मसीही सेवकाई और सुसमाचार प्रचार के दौरान शिष्यों को आने वाली बातों को बताता है, अर्थात उन्हें सचेत रखता था। ऐसा बिलकुल नहीं था कि पवित्र आत्मा लोगों को अपना ढिंढोरा पीटने और अपने आप को लोगों के सामने भविष्यद्वक्ता दिखा कर वाह-वाही लूटने के लिए कहता था। वरन वह सुसमाचार प्रचार में लगे प्रभु के शिष्यों को हर परिस्थिति के लिए तैयार और आगाह रखता था, जो शिष्यों की सेवकाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण बात थी (प्रेरितों 9:16; 13:4; 20:22-23; 21:4, 11; 23:16)। दूसरी बात, यदि लोगों द्वारापवित्र आत्मा की ओर सेमिली और की जा रही भविष्यवाणियों के विषयों को देखें, और उनके पूरा होने का आँकलन करें, तो स्पष्ट हो जाता है कि उनभविष्यवाणियोंके विषय और सामग्री, सामान्यतः परमेश्वर के वचन से बाहर या अतिरिक्त होते हैं - जो, जैसा हम ऊपर देख चुके हैं, पवित्र आत्मा की ओर से किया जाना संभव नहीं है। साथ ही यदि उनभविष्यवाणियोंके पूरे होने के आधार पर आँकलन करने के लिए उन्हें परमेश्वर के वचन की शिक्षा से देखें, तो व्यवस्थाविवरण 18:20-22 में लिखा है किभविष्यवाणियोंका पूरा न होना इस बात का प्रमाण है कि वे परमेश्वर की ओर से नहीं हैं, और ऐसे नबियों को मार डालना चाहिए। किन्तु आज लोग ऐसे झूठे प्रचारकों को बहुत आदर और सम्मान देते हैं; उनकी झूठी शिक्षाओं के लिए उनकी आलोचना भी सहन नहीं करना चाहते हैं, वरन उन गलत, शारीरिक, और सांसारिक बातों को ही सत्य मान कर चलते हैं।

फिर यूहन्ना 16:14-15 में प्रभु ने एक बार फिर इस बात को दोहराया कि पवित्र आत्मा केवल प्रभु यीशु ही की बातों में से कहेगा और सिखाएगा। अर्थात, चाहे कोई भी कुछ भी क्यों न कहता रहे, कोई भी अद्भुत बातप्रमाणके रूप में क्यों न दिखाता रहे, प्रभु यीशु द्वारा वचन में दे दी गई शिक्षाओं और बातों से अधिक या बाहर जो कुछ भी है, वह न तो प्रभु यीशु की ओर से है, और न पवित्र आत्मा की ओर से। इसलिए प्रभु की शिक्षाओं से अतिरिक्त और बाहर की किसी भी शिक्षा या व्यवहार को स्वीकार नहीं करना है। यहाँ परमेश्वर पवित्र आत्मा का एक और कार्य को बताया गया है - वह प्रभु यीशु की महिमा करेगा। आज पवित्र आत्मा के नाम से फैलाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को सिखाने और फैलाने वाले बहुत दृढ़ता से यह दावा करते हैं कि उन्हें यह सब पवित्र आत्मा की ओर से मिला है, और वे इसके लिए पवित्र आत्मा की महिमा करने पर बल देते हैं, तथा उन प्रचारकों के स्वयं के जीवन, व्यवहार, और शिक्षाओं में, पवित्र आत्मा के नाम के उपयोग की तुलना में, प्रभु यीशु का नाम और उनकी शिक्षाओं तथा कार्यों का उल्लेख और महत्व बहुत कम होता है। वे लोगों को भी यही बताते और सिखाते हैं कि वे भी पवित्र आत्मा से उनके समान बातों तथा व्यवहार को प्राप्त करने की माँग करें। ये लोग पवित्र आत्मा की महिमा करने पर बहुत बल देते हैं, और अपनी इस बात को पवित्र आत्मा से सीखा हुआ बताते है। जबकि प्रभु यीशु मसीह ने साफ, सीधे शब्दों में, बिलकुल स्पष्ट, दो-टूक कहा है कि पवित्र आत्मा अपनी नहीं वरन प्रभु की महिमा करेगा! प्रभु की यह बात हमारे सामने मसीही विश्वास की शिक्षाओं का आँकलन करने का एक और मापदंड रखती है - मसीही विश्वास और सेवकाई से संबंधित जो भी शिक्षा अथवा व्यवहार प्रभु यीशु मसीह पर केंद्रित न हो, प्रभु यीशु को महिमा न दे; बल्कि प्रभु यीशु और उनके क्रूस पर दिए गए बलिदान, पुनरुत्थान, और सुसमाचार की बजाए किसी अन्य की ओर ध्यान आकर्षित करे, उसे महिमित करने का प्रयास करे, वह परमेश्वर प्रभु की ओर से नहीं है; चाहे उस महिमा का विषय परमेश्वर पवित्र आत्मा ही क्यों न हो। पवित्र आत्मा का कार्य प्रभु यीशु की महिमा करना है; वह अपनी महिमा नहीं करवाता है, और न ही ऐसी कोई शिक्षा या व्यवहार सिखाता है जो प्रभु यीशु की महिमा न करे, या करने पर ध्यान न दे, अथवा वचन के विरुद्ध हो।

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो यह आपके लिए अनिवार्य है कि आप परमेश्वर पवित्र आत्मा के विषय वचन में दी गई शिक्षाओं को गंभीरता से सीखें, समझें और उनका पालन करें; और सत्य को जान तथा समझ कर ही उचित और उपयुक्त व्यवहार करें, सही शिक्षाओं का प्रचार करें। आपको अपनी हर बात का हिसाब प्रभु को देना होगा (मत्ती 12:36-37)। जब वचन आपके हाथ में है, वचन को सिखाने के लिए पवित्र आत्मा आपके साथ है, तो फिर बिना जाँचे और परखे गलत शिक्षाओं में फँस जाने, तथा मनुष्यों और उनके समुदायों और शिक्षाओं को आदर देते रहने के लिए उन गलत शिक्षाओं में बने रहने के लिए क्या आप प्रभु परमेश्वर को कोई उत्तर दे सकेंगे?

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 20-21 
  • याकूब 5

सोमवार, 22 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - पुनः अवलोकन (4)

 

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की कार्य-विधि - 1 (नवंबर 12 से 14 तक के लेखों का सारांश)

पिछले लेख में हमने देखा था कि मसीही की सेवकाई में, परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रभु यीशु के शिष्यों, अर्थात मसीही विश्वासियों को तैयार करके, फिर उनमें होकर अपने कार्य और सामर्थ्य को प्रकट करता है; उनमें होकर संसार के लोगों के समक्ष उदाहरण तथा शिक्षाओं को रखता है। यूहन्ना 16:8 में पवित्र आत्मा ने तीन बातें लिखवाई हैं, जिनके विषय वह प्रभु यीशु के शिष्यों में होकर संसार को दोषी ठहराता है। ये तीन बातें हैं - पाप, धार्मिकता, और न्याय। सारे संसार के विभिन्न लोगों और धर्मों के निर्वाह, रीति-रिवाजों की पूर्ति, अनुष्ठानों के किए जाने, आदि के बावजूद, संसार के लोगों में से इन तीनों समस्याओं को मिटा पाना संभव नहीं होने पाया है, वरन इनके विषय स्थिति सुधारने की बजाए और बिगड़ती ही जा रही है। यही अपने आप में एक जग-विदित प्रमाण है कि धर्म-कर्म-रस्म का निर्वाह इस समस्या का समाधान नहीं है। परमेश्वर पवित्र आत्मा, प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों के परिवर्तित जीवन और व्यवहार में होकर संसार के लोगों को इन बातों के विषय दोषी ठहराता है - प्रभु के वास्तविक और सच्चे शिष्यों के जीवनों से तुलना के द्वारा संसार के लोगों को उनकी वास्तविक दशा दिखाता है।

पाप: संक्षेप में, परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार, पाप, मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में किया गया परमेश्वर की आज्ञाओं और निर्देशों का उल्लंघन अथवा अवहेलना है (1 यूहन्ना 3:4)। हमारे आदि माता-पिता, आदम और हव्वा के द्वारा किए गए प्रथम पाप के साथ ही पाप ने सृष्टि में प्रवेश किया, और आदम की संतानों में फैल गया (रोमियों 5:12-14)। मनुष्यों में आनुवंशिक रीति से विद्यमान पाप करने की इस प्रवृत्ति का निवारण और समाधान, उस व्यक्ति द्वारा किए गए अपने पापों के अंगीकार तथा उन से पश्चाताप, प्रभु यीशु मसीह द्वारा मिली पापों की क्षमा और उद्धार, तथा उसे स्वेच्छा से अपना जीवन समर्पण करने वाले व्यक्ति में प्रभु के द्वारा किया गया मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आधारभूत परिवर्तन, के द्वारा होता है। पाप और उसके निवारण तथा समाधान के विषय दी गई शिक्षाओं पर एक विस्तृत चर्चा पहले प्रस्तुत की जा चुकी है; इस विस्तृत चर्चा की शृंखला का आरंभ इस लेख के साथ हुआ था: परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 1

धार्मिकता: मूल यूनानी भाषा के लेख में जिस शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसे यहाँधार्मिकताअनुवाद किया गया है, उसका अर्थ होता है चरित्र एवं व्यवहार में दोष रहित होना। अर्थात, यहाँ पर धार्मिकता का अर्थ धार्मिक बातों, प्रथाओं, और रीति-रिवाजों का निर्वाह तथा धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्ति के आधार पर व्यक्ति काधर्मीसमझा जाना नहीं है, वरन उसके मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में परमेश्वर की दृष्टि में तथा उसके मानकों के आधार पर दोष रहित होना है। यह मन परिवर्तन मनुष्य अपने किसी धर्म के कामों से नहीं करने पाता है, नहीं तो संसार भर में इतने धर्मों और धार्मिक अनुष्ठानों, और कार्यों के द्वारा, अब तक संसार से पाप की समस्या कब की मिट चुकी होती। यह मन परिवर्तन केवल प्रभु यीशु मसीह में लाए गए विश्वास और पापों के पश्चाताप के द्वारा ही संभव है। प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास लाना, और ईसाई धर्म का निर्वाह करना, दो बिलकुल भिन्न बातें हैं; और ईसाई धर्म का निर्वाह व्यक्ति को परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी नहीं बनाता है। व्यक्ति किसी भी धर्म को माने, किसी भी परिवार में जन्म ले, सभी के लिए, ईसाई धर्म का निर्वाह करने वालों के लिए भी, परमेश्वर की आज्ञा अपने पापों से पश्चाताप करने की है (प्रेरितों 17:30-31)। सच्चे और वास्तविक मसीही विश्वासी के जीवन जीने वालों में, और संसार के मानकों के अनुसारधर्मका जीवन जीने वालों में परमेश्वर पवित्र आत्माधार्मिकताकी यह तुलना प्रस्तुत करता है। मसीही विश्वास की धार्मिकता की तुलना में, सांसारिक की गढ़ी हुई धार्मिकता के विषय सांसारिक लोगों को दोषी ठहराता है।

न्याय: मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद यहाँन्यायकिया गया है, उसका अर्थ होता है सही पहचान करनायानिर्णय लेना। इस शब्द का प्रयोग और अर्थ सही पहचान करने, परिस्थितियों का सही विश्लेषण करने, या व्यक्तियों का सही आँकलन करने और उनके विषय सही निर्णय करने, आदि के लिए भी किया जाता है, केवल सामान्य अभिप्राय, वैधानिक या कानूनी न्याय करना, यानि कि उनके अपराधों के लिए लोगों को दोषी ठहराना और दण्ड देना ही नहीं। यूहन्ना 16:11 में पवित्र आत्मा द्वारा करवाए गएन्यायऔरसंसार का सरदारअर्थात शैतान केन्यायके मध्य एक तुलना (contrast) रखी गई है। अर्थात, दोनों केन्यायकरने, यानि कि सही निर्णय देने, या सही पहचान, अथवा आँकलन करने में भिन्नता है। और परमेश्वर पवित्र आत्मा, मसीही विश्वासियों में होकर बिलकुल सटीक, सही, और पक्षपात रहित न्याय, उचित व्यवहार, या निर्णय करवाने के द्वारा, ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करेगा जो संसार के लोगों द्वारा सांसारिक विचार और व्यवहार के अनुसार, “संसार के सरदारके प्रभाव में होकर किए जाने वाले अनुचित एवं अपूर्ण न्याय, या निर्णय के बारे में उनको दोषी ठहराएंगे। एकमात्र सच्चे और जीवते प्रभु परमेश्वर का न्याय सदा सच्चा, खरा, और पक्षपात रहित होता है। निष्कर्ष यह कि मसीही विश्वास में आने के द्वारा व्यक्ति के मन, जीवन, विचार, और व्यवहार में जो परिवर्तन आता है, वह उसे परमेश्वर पवित्र आत्मा की अधीनता में खरा और सच्चा न्याय करने, या जाँच-परख करने, या सही आँकलन करके पक्षपात रहित निर्णय करने वाला बना देता है। उसका यह बदला हुआ व्यवहार, उसमें परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण है। साथ ही उसका इस प्रकार का जीवन, पाप और पापमय प्रवृत्तियों तथा विचारधाराओं में रहने वाले, “संसार के सरदारके प्रभाव में होकर कार्य करने वाले लोगों के समक्ष एक तुलना (contrast) रखता है, और उन्हें उनके अनुचित न्याय, व्यवहार, और विचार के लिए दोषी ठहराता है।

परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों में आडंबर, नाटकीय व्यवहार, करिश्माई दावे करने, और शारीरिक एवं सांसारिक लाभ देने के लिए आकर निवास नहीं करता है। वरन उसका उद्देश्य मसीही विश्वासियों में होकर प्रभु यीशु में पापों की क्षमा और उद्धार की गवाही देना, तथा संसार के लोगों को उनके दोषों के विषय कायल करना है। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो यूहन्ना 16:8-11 के समक्ष आपका जीवन कैसा है? यदि आप अभी इन पदों के समक्ष अपने आप को दोषी पाते हैं, तो फिर आपको 2 कुरिन्थियों 13:5 के अनुसार अपने आप को और अपने मसीही विश्वास में होने के दावे का पुनः अवलोकन करने, अपने मसीही विश्वासी होने की समीक्षा करने की आवश्यकता है। मसीही विश्वासी होने के नाते, आप में विद्यमान परमेश्वर पवित्र आत्मा आपको पाप करने या पाप में बने नहीं रहने देगा; आपको मनुष्य और संसार के लोगों के अनुसार नहीं वरन परमेश्वर की दृष्टि में और उसके मानकों के आधार पर धार्मिकता का जीवन जीने के लिए प्रेरित करेगा; तथा संसार के लोगों के समान अनुचित न्याय अथवा लोगों और परिस्थितियों का आँकलन नहीं करने देगा। आप जब भी ऐसा करेंगे, वह आपके जीवन में खलबली उत्पन्न करेगा, आपके जीवन में तब तक बेचैनी रहेगी जब तक आप अपने इस गलत व्यवहार को सही नहीं कर लेंगे। और यदि आप फिर भी ढिठाई में ऐसे व्यवहार में बने रहेंगे, जो एक मसीही विश्वासी के लिए सही नहीं है, तो आपको ताड़ना में से भी होकर निकलना पड़ेगा, जिससे आप सुधारे जा सकें (इब्रानियों 12:5-11)

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 18-19 
  • याकूब 4

रविवार, 21 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - पुनः अवलोकन (3)

 

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की उपस्थिति एवं प्रमाण (नवंबर 9 से 11 तक के लेखों का सारांश)

मसीही विश्वास में आते ही, व्यक्ति में परमेश्वर पवित्र आत्मा आकर निवास करने लगता है, फिर उसके जीवन में कुछ कार्य होते हैं, और परिवर्तन आते हैं, जिनके द्वारा वह मसीही सेवकाई के लिए तैयार किया जाता है, उपयोगी बनाया जाता है। यूहन्ना 16 अध्याय में प्रभु यीशु ने शिष्यों के सामने कुछ बातें रखीं, जिनका विद्यमान होना उनकी सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा के होने को दिखाएगा, यह प्रमाणित करेगा कि उनकी सेवकाई परमेश्वर की ओर से तथा उसकी सामर्थ्य से है। साथ ही परमेश्वर पवित्र आत्मा की कार्य-विधि के गुण भी प्रभु ने अपने शिष्यों को बताए। प्रभु द्वारा कही गई ये बातें, आज के सामान्यतः पवित्र आत्मा के नाम से किए जाने वाले आडंबर, विचित्र व्यवहार, हाव-भाव, शोर-शराबे, और शारीरिक एवं सांसारिक बातों के लाभों की प्राप्ति की शिक्षाओं और व्यवहार से बिलकुल भिन्न हैं। पवित्र आत्मा के नाम से अपनी ही धारणाओं की गलत शिक्षाओं को बताने और फैलाने वाले इन भ्रामक प्रचारकों की बातों का आरंभ ही परमेश्वर पवित्र आत्मा को मनुष्य के अधीनता या वश में ले लेने के द्वारा होता है। सामान्यतः उनका कहना होता है कि प्रभु यीशु पर विश्वास लाने के बाद, पवित्र आत्मा को प्राप्त करने के लिए अलग से प्रयास करना पड़ता है, तब ही जाकर पवित्र आत्मा मिलता है; और फिर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए एक अन्य कार्यपवित्र आत्मा का बपतिस्मापाने की आवश्यकता होती है। फिर वो लोगों अपनी बनाई हुई उन विधियों को सिखाते हैं जिनसे उनके अनुसार पवित्र आत्मा को प्राप्त किया जाता है। 

पवित्र आत्मा का बपतिस्माके बारे में हम इन सारांश के बाद के आने वाले में देखेंगे; किन्तु मुख्य बात यह है कि ये गलत शिक्षाएं देने वाले परमेश्वर पवित्र आत्मा को मनुष्य के हाथों की कठपुतली बनाकर, जिसे मनुष्य अपने प्रयासों और कार्यों के द्वारा नियंत्रित और उपयोग करे प्रस्तुत करते हैं। जबकि वास्तविकता में उनकी ये सभी बातें बाइबल की शिक्षाओं के बाहर की हैं, बाइबल में ऐसी बातों की कोई शिक्षा अथवा पुष्टि नहीं है। ध्यान देने योग्य बात है कि यूहन्ना अध्याय 14-16 में, चार बार लिखा गया है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा केवल प्रभु परमेश्वर की ओर से तथा उसके द्वारा ही, और प्रभु के शिष्यों को ही प्रदान किया जाता है (14:16-17, 26; 15:26; 16:7)। पवित्र आत्मा को प्राप्त करने से संबंधित बाइबल की शिक्षाओं और उनके बारे में बनाई गई गलत धारणाओं के विश्लेषण से संबंधित एक विस्तृत शृंखला को आप www.samparkyeshu.blogspot.com ब्लॉग साईट पर, 20 अप्रैल 2020 से आरंभ हुई लेखों की शृंखला के पहले लेख के इस लिंक से पढ़ सकते हैं: पवित्र आत्मा पाने से संबंधित बातें - परिचय

यूहन्ना 15:26 में प्रभु यीशु ने यह भी कहा कि परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीह यीशु ही की गवाही देगा; अर्थात प्रभु यीशु के शिष्य की सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति, उस शिष्य के जीवन में प्रभु यीशु मसीह की गवाही विद्यमान होने से प्रमाणित होगी, न कि बाइबल से बाहर की बातों के करने और दिखाने के द्वारा! वह शिष्य मसीह के समान जीना आरंभ कर देगा, प्रभु का गवाह होकर कार्य करने लगेगा, प्रभु यीशु की आज्ञाकारिता में किसी मनुष्य-मत-समुदाय-डिनॉमिनेशन को नहीं वरन परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन व्यतीत करेगा (1 कुरिन्थियों 11:1; 1 थिस्सलुनीकियों 4:1-2, 11)। फिर यूहन्ना 16:7-8 में एक बार फिर प्रभु यीशु ने सिखाया कि पवित्र आत्मा उनके भेजे से ही आएगा, “और वह आकर संसार को पाप और धामिर्कता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा। अर्थात जो मसीही सेवकाई परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और अगुवाई में की जाएगी, उसमें न केवल मसीह यीशु की गवाही प्राथमिकता पाएगी, वरन साथ ही उस सेवकाई के द्वारा संसार के लोग पाप, धार्मिकता, और न्याय के विषय दोषी ठहराए जाएंगे या कायल किए जाएंगे (मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का हिन्दी अनुवादनिरुत्तरकिया गया है, उसका वास्तविक अर्थ उलाहना देना, या दोषी ठहराना होता है; इसीलिए अँग्रेज़ी के अनुवादों में convict शब्द, जो मूल भाषा के अर्थ के अधिक निकट है, प्रयोग किया गया है)। परमेश्वर के वचन के अनुसार इन तीनों बातों के अर्थ और व्याख्या का सारांश हम कल की कड़ी में देखेंगे। 

इसीलिए, यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो बाइबल में दी गई प्रभु यीशु मसीह की शिक्षाओं को जानने, उन्हें समझने, और उनका पालन करने में अपना समय और ध्यान लगाइए। सभी गलत शिक्षाओं से बच कर रहिए और अपनी मन-मर्जी या पसंद के अनुसार नहीं, किन्तु प्रभु के वचन की आज्ञाकारिता में जीवन व्यतीत करें, अपनी मसीही सेवकाई को पूर्ण करें। प्रत्येक मसीही विश्वासी को व्यक्तिगत रीति से पवित्र आत्मा की सामर्थ्य दिए जाने का उद्देश्य यही है कि वह शैतान की युक्तियों को समझे, उनके प्रति सचेत रहे, और परमेश्वर के वचन को सीख समझ कर अपनी मसीही सेवकाई के लिए सक्षम, तत्पर, और तैयार हो जाए, उस सेवकाई में लग जाए। और मसीही सेवकाई से संबंधित दी गई शिक्षाएं यह जाँचने और समझने के आधार हैं कि जो सेवकाई की जा रही है वह वास्तव में परमेश्वर के कहे के अनुसार की जा रही है; न कि मनुष्यों की बनाई धारणाओं के अनुसार। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 16-17 
  • याकूब 3

शनिवार, 20 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - पुनः अवलोकन (2)

 

मसीही विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन में पवित्र आत्मा की भूमिका (नवंबर 5 से 8 तक के लेखों का सारांश)

यूहन्ना 13 अध्याय से लेकर 17 अध्याय तक, क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले, फसह के पर्व को मनाते हुए, अपने शिष्यों के साथ किया गया प्रभु यीशु मसीह का अंतिम वार्तालाप है। प्रभु जानते थे कि उनकी पृथ्वी की सेवकाई के ये अंतिम पल हैं, और वे अपने शिष्यों को उनके जाने के बाद सेवकाई संभालने के लिए तैयार कर रहे थे, अंतिम निर्देश दे रहे थे, भविष्य में उनके लिए बहुत उपयोगी होने वाली कुछ बातें बता और समझा रहे थे। इन बातों में से एक थी प्रभु यीशु के जाने के बाद शिष्यों में परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य का आ जाना, जिनकी अगुवाई और सामर्थ्य के द्वारा फिर शिष्यों ने सुसमाचार प्रचार की सेवकाई को सारे संसार में करना था। परमेश्वर पवित्र आत्मा के शिष्यों के साथ होने, और शिष्यों में होकर कार्य करने के विषय प्रभु यीशु ने जो बातें शिष्यों से कहीं वे हमें यूहन्ना के 14 तथा 16 अध्याय में मिलती हैं। यूहन्ना 14 अध्याय में दी गई शिक्षाएं मुख्यतः शिष्यों के व्यक्तिगत जीवन में पवित्र आत्मा की भूमिका से संबंधित हैं; और 16 अध्याय की शिक्षाएं मुख्यतः उनकी सार्वजनिक सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका से संबंधित हैं। दुर्भाग्यवश, आज परमेश्वर पवित्र आत्मा, और मसीही विश्वासियों के साथ उनके संबंध तथा मसीही सेवकाई में उनकी भूमिका को लेकर गलत शिक्षाओं, मिथ्या प्रचार और व्यर्थ शारीरिक हाव-भाव एवं शोर-शराबे की बातों का इतना अधिक बोल-बाला हो गया है कि लोग परमेश्वर के वचन बाइबल की स्पष्ट और सीधी सच्चाइयों को भी ठीक से देखने और समझने नहीं पा रहे हैं। वे प्रभु यीशु की कही इन बातों पर ध्यान देने के स्थान पर मनुष्यों द्वारा बनाए गए मत-समुदायों-डिनॉमिनेशंस की बातों और उनके प्रचारकों की भरमाने वाली बातों के धोखे में फंसे हुए हैं। आज हम नवंबर 5 से 8 तक यूहन्ना 14 अध्याय के लेखों के सारांश को देखेंगे, जो मुख्यतः मसीही विश्वासी के व्यक्तिगत जीवन में पवित्र आत्मा की भूमिका से संबंधित हैं। 

इन लेखों में सबसे पहली बात हमने देखी थी कि यूहन्ना 14:16 के अनुसार, परमेश्वर पवित्र आत्मा किसी भी व्यक्ति में किसी मनुष्य की युक्ति या प्रयास से आकर नहीं निवास करते हैं। वे प्रभु यीशु के कहे अनुसार, प्रभु के शिष्यों में आकर रहते हैं। और हमने आरंभिक लेखों में, तथा कल के सारांश में देखा था, कि यह व्यक्ति के उद्धार पाते ही, तुरंत ही उसी पल होने वाली बात है। किसी को भी पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए अलग से कोई कार्य या प्रयास या प्रतीक्षा करने की कोई आवश्यकता नहीं है; उद्धार पाते ही, स्वतः ही पवित्र आत्मा प्रभु यीशु के उस नवजात शिष्य में आकर निवास करने लगते हैं। साथ ही प्रभु यीशु उन्हेंसर्वदा साथ रहनेके लिए भेजता है। एक बार जिस शिष्य में पवित्र आत्मा आकर निवास करने लगता है, वह फिर सदा के लिए जीवन पर्यंत उसके साथ रहने के लिए उसमें निवास करता है। इसलिए बारंबार पवित्र आत्मा के आने के लिए प्रार्थना करना वचन से संगत नहीं है। साथ ही, परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी का सहायक बनकर आते हैं, सेवक बनकर नहीं। वे प्रभु के शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं, उसे सिखाते हैं, सेवकाई के लिए समझ और सामर्थ्य प्रदान करते हैं, किन्तु उस शिष्य के कार्य को उसके स्थान पर नहीं करते हैं; करना शिष्य को ही होता है, तरीका पवित्र आत्मा बताते हैं। 

फिर, यूहन्ना 14:17 से हमने देखा था कि परमेश्वर पवित्र आत्मा, सत्य का आत्मा है; वे संसार में और संसार के लोगों में नहीं रह सकते हैं। अभिप्राय यह कि जो वास्तव में उद्धार पाया हुआ सच्चा विश्वासी है, उसमें पवित्र आत्मा स्वतः ही आकर निवास करेंगे; और जिसने वास्तव में पश्चाताप नहीं किया उद्धार नहीं पाया, वह चाहे कोई भी कार्य या प्रयास कर ले, उसमें पवित्र आत्मा का निवास कदापि नहीं होगा। उनकेसत्य का आत्मा’” होने का तात्पर्य है कि उनकी हर बात, हर शिक्षा, हर व्यवहार बाइबल में दी गई सत्य की परिभाषा - प्रभु यीशु मसीह (यूहन्ना 14:6), और परमेश्वर का वचन (भजन 119:160), के अनुसार और अनुरूप ही होगा। वे कभी प्रभु यीशु और बाइबल में लिखी हुई बातों से भिन्न या बाहर कुछ नहीं कहेंगे या सिखाएंगे। इस बात की पुष्टि प्रभु ने यूहन्ना 14:26 में भी कर दी, जब उन्होंने बिलकुल स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि पवित्र आत्मा आकर केवल प्रभु की दी हुई शिक्षाओं को ही स्मरण करवाएंगे और सिखाएंगे। इसलिए आज पवित्र आत्मा के नाम से जो विचित्र व्यवहार, शारीरिक क्रियाएं, हाव-भाव और शोर-शराबा किया जा रहा है, जिसका कोई उदाहरण या शिक्षा बाइबल में नहीं मिलती है, वह कभी पवित्र आत्मा की ओर से नहीं हो सकता है। 

बाइबल में सम्मिलित किए जाने वाले सारे लेख प्रथम शताब्दी की समाप्ति से पहले ही लिखे जा चुके थे। बाद में इन्हीं लेखों को संकलित करके नया नियम बना। साथ ही, पवित्र आत्मा की अगुवाई में पतरस ने 2 पतरस 1:3-4 में लिख दिया था कि जीवन और भक्ति से संबंधित सभी बातें, प्रभु यीशु मसीह की पहचान में होकर हमें उपलब्ध करवा दी गई हैं; तथा साथ ही इस संसार की सड़ाहट से बचने और ईश्वरीय स्वभाव के संभागी होने का मार्ग भी दे दिया गया है। तात्पर्य यह कि परमेश्वर का वचन आरंभिक कलीसिया के समय से ही पूर्ण हो चुका है, उसमें और कुछ जोड़ने, कुछ नया बताने की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसा करना परमेश्वर के वचन की अनाज्ञाकारिता है, परमेश्वर द्वारा दण्डनीय है (व्यवस्थाविवरण 12:32; नीतिवचन 30:6; प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। परमेश्वर को स्वीकार्य और उसे प्रसन्न करने वाला जीवन जीने के लिए मानवजाति के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, वह सब परमेश्वर पवित्र आत्मा ने लिखवा दिया है, उपलब्ध करवा दिया है। इसलिए आज के उननएदर्शनों, भविष्यवाणियों, शिक्षाओं, चमत्कारिक बातों, आदि का कोई औचित्य अथवा आवश्यकता नहीं है; और न ही परमेश्वर के वचन बाइबल से उनके लिए कोई समर्थन है, जिन्हेंपवित्र आत्मा की ओर सेप्राप्त करने का दावा आज बहुत से मत और समुदाय, या डिनॉमिनेशन के अनुयायी करते हैं, जिन गलत बातों के बारे में औरों को भी सिखाते हैं, तथा औरों को भी करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यदि पवित्र आत्मा से संबंधित बाइबल की शिक्षाएं, प्रभु यीशु की कही बातें सही हैं, तो इन लोगों के ऐसे सभी दावे बेबुनियाद हैं, व्यर्थ हैं, झूठे हैं, और उनमें पड़ने या उन्हें स्वीकार करने का कोई आधार नहीं है।

फिर यूहन्ना 14:30 में प्रभु ने शिष्यों को सचेत किया कि प्रभु के चले जाने के पश्चात, उनका सामना 'संसार का सरदार' अर्थात शैतान से होना था, जो उन पर टूट कर पड़ने वाला था। इसलिए उन्हें उसका सामना करने, और उसपर जयवंत होने के लिए, प्रभु के लिए सेवकाई पर निकालने से पहले पवित्र आत्मा की सामर्थ्य की अनिवार्यता थी।

इसीलिए, यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर के वचन, को जानने और मानने में अपना समय और ध्यान लगाइए; अपनी मन-मर्जी और पसंद के अनुसार नहीं, अपितु प्रभु की आज्ञाकारिता में जीवन व्यतीत करें। प्रत्येक मसीही विश्वासी को व्यक्तिगत रीति से पवित्र आत्मा की सामर्थ्य दिए जाने का उद्देश्य यही है कि वह शैतान की युक्तियों को समझे, उनके प्रति सचेत रहे, और परमेश्वर के वचन को सीख समझ कर अपनी मसीही सेवकाई के लिए सक्षम, तत्पर, और तैयार हो जाए, उस सेवकाई में लग जाए।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 14-15 
  • याकूब 2

शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - पुनः अवलोकन (1)

 

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की आवश्यकता एवं प्राप्ति (नवंबर 1 से 4 तक के लेखों का सारांश)

मसीही सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका पर हमने पिछले अठारह लेखों में अध्ययन किया है। इन लेखों में जिन बातों को हमने देखा और सीखा है, वे मसीही विश्वासी और उसकी मसीही सेवकाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। आज परमेश्वर पवित्र आत्मा को लेकर अनेकों ऐसी गलत शिक्षाएं और व्यवहार देखे और सिखाए जाते हैं, जो परमेश्वर के वचन बाइबल की बातों के अनुसार नहीं हैं, वरन, बाइबल की कुछ बातों को उनके संदर्भ से बाहर लेकर, एक विचारधारा का समर्थन करने के लिए; अनुचित धारणाओं को वैध ठहराने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। अगले लेखों में जाने से पहले इन महत्वपूर्ण शिक्षाओं को दोहराने और स्मरण रखने में सरलता के लिए हम उन शिक्षाओं का एक सारांश देखेंगे, जो हमने पिछले लेखों में देखी हैं।

आरंभ में हमने देखा था कि प्रभु ने अपने शिष्यों से कहा कि वे मसीही सेवकाई पर निकलने से पहले पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त करने की प्रतीक्षा करें, और तब ही सेवकाई पर निकलें। अर्थात, प्रभु यीशु से लगभग साढ़े तीन वर्ष तक सीखने और उस दौरान प्रभु द्वारा सेवकाई पर भेजे जाने के बावजूद शिष्य उनके साथ पवित्र आत्मा की उपस्थिति होने पर ही मसीही सेवकाई के लिए सक्षम हो सकते थे। यह सेवकाई कुछ प्रशिक्षण या अनुभव प्राप्त कर लेने पर निर्भर नहीं है; इसके लिए परमेश्वर की उपस्थिति साथ होना अनिवार्य है। 

फिर हमने देखा कि यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि मसीही सेवकाई आरंभ करते ही शिष्यों का सामना शैतान से होना था, जिसके वश में सारा संसार पड़ा है (1 यूहन्ना 5:19)। शैतान अपनी चतुराई से परमेश्वर के लोगों को बहका सकता है, धार्मिकता और बाइबल की बातों के विषय में विश्वासियों को भरमा सकता है (2 कुरिन्थियों 11:3;, 13-15)। वह फाड़ खाने वाले सिंह के समान मसीही विश्वासियों की हानि करने के लिए तैयार खड़ा है (1 पतरस 5:8)। इसलिए उसका सामना करने और उसकी युक्तियों पर जयवंत होने के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य साथ होना अनिवार्य है। 

इसीलिए प्रभु परमेश्वर ने यह प्रयोजन करके दे रखा है कि जैसे ही कोई व्यक्ति अपने पापों से पश्चाताप करता है, प्रभु यीशु से उनके लिए क्षमा माँगता है, प्रभु यीशु द्वारा कलवरी के क्रूस पर दिए गए बलिदान और उसके मृतकों में से पुनरुत्थान को स्वीकार करके, प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता ग्रहण कर लेता है, और प्रभु की आज्ञाकारिता में चलते रहने के लिए अपना जीवन प्रभु यीशु को समर्पित कर देता है, ठीक उसी पल से परमेश्वर पवित्र आत्मा उस उद्धार पाए हुए नए विश्वासी में आकर निवास करने लगता है (प्रेरितों 11:17; इफिसियों 1:13-14; गलातीयों 3:2)। वचन की इस सीधी सी स्पष्ट शिक्षा को लेकर पवित्र आत्मा के नाम पर गलत और भ्रामक शिक्षा फैलाने वालों ने अपनी ही धारणाएं बना रखी हैं, और उन गलत शिक्षाओं का प्रचार करते हैं। वे सिखाते हैं कि उद्धार पा लेने के बाद पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए अलग से कुछ विशेष प्रयास करने पड़ते हैं - जिसका वचन में कोई समर्थन अथवा शिक्षा नहीं है। एक नवजात मसीही विश्वासी को प्रभु कैसे शैतान से हानि उठाने के लिए अकेला छोड़ सकता है? साथ ही वे लोगपवित्र आत्मा से बपतिस्मेको लेकर भी एक अलग ही सिद्धांत सिखाते हैं, जबकि वचन में यह स्पष्ट लिखा गया है कि प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने के साथ ही पवित्र आत्मा प्राप्त करना और पवित्र आत्मा से बपतिस्मा प्राप्त करना एक ही बात हैं; एक ही तथ्य की दो अलग अभिव्यक्तियाँ हैं (प्रेरितों 1:5, 8; 11:15-17) 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, और इन भ्रामक तथा गलत शिक्षाओं फँसाए गए हैं, तो प्रभु परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको सही और गलत शिक्षा की पहचान दे, और गलत शिक्षाओं से निकालकर बाइबल की सही शिक्षाओं में स्थापित करे; अपने वचन को सिखाए, और अपने लिए उपयोगी पात्र बनाकर आप को अपनी सेवकाई में प्रयोग करे। ध्यान रखिए, अन्ततः, पृथ्वी के इस जीवन के बाद, आपका न्याय किसी व्यक्ति, मत, समुदाय, या डिनॉमिनेशन की शिक्षाओं और बातों के अनुसार नहीं होगा, वरन परमेश्वर के वचन के अनुसार होगा (यूहन्ना 12:47-48)। इसलिए किसी भी मनुष्य को प्रसन्न करने की, या मनुष्य के द्वारा बनाए गए विचारों और धारणाओं का पालन करते रहने की गलती ना करें (गलातियों 1:10); वरन देख-परख कर परमेश्वर के वचन के सत्य को ही थामें और निभाएं (1 थिस्सलुनीकियों 5:12; प्रेरितों 17:11-12) 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 11-13 
  • याकूब 1

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 18

      

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की कार्य-विधि (यूहन्ना 16:14-15) - 4.

 हम मसीही सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की कार्य-विधि का यूहन्ना 16 अध्याय में प्रभु यीशु द्वारा कही गई बातों के आधार पर अध्ययन कर रहे हैं। पिछले लेख में हमने देखा था कि पवित्र आत्मा केवल सत्य का मार्ग, अर्थात परमेश्वर के वचन और प्रभु यीशु की बातों में से बताता है; वह अपनी ओर से कुछ नया नहीं कहता है, वरन प्रभु की जो बातें सुनता है वही कहता है; और मसीही विश्वासियों को आने वाली बातों तथा परिस्थितियों के लिए सचेत और अवगत रखता है। प्रभु द्वारा मसीही विश्वासी के जीवन में परमेश्वर पवित्र आत्मा की यह कार्य-विधि उससे कितनी भिन्न है, सीधे से तुलना (contrast) में है, जो आज बहुत से मत, समुदाय, और डिनॉमिनेशन परमेश्वर पवित्र आत्मा और उनके कार्यों के बारे में कहते तथा सिखाते हैं; पवित्र आत्मा के नाम में वे जैसा व्यवहार दिखाते हैं, और फिर उस शिक्षा और व्यवहार के आधार पर यह प्रमाणित करने के प्रयास करते हैं कि यह सभी उन्हें पवित्र आत्मा की ओर से मिला है, तथा औरों को भी इन्हीं शिक्षाओं और व्यवहार का इच्छुक रहना चाहिए, उसका प्रयास करना चाहिए। यह सब हमारे सामने एक सीधा प्रश्न उत्पन्न करता है - हमें किस की बात माननी चाहिए - जो प्रभु यीशु द्वारा परमेश्वर के वचन में दी गई है, या वह जो आज प्रभु यीशु से लगभग 2000 वर्ष बाद मनुष्यों ने कहना और दिखाना आरंभ किया है, जो चाहे विचित्र-अद्भुत-आकर्षक-आश्चर्यकर्मों वाला तो है, किन्तु परमेश्वर के वचन की बहुत सी शिक्षाओं के साथ पूर्णतः मेल नहीं खाता है, बल्कि विरोधाभास (contradiction) उत्पन्न करता है

यूहन्ना 16:12-13 की बात को आगे बढ़ाते हुए, उनकी पुष्टि में प्रभु यीशु ने पद 14-15 में वैसी ही बात फिर से कही। मसीही सेवकाई के लिए मसीही विश्वासी में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा की कार्य-विधि के बारे में प्रभु यीशु मसीह ने आगे कहा:वह मेरी महिमा करेगा, क्योंकि वह मेरी बातों में से ले कर तुम्हें बताएगा। जो कुछ पिता का है, वह सब मेरा है; इसलिये मैं ने कहा, कि वह मेरी बातों में से ले कर तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:14-15)। आज पवित्र आत्मा के नाम से फैलाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को सिखाने और फैलाने वाले बहुत दृढ़ता से यह दावा करते हैं कि उन्हें यह सब पवित्र आत्मा की ओर से मिला है, और वे इसके लिए पवित्र आत्मा की महिमा करने पर बल देते हैं, तथा लोगों को बताते और सिखाते हैं कि वे भी पवित्र आत्मा से उनके समान बातों तथा व्यवहार को प्राप्त करने की माँग करें। किन्तु उनके जीवन, व्यवहार, और शिक्षाओं में, पवित्र आत्मा के नाम के उपयोग की तुलना में, प्रभु यीशु का नाम और उनकी शिक्षाओं तथा कार्यों का उल्लेख और महत्व बहुत कम होता है। उनका मुख्य प्रयास और शिक्षा व्यक्ति द्वारा अपने स्वयं के लिए चमत्कारिक तथा लोगों को अद्भुत बातों से प्रभावित कर के अपनी ही ओर आकर्षित करने वाले, और आम लोगों पर अपनी धाक जमाने वाले वरदान पवित्र आत्मा से प्राप्त करने के प्रति होता है। किन्तु इसकी तुलना में यहाँ प्रभु यीशु ने दो ऐसी बातें शिष्यों को सिखाई हैं जो करिश्माई वरदानों और व्यवहार की बातों को मानने और मांगने वाले लोगों की शिक्षाओं के बिलकुल विपरीत हैं। 

पवित्र आत्मा की कार्य-विधि के विषय जो पहली बात प्रभु ने 14 पद में कही वह हैवह मेरी महिमा करेगा”! ये लोग पवित्र आत्मा की महिमा करने पर इतना बल देते हैं, और अपनी इस बात को पवित्र आत्मा से सीखा हुआ बताते है; जबकि प्रभु यीशु मसीह साफ, सीधे शब्दों में, बिलकुल स्पष्ट, दो-टूक कह रहे हैं कि पवित्र आत्मा अपनी नहीं वरन प्रभु की महिमा करेगा! हम देख चुके हैं कि परमेश्वर पवित्र आत्मा सत्य का आत्मा है, वह कभी कुछ असत्य नहीं कहता या सिखाता है। तो फिर तो प्रभु की बात सत्य है, और उन लोगों की गलत है, और यह संभव नहीं है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा ने उन लोगों को कुछ असत्य सिखाया है, प्रचार करने के लिए कहा है। प्रभु की यह बात हमारे सामने मसीही विश्वास की शिक्षाओं का आँकलन करने का एक और मापदंड रखती है - मसीही विश्वास और सेवकाई से संबंधित जो भी शिक्षा अथवा व्यवहार प्रभु यीशु मसीह पर केंद्रित न हो, प्रभु यीशु को महिमा न दे; बल्कि प्रभु यीशु और उनके क्रूस पर दिए गए बलिदान, पुनरुत्थान, और सुसमाचार की बजाए किसी अन्य की ओर ध्यान आकर्षित करे, उसे महिमित करने का प्रयास करे, वह परमेश्वर प्रभु की ओर से नहीं है; चाहे उस महिमा का विषय परमेश्वर पवित्र आत्मा ही क्यों न हो। पवित्र आत्मा का कार्य प्रभु यीशु की महिमा करना है; वह अपनी महिमा नहीं करवाता है, और न ही ऐसी कोई शिक्षा या व्यवहार सिखाता है जो प्रभु यीशु की महिमा करने पर ध्यान न दे, अथवा न करे।

पवित्र आत्मा की कार्य-विधि के बारे में प्रभु यीशु ने जो दूसरी बात 14 और 15 में कही, उसे वे पहले भी यूहन्ना 14:26 तथा 16:13 में कह चुके हैं, और यहाँ इन दोनों पदों में फिर से दोहराया है। प्रभु द्वारा इस बात को बारंबार दोहराया जाना इस बात का सूचक है कि प्रभु की दृष्टि में यह बात कितनी महत्वपूर्ण है, और शिष्यों के ध्यान रखने के लिए कितनी आवश्यक है। प्रभु ने कहा, “वह मेरी बातों में से ले कर तुम्हें बताएगा”; जिसे हम दूसरे शब्दों में पहले भी देख चुके हैं - परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी ओर से कुछ नया किसी मसीही विश्वासी को नहीं कहता, सिखाता, या करवाता है। मसीही सेवकाई के लिए, मसीही विश्वासी के जीवन में, पवित्र आत्मा की शिक्षाओं और व्यवहार का दायरा प्रभु यीशु मसीह द्वारा दी गई शिक्षाओं तक ही सीमित है। फिर चाहे कोई भी कुछ भी क्यों न कहता रहे, कोई भी अद्भुत बातप्रमाणके रूप में क्यों न दिखाता रहे, प्रभु यीशु द्वारा वचन में दे दी गई शिक्षाओं और बातों से अधिक या बाहर जो कुछ भी है, वह न तो प्रभु यीशु की ओर से है, और न पवित्र आत्मा की ओर से। इसलिए प्रभु की शिक्षाओं से अतिरिक्त और बाहर की किसी भी शिक्षा या व्यवहार को स्वीकार नहीं करना है - गलत शिक्षाओं को पहचानने का यह एक और मापदंड प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को यहाँ दिया है। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो कुछ रुक कर अपने विश्वास के आधार का और जिन शिक्षाओं को आप मानते और बताते हैं, उनके बारे में गंभीरता से विचार और आँकलन कर लीजिए। क्या आपके विश्वास का आधार प्रभु यीशु मसीह और उसका वचन है, या सांसारिक तथा शारीरिक लाभ और चंगाई, अद्भुत आश्चर्यकर्म, विचित्र व्यवहार, और करिश्माई बातों द्वारा दिखाया गया आकर्षण है? जिन शिक्षाओं और बातों को आप मानते हैं, जिनके अनुसार व्यवहार करते हैं क्या वे परमेश्वर के वचन से हैं, या अपनी ही अलग व्याख्या के द्वारा किसी मत-समुदाय-डिनॉमिनेशन द्वारा दी जाने वाली ऐसी शिक्षाएं हैं जो परमेश्वर के वचन से पूर्णतः मेल नहीं कहती हैं? क्या आपके जीवन, व्यवहार, और गवाही से प्रभु यीशु के नाम को महिमा मिलती है; और क्या पापों से पश्चाताप तथा प्रभु यीशु में विश्वास द्वारा उद्धार के सुसमाचार को प्राथमिकता मिलती है, या फिर आप सांसारिक तथा शारीरिक लाभों, चंगाइयों, करिश्माई व्यवहार आदि की लालसाओं में ही बंधे हुए पड़े हैं? अभी, समय रहते, अपने आप को तथा अपने मसीही विश्वासी होने को परमेश्वर के वचन के अनुसार जाँच कर सही कर लीजिए।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि आप जैसी भी दशा में हैं, उसी में परमेश्वर आपको स्वीकार कर लेगा, और सदा काल के लिए अपना बना लेगा। साथ ही क्या किसी पापी मनुष्य के लिए कहीं और यह संभव है कि परमेश्वर स्वयं आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको धर्मी बनाए; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को तथा अपनी धार्मिकता को औरों पर प्रकट करे, आपको खरा आँकलन करने और सच्चा न्याय करने वाला बनाए; तथा आप में होकर पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

   

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 8-10 
  • इब्रानियों 13

बुधवार, 17 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 17


मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की कार्य-विधि (यूहन्ना 16:12-13) - 3.

पिछले लेख में हमने देखा था कि एक बार फिर प्रभु यीशु मसीह ने परमेश्वर पवित्र आत्मा कोसत्य का आत्माकह कर संबोधित किया; अर्थात पवित्र आत्मा से संबंधित और उनकी हर बात केवल सत्य ही होगी, और वे केवल सत्य ही का मार्ग बताएंगे; वे किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष असत्य के साथ कभी किसी रूप में सम्मिलित नहीं होंगे। साथ ही हमने यह भी देखा था कि परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसारसत्यप्रभु यीशु मसीह और उनका वचन है। तात्पर्य यह हुआ कि परमेश्वर पवित्र आत्मा की हर बात प्रभु यीशु मसीह और उनके वचन की बातों में से होगी, उन शिक्षाओं और बातों के साथ संगत होगी, कभी उनसे भिन्न अथवा अतिरिक्त नहीं होगी। साथ ही हमने यह भी देखा था कि बाइबल से संबंधित किसी भी सिद्धांत को स्वीकार करने से पहले, उसे तीन बातों के आधार पर जाँच लेना चाहिए; ये बातें हैं - i. सुसमाचारों में प्रचार किया गया; ii. प्रेरितों के काम में व्यावहारिक मसीही या मण्डली के जीवन में प्रदर्शित किया गया; iii. पत्रियों में उसकी व्याख्या की गई या उसके विषय सिखाया गया। जिस बात में ये तीनों गुण नहीं हैं, उसे तुरंत स्वीकार नहीं करना चाहिए; बेरिया के विश्वासियों के समान (प्रेरितों 17:11) वचन से यह देखना चाहिए कि जो कहा और बताया जा रहा है, वास्तव में पवित्र शास्त्र में वैसा ही लिखा है या नहीं - यह खरे आत्मिक ज्ञान का चिह्न है 1 कुरिन्थियों 2:15

यूहन्ना 16:13 में परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारातुम्हेंअर्थात प्रभु यीशु के शिष्यों की सार्वजनिक मसीही सेवकाई से संबंधित तीन बातों का उल्लेख है:

(i) वह सब सत्य का मार्ग बताएगा

(ii) वह अपनी ओर से नहीं कहेगा, परंतु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा;

(iii) वह आने वाली बातें बताएगा।

 

(i) आज परमेश्वर पवित्र आत्मा के नाम से बहुतायत से किए जाने वाले भ्रामक प्रचार, गलत शिक्षाओं, और मन-गढ़न्त बातों के संदर्भ में, उन बातों और शिक्षाओं को जाँचने और परखने, उनकी सत्यता को जानने और पहचानने के लिए, ऐसी शिक्षाओं और उनके प्रचारकों को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने के लिए, ये तीनों बातें बहुत सहायक तथा महत्वपूर्ण हैं। ऐसे सभी प्रचारक सामान्यतः परमेश्वर के वचन की शिक्षा (1 यूहन्ना 2:15-17) के विपरीत, सांसारिक सुख-समृद्धि-संपत्ति और शारीरिक चंगाई या लाभ प्राप्त करने ही की बातें करते हैं। उनके प्रचार में पापों के लिए पश्चाताप करने (प्रेरितों 2:38), प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास द्वारा उद्धार (प्रेरितों 15:11; 16:31), प्रभु यीशु के शिष्य बनने और उससे आने वाले मन-परिवर्तन के बारे में (रोमियों 12:1-2; 2 कुरिन्थियों 5:17), और अपने आप को संसार में यात्री और परदेशी होकर सांसारिक नहीं वरन स्वर्गीय वस्तुओं पर मन लगाने (1 पतरस 2:11; कुलुस्सियों 3:1-2), मसीही विश्वास और सेवकाई में दुख आने और उठाने की अनिवार्यता (फिलिप्पियों 1:29; 2 तिमुथियुस 3:12), आदि, सुसमाचार की बातें या तो होती ही नहीं हैं, अथवा बहुत कम होती हैं। उनका प्रचार, और जीवन मुख्यतः पार्थिव, नश्वर, शारीरिक सुख-सुविधा की बातों से ही संबंधित होता है। और फिर वे यह सब पवित्र आत्मा की ओर से अथवा उनकी अगुवाई में होकर कहने का दावा करते हैं। वे शरीरों के विचित्र हाव-भाव-हरकतों और मुँह से अजीब-अजीब आवाज़ें निकालकर लोगों को प्रभावित करने और यह विश्वास दिलाने के प्रयास करते हैं कि यह सब पवित्र आत्मा उनमें होकर कर रहा है या उनसे करवा रहा है। जबकि पवित्र आत्मा के संबंध में ऐसी कोई शिक्षा, कोई बात परमेश्वर के वचन में कहीं नहीं दी गई है। तो फिर वहसत्य का आत्माजो केवल सत्य अर्थात परमेश्वर के वचन और प्रभु यीशु की बातों का मार्ग बताता है, वह यह सब कैसे कर सकता है? या तो प्रभु यीशु की कही यूहन्ना 16:13 की बात झूठ है, अन्यथा पवित्र आत्मा के नाम पर किए जा रहे ये भ्रामक एवं नाटकीय प्रचार और व्यवहार झूठ हैं। 

(ii) इस प्रकार का गलत प्रचार करने वालों में एक और बात बहुधा देखी जाती है - वे पवित्र आत्मा की ओर से नए दर्शन, नई शिक्षाएं, नई बातें बोलने के दावे करते हैं। किन्तु प्रभु यीशु मसीह ने यहाँ पर परमेश्वर पवित्र आत्मा के विषय स्पष्ट कहा है कि वेअपनी ओर न कहेगा, परंतु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा”; साथ ही प्रभु यीशु मसीह ने इससे पहले कहा थापरन्तु सहायक अर्थात पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा (यूहन्ना 14:26)। अब जब परमेश्वर का वचन अपनी पूर्णता में लिखा जा चुका है, अनन्तकाल के लिए स्वर्ग में स्थापित हो चुका है (भजन 119:89), साथ ही प्रभु यीशु द्वारा कही गई उपरोक्त बातों को भी ध्यान में रखते हुए, तो फिर यह कैसे संभव है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा उस वचन के अतिरिक्त और कुछ नया किसी मनुष्य को बताए या सिखाए? यह तो उपरोक्त बातों के विरुद्ध होगा, उन्हें झूठ दिखाएगा - जोसत्य के आत्मापवित्र आत्मा के गुणों के विरुद्ध है। एक और बार हमारे समान फिर वही आँकलन आ जाता है - या तो परमेश्वर का वचन सही है, तो फिर ये प्रचारक और उनकी शिक्षाएं और व्यवहार झूठे होंगे; अन्यथा ये प्रचारक और उनके दावे सही हैँ, तो फिर परमेश्वर के वचन की शिक्षाएं स्थिर, स्थापित और सच्ची नहीं हैं, वरन परिवर्तनीय हैं, अविश्वासयोग्य हैं क्योंकि लिखा कुछ है और हो कुछ और ही रहा है! आप किस पर विश्वास करेंगे - परमेश्वर और परमेश्वर के वचन पर या मनुष्य और उसके वचन, व्यवहार, और दावों पर?

(iii) एक और बात जिसका दावा ये भ्रामक एवं नाटकीय प्रचार और व्यवहार करने वाले अकसर करते हैं, वह हैभविष्यवाणियाँ। अवश्य ही प्रभु यीशु ने शिष्यों से कहा कि पवित्र आत्मा 'तुम्हें' अर्थात प्रभु यीशु के शिष्यों को आने वाली बातें बताएगा। किन्तु यदि नए नियम की बातों के आधार पर इस बात को देखें, तो इस बात का जो अर्थ सामने आता है वह है कि पवित्र आत्मा मसीही सेवकाई और सुसमाचार प्रचार के दौरान शिष्यों को आने वाली बातों को बताता है, अर्थात उन्हें सचेत रखता था। ऐसा बिलकुल नहीं था कि पवित्र आत्मा लोगों को अपना ढिंढोरा पीटने और अपने आप को लोगों के सामने भविष्यद्वक्ता दिखा कर वाह-वाही लूटने के लिए कहता था। वरन वह सुसमाचार प्रचार में लगे प्रभु के शिष्यों को हर परिस्थिति के लिए तैयार और आगाह रखता था, जो शिष्यों की सेवकाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण बात थी (प्रेरितों 9:16; 13:4; 20:22-23; 21:4, 11; 23:16)। दूसरी बात, यदि लोगों द्वारापवित्र आत्मा की ओर सेमिली और की जा रही भविष्यवाणियों के विषयों को देखें, और उनके पूरा होने का आँकलन करें, तो स्पष्ट हो जाता है कि उनभविष्यवाणियोंके विषय और सामग्री, सामान्यतः परमेश्वर के वचन से बाहर या अतिरिक्त होते हैं - जो, जैसा हम ऊपर देख चुके हैं, पवित्र आत्मा की ओर से किया जाना संभव नहीं है। साथ ही यदि उनके पूरे होने के आधार पर आँकलन करने के लिए उन्हें परमेश्वर के वचन की शिक्षा से देखें, तो लिखा है , “और यदि तू अपने मन में कहे, कि जो वचन यहोवा ने नहीं कहा उसको हम किस रीति से पहचानें? तो पहचान यह है कि जब कोई नबी यहोवा के नाम से कुछ कहे; तब यदि वह वचन न घटे और पूरा न हो जाए, तो वह वचन यहोवा का कहा हुआ नहीं; परन्तु उस नबी ने वह बात अभिमान कर के कही है, तू उस से भय न खाना” (व्यवस्थाविवरण 18:21-22)। अर्थात दोनों ही रीति से ऐसे लोगों द्वारा की जा रहीभविष्यवाणियोंके परमेश्वर की ओर से होने की पुष्टि नहीं होती है। फिर भी ये लोग, बेधड़क होकर, परमेश्वर पवित्र आत्मा के नाम से कुछ भी कहते और करते रहते हैं; तथा लोग सच्चाई की पहचान करने और फिर स्वीकार करने के स्थान पर, उनकी बातों में आकर मूर्ख बनते रहते हैं, उनके पीछे चलते रहते हैं। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो यह आपके लिए अनिवार्य है कि आप परमेश्वर पवित्र आत्मा के विषय वचन में दी गई शिक्षाओं को गंभीरता से सीखें, समझें और उनका पालन करें; और सत्य को जान तथा समझ कर ही उचित और उपयुक्त व्यवहार करें, सही शिक्षाओं का प्रचार करें। आपको अपनी हर बात का हिसाब प्रभु को देना होगा (मत्ती 12:36-37)। जब वचन आपके हाथ में है, वचन को सिखाने के लिए पवित्र आत्मा आपके साथ है, तो फिर बिना जाँचे और परखे गलत शिक्षाओं में फँस जाने, तथा मनुष्यों और उनके समुदायों और शिक्षाओं को आदर देते रहने के लिए उन गलत शिक्षाओं में बने रहने के लिए कोई उत्तर नहीं दे सकेंगे। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि आप जैसी भी दशा में हैं, उसी में परमेश्वर आपको स्वीकार कर लेगा, और सदा काल के लिए अपना बना लेगा। साथ ही क्या किसी पापी मनुष्य के लिए कहीं और यह संभव है कि परमेश्वर स्वयं आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको धर्मी बनाए; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को तथा अपनी धार्मिकता को औरों पर प्रकट करे, आपको खरा आँकलन करने और सच्चा न्याय करने वाला बनाए; तथा आप में होकर पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 5-7 
  • इब्रानियों 12